संस्करण: 07 जुलाई - 2014

राजनीतिक दलों के

आय-व्यय पत्रक कुछ बोलते हैं

? वीरेन्द्र जैन

         पिछले वर्षों में राजनेताओं द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार की खबरों की बाढ आ गयी है। हमारी न्यायव्यवस्था की कमजोरियों के कारण भले ही बहुत सारे आरोपियों को लम्बे समत तक दण्ड न मिल सके और ढेर सारे लोग सबूतों के अभाव और गवाहों के टूट जाने से छूट जायें किंतु जनता के मन में यह बात घर कर चुकी है कि अधिकांश नेता भ्रष्ट हैं और उनमें से बहुत कम ही जाँच के घेरे में आ पाते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र में विश्वास बनाये रखने के लिए खतरनाक है और इस कारण राजनीति में अच्छे लोग लगातार बुरे लोगों के लिए स्थान छोड़ते जा रहे हैं।

                चुनाव सुधारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रही संस्था एसोशियेशन आफ डेमोक्रेटिक रिफार्म जिसे एडीआर के नाम से जाना जाने लगा है, ने इस वर्ष भी देश के राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों द्वारा 2012-13 के लिए आयकर विभाग को दी गयी आयकर विवरणियों को समेकित कर सार्वजनिक किया है। इसका तुलनात्मक अध्य्यन करने पर कुछ दिलचस्प जानकारियां सामने आयी हैं।

              इन आंकड़ों की पड़ताल से पहले यह जान लेना जरूरी होगा कि राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त छह दलों में केवल दो दल ऐसे हैं जिनके यहाँ आय के लिए सदस्यों से अनिवार्य लेवी लेने का प्रावधान है। इनमें से एक मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी है जिसमें सदस्यता की शर्त के रूप में लेवी अनिवार्य है और आमदनी के अनुसार लेवी की दर बढती है। इस पार्टी में आठहजार या उससे अधिक की आय वालों को अधिकतम पाँच प्रतिशत की दर से लेवी देना पड़ती है, उससे कम आय वालों को अलग अलग दरों पर कम लेवी देना पड़ती है। दूसरा दल भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी है जिसमें आय के एक प्रतिशत की दर से लेवी देना पड़ती है। शेष दलों में सदस्यों समर्थकों और उद्योगपतियों, व्यापारियों, अधिकारियों तथा कार्पोरेट घरानों से बेतरतीब सहयोग प्राप्त किया जाता है जिसे वैसे तो श्रध्दा निधि कहा जा सकता है पर अधिकतर मामलों में यह सौदा होता है या दबाव। यही कारण है कि सत्तारूढ दल को अधिक सहयोग मिलता है व दूसरा नम्बर विकल्प बन सकने का आभास देने वाले सबसे बड़े विरोधी दल का आता है। जहाँ आय अनिश्चित होती है वहाँ व्यय भी अनिश्चित होता है। केवल मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी में पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को मासिक वेतन देने का प्रावधान है जिसकी दर निर्धारित होती है।  

                दलों द्वारा आयकर विभाग को दी गयी जानकारी के अनुसार 2012-13 के दौरान राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त छह दलों को कुल नौ सौ इकानबे करोड़ इक्कीस लाख रुपयों की आय हुयी है जिसमें से केन्द्र में सत्तारूढ भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के रिटर्न में चार सौ पच्चीस करोड़ उनहत्तार लाख की कुल आय अर्थात उपरोक्त की 43 प्रतिशत, दर्शायी गयी है। इसमें से कूपन और प्रकाशन बेचने से सबसे अधिक आय तीन सौ बारह करोड़ चौबीस लाख, दान, अनुदान और सहयोग से उनहत्तार करोड़ नौ लाख अन्य आय बत्ताीस करोड़ सरसठ लाख और अवर्गीकृत दस करोड़ छियासी लाख है। इसी तरह उक्त काल के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को तीन सौ चौबीस करोड़ सोलह लाख अर्थात 33प्रतिशत का हिस्सा है। इस आय में से उन्होंने स्वैच्छिक सहयोग से दो सौ इकहत्तार करोड़ तिरेपन लाख, सदस्यता शुल्क से सोलह करोड़ निन्नावे लाख, बैंक ब्याज से चौबीस करोड़ सन्तानवे लाख और अवर्गीकृत दस करोड़ सरसठ लाख रुपये दर्शाये हैं। राष्ट्रीय मान्य दलों को प्राप्त कुल आय का छिहत्तार प्रतिशत प्राप्त करने वाले उपरोक्त दो दलों के अलावा मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी को एक सौ छब्बीस करोड़ नौ लाख अर्थात 13 प्रतिशत आय हुयी है जिसमें से उसके पार्टी सदस्यों से ली गयी लेवी के रूप में उनतालीस करोड़ बारह लाख, स्वैच्छिक सहयोग के रूप में बहत्तार करोड़, बैंक ब्याज और डिवीडेंट से बारह करोड़ तिहत्तार लाख व अन्य आय दो करोड़ तेईस लाख है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी की कुल आय सतासी करोड़ तिरसठ लाख अर्थात नौ प्रतिशत है। रोचक है कि अपने टिकिट बेचने और विधायकों सांसदों से पूरे कार्यकाल में मिलने वाले वेतन के चौक पूर्व में ही ले लेने के लिए बदनाम इस पार्टी की उक्त आमदनी में सत्तातर करोड़ रुपयों की आय तो भूमि और भवन की बिक्री से प्राप्त बतायी गयी है, सदस्यता शुल्क के रूप में प्राप्त चार करोड़ पिंचानवे लाख से ज्यादा राशि पाँच करोड़ तिरेसठ लाख तो उसे बैंक ब्याज से मिली है, पाँच लाख रुपया अन्य आय भी है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी विवरणी के अनुसार इस पार्टी ने किसी गैर के आगे हाथ नहीं पसारे। कुल की तीन प्रतिशत, छब्बीस करोड़ छप्पन लाख की आय दर्शाने वाली शरद पवार की व्यक्ति केन्द्रित राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी की इस आय में से इक्कीस करोड़ तीस लाख फार्मों की बिक्री और पर्स मनी से मिले बताये गये हैं, कूपनों की बिक्री से तीन करोड़ छिहत्तर लाख सदस्यता शुल्क और चन्दे से एक करोड़् तीन लाख व अन्य आय सैंतालीस लाख बतायी गयी है। काँग्रेस के बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी जिसकी ट्रेड यूनियनें, बैंक, बीमा से लेकर बहुत सारे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में है, की कुल आय केवल एक करोड़ सात लाख है जिसमें से चौदह लाख लेवी से तेतीस लाख सदस्यता शुल्क से उननचास लाख बैंक ब्याज से और बारह लाख अन्य आय है।

              जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29 सी के अनुसार किसी वर्ष में बीस हजार या उससे अधिक का चन्दा देने वालों का विस्तृत विवरण चुनाव आयोग को देना जरूरी है। सम्बन्धित वर्ष में दी गयी विवरणियों के अनुसार तत्कालीन सत्तारूढ काँग्रेस के पास उक्त श्रेणी के दानदाताओं की संख्या 703 तक सीमित थी जिन्होंने ग्यारह करोड़ बहत्तर लाख का दान दिया वहीं विपक्षी भाजपा के पास ऐसे दानदाताओं की संख्या 2941 रही जिन्होंने तिरासी करोड़ उन्नीस लाख दिये। राष्ट्रवादी काँग्रेस के पास ऐसी संख्या कुल दो है तो बहुजन समाज पार्टी के पास एक भी नहीं। सीपीएम के पास ऐसे दानदाताओं की संख्या 108 है तो सीपीआई के पास कुल 23 है। हमारे देश में कभी गुप्त दान की परम्परा इस उद्देश्य से की गयी थी ताकि देने वालों में अहंकार न जाग जाये पर राजनीतिक दलों को मिलने वाले चन्दों में भी गुप्तदानियों का बड़ा योगदान पाया जाता है जिसका कारण पुराने परम्परागत आधार से भिन्न हो सकता है। यह ब्लेकमनी, अवैध ढंग से अर्जित आय और विदेशी सहयोग से लेकर कुछ भी हो सकता है। सन्दर्भित वर्ष में भी 655 बड़े दान दाताओं ने अपना नाम तो दिया है पर पता गुप्त रखा है, 43 बड़े दानदाताओं ने अपने नाम और पते दोनों ही गुप्त रखे हैं, तो पाँच दान दाता ऐसे भी हैं जिन्होंने पता तो दिया है पर नाम गुप्त रखा है। ऐसे दानियों ने ग्यारह करोड़ चौदह लाख रुपयों का योगदान दिया है। सभी राष्ट्रीय मान्यता प्रप्त दलों को मिले कुल सहयोग में कारपोरेट सेक्टर का हिस्सा बहत्तार प्रतिशत है, और ग्यारह प्रतिशत ने अपना वर्गीकरण स्पष्ट नहीं किया है। बहुमत की शासन प्रणाली में व्यक्तिगत रूप में सहयोग देने वाले कुल सत्तारह प्रतिशत हैं।

         राजनीतिक दलों द्वारा व्यय की मदें भी उनकी नीतियों के अनुसार भिन्न भिन्न हैं। काँग्रेस ने अपने कुल खर्च का 65 प्रतिशत पार्टी प्रशासन और सामान्य खर्चों पर किया बताया है, तो भारतीय जनता पार्टी के खर्चों में से 60 प्रतिशत व राष्ट्रवादी काँग्रेस ने 30 प्रतिशत विज्ञापनों और प्रचार में खर्च किये गये हैं। सीपीआई का सबसे बड़ा खर्च 36 प्रतिशत तो सीपीएम का भी पच्चीस प्रतिशत वेतन और भत्ताों पर खर्च हुआ है। बहुजन समाज पार्टी का सबसे बड़ा खर्च 20 प्रतिशत चुनावों के लिये की गयी यात्राओं पर हुआ है। यह देखना भी रोचक होगा कि सम्बन्धित वित्तीय वर्ष में राजनीतिक दलों द्वारा एकत्रित आय की पूरी राशि एक दल को छोड़ कर किसी ने खर्च नहीं की और किसी गृहणी की तरह अज्ञात आशंकाओं से असुरक्षित मानसिकता में आय को बचा कर रखना जरूरी समझा है। सत्ताच्युत हो चुकी काँग्रेस ने जिसके द्वारा बिल न चुका पाने के कारण मध्यप्रदेश के प्रदेश कार्यालय की बिजली कटने की खबर समाचार पत्रों में प्रकाशित हुयी थी ने सन्दर्भित वर्ष में एक सौ ग्यारह करोड़ तिरेपन लाख बचाये हैं। भाजपा ने एक सौ करोड़ अठहत्तर लाख बचाये हैं। अपनी पराजय के लिए संसाधनों की कमी का तर्क देने वाली मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी ने भी बावन करोड़ सत्तारह लाख की बचत की है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी ने अठत्तर करोड़ छिआनवे लाख, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने भी तेरह लाख की बचत की है। केवल राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी ने इस दौरान पुराने रईसों की तरह एक करोड़ सात लाख रुपये आय से अधिक खर्च किये।

        यद्यपि विभिन्न प्रारूपों में दिये गये इन प्रपत्रों से कोई बहुत सही निर्णय निकालना सरल नहीं है पर स्थूल रूप में यह कहा जा सकता है कि कारपोरेट घरानों से मिले अधिकतम चन्दे से चलने वाले राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं उनके चुनाव प्रचार में किये गये वादों से भिन्न होना स्वाभाविक हैं। जो राजनीतिक दल अपने पूर्ण कालिक कार्यकर्ताओं को वेतन नहीं देते हैं उनके कार्यकर्ताओं से ज्यादा दिन तक नि:स्वार्थ कार्य की उम्मीद करना बेमानी है या उन दलों की कमान प्रतिभाओं की जगह साधन सम्पन्न वर्ग के पास जाना तय है। जो दल विज्ञापनों और प्रचार में ही अपना सर्वाधिक व्यय कर रहे हैं उनका सौन्दर्य वास्तविक नहीं अपितु मेकअप जनित है।

               राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों के अलावा क्षेत्रीय और गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल भी कुल मतदाताओं में से चालीस प्रतिशत का समर्थन प्राप्त कर रहे हैं और उसी अनुपात में सहयोग भी प्राप्त कर रहे होंगे क्योंकि बहुत सारे राज्यों में वे सत्ता में हैं व गत पच्चीस साल से चली आ रही केन्द्र की गठबन्धन सरकारों में वे भागीदार रहे हैं। बेहतर होगा कि चुनाव सुधारों में राजनीतिक दलों के आयव्यय पत्रकों में एकरूपता लाने और उनके सदस्यों से अनिवार्य सहयोग लेकर दल से वेतन दिये जाने का भी प्रावधान किया जा सके। राजनीतिक दलों की स्वच्छता और पारदर्शिता से सरकारों में स्वच्छता व पारदर्शिता बढेगी।

? वीरेन्द्र जैन