संस्करण: 07 जनवरी-2012

निर्वाचन के छ: माह पूर्व तय हों उम्मीदवारों के नाम

प्रचार के लिए मिलना चाहिए पर्याप्त समय

?  राजेन्द्र जोशी

                विभिन्न राजनैतिक पार्टियां लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन के समय पहले उम्मीदवारों के नाम तय करने में अक्सर इतनी देर कर देती हैं कि निर्वाचन की तिथियां नजदीक आ जाती है और कुछ सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नाम तक घोषित नहीं कर पाती। कभी कभी तो ये हालात बन जाते हैं कि उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल होने के बाद नाम वापिस लेने की तिथि के आखरी क्षणों में नाम तय हो पाता है। इस तरह की राजनैतिक परिस्थितियां भी उत्पन्न हो जाती हैं कि प्रत्याशियों के नामों को लेकर हो रहे विवादों के फलस्वरूप एक ही पार्टी के दो-दो,तीन-तीन प्रत्याशियों से फार्म भरवा दिए जाते हैं और अंतिम क्षण में कुछ प्रत्याशियों को नाम भी वापिस ले लेने पड़ते हैं। इस वजह से अक्सर ऐसा होता आया है कि जिनसे नाम विड्रा करवा लिया जाता है, वे बगावत पर उतर आते हैं और बागी उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने के लिए अड़ जाते हैं। इससे पार्टियों में फूट पड़ जाती है और इसका खामियाजा उस अधिकृत उम्मीदवार को भुगतना पड़ता है जिसे पार्टी अंतिम क्षणों में चुनाव लड़ने की हरी झंडी दे देती है। ऐसे उम्मीदवार को न तो चुनाव प्रचार के लिए माकूल समय मिल पाता है और न ही मतदान की तिथि तक वह संबंधित क्षेत्र के मतदाताओं के साथ अपने संपर्क स्थापित कर पाता है।

                निर्वाचनों के उपरांत राजनैतिक पार्टियां अपनी पराजित सीटों की समीक्षा करती हैं तो उन्हें एक कारण यह भी समझ में आ जाता है कि प्रत्याशियों के चयन में देरी से यह स्थिति निर्मित हुई। उत्तर प्रदेश में सन् 2012के विधानसभा निर्वाचन के परिणामों की समीक्षा करते हुए कांग्रेस हाईकमान भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचा था कि यदि निर्वाचन की तिथि की घोषणा के पूर्व से ही प्रत्याशियों के नाम तय हो जाते तो उ.प्र.के परिणाम ऐसे नहीं होते। उत्तर प्रदेश जैसे उदाहरण कांग्रेस पार्टी को और कुछ प्रदेश जैसे उदाहरण कांग्रेस पार्टी को और कुछ प्रदेशों में भी देखने को मिले। विगत समय के कतिपय प्रदेशों के चुनाव परिणाम को दृष्टिगत रखते हुए यदि कांग्रेस पार्टी निर्वाचन के छ:माह पूर्व से ही प्रत्याशियों के नाम तय कर देती है तो यह पार्टी के हित में तो होगा ही साथ ही पार्टी प्रत्याशियों को भी प्रचार-प्रसार और जनसंपर्क का पर्याप्त समय उपलब्धा हो सकेगा।

                उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर यह बात खुलकर राजनैतिक गलियारों में हो रही है कि उम्मीदवारों के नाम देर से तय होने पर चुनावी व्यूह रचना गड़बड़ा जाती है। इन परिणामों के कारणों और टिकिट वितरण के तरीकों के अनुभवों के आधार पर ही कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी श्री दिग्विजय सिंह ने इस फार्मूले का ही सुझाव प्रस्तुत किया है कि आम निर्वाचन के प्रत्याशियों के नाम पूर्व से ही तय हो जाना चाहिए। हालांकि उन्हीं की पार्टी में कतिपय नेतागण इस फार्मूले से बेचैनी महसूस करने लगे हैं। उनका सोच है कि इससे विवादित सीटों पर तनातनी बढ़ जायगी। उनकी आशंका है कि यदि जल्दी टिकिट तय करने का फार्मूला लागू होगा तो इससे पार्टी को फायदा नहीं होगा। मधयप्रदेश के संदर्भ में कतिपय नेताओं का यह मानना है कि यदि यह फार्मूला लागू होगा तो यहां मई-जून तक अधिकांश उम्मीदवार तय कर दिए जायेंगे। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि समय पूर्व केवल वे ही नाम तय हो सकते हैं जिनकी सीटें निर्विवाद है। ऐसी सीटें मुश्किल से पचास के आसपास होंगी। लेकिन शेष क्षेत्रों में उम्मीदवारों के चयन को लेकर घमासान की नौबत बनी रहेगी।

                  बहुत पहले उम्मीदवारी तय कर देने से पार्टी को जो फायदा होगा वह देर से टिकिट बांटने से होने वाले नुकसान से निश्चित ही ज्यादा होगा। कांग्रेस पार्टी की विपक्षी दलों द्वारा मीडिया में जिस तरह से प्रादेशिक छवि बनाई जा रही है उससे जनता में यह संदेश जाता है कि यह पार्टी गुटों में विभाजित हैं जहां प्रत्येक गुट का मुखिया मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल है। यदि देर से उम्मीदवार तय होते हैं तो पार्टी को गुटीय संतुलन कायम रखने में भी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। पूर्व में ही प्रत्याशियों के नाम तय करने में गुटीय आधार को भी दृष्टिगत रखा जा सकता है। इसके बावजूद यदि कहीं कोई विपरीत स्थितियां भी बनती है तो उस स्थिति पर भी नियंत्रण पाने के लिए काफी समय पार्टी के पास होगा।

                कतिपय सूत्रों से यह खबर भी आ रही है कि जबसे कांग्रेस महासचिव श्री दिग्विजय सिंह ने जल्दी उम्मीदवार तय करने का सुझाव दिया है तब से विधानसभा और लोकसभा के क्षेत्रवार उम्मीदवारों के नामों की अंदरखाने में तलाश शुरू हो चुकी है। हालांकि अभी यह अनाफिसियल तौर पर तथाकथित खेमेबाजियों के बीच ही तलाश शुरू हुई है। हाईकमान भी इस दिशा में सक्रिय हो उठा है। प्रभारी महासचिव और कतिपय नेताओं के माधयम से हाईकमानअपने तौर पर जानकारियां जुटा रहा है कि किस क्षेत्र से किसको उम्मीदवार बनाने से पार्टी को लाभ होगा। हाईकमान कांग्रेस पार्टी की तथाकथित अति प्रचारित उस खेमेबाजी से भी पूरी तरह से वाकिफ है जिसकी वजह से प्रत्याशी चयन में थोड़ी बहुत असुविधा हो सकती है।

               मध्यप्रदेश में कांग्रेस पार्टी के लिए आगामी विधानसभा चुनाव एक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। ऐसे में पार्टी के सामने यह बड़ी चुनौती है कि सोच-समझ कर ही वह प्रत्याशियों का चयन करें। इस दृष्टि से प्रत्याशियों के छ: माह पूर्व से ही नाम तय करने का फार्मूला ही सार्थक और पार्टी के हित में हो सकता है। यदि देर से टिकिटों का बंटवारा होता है तो फिर पार्टी के भीतर होने वाले कनफ्यूजन से बचा नहीं जा सकेगा और जिसका दुष्परिणाम चुनाव नतीजे होंगे।

 
? राजेन्द्र जोशी