संस्करण: 06 जून-2011

उच्च शिक्षा :
सच कहने में चूके रमेश ?

? डॉ. सुनील शर्मा

               देश के उच्चशिक्षा की गुणवत्ता के संदर्भ पर्यावरणम मंत्री जयराम रमेश ने अपनी टिप्पणी से एक नई बहस छेड़ दी है। जयराम रमेश का मानना है कि देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान आईआईटी और आईआईएम विश्वस्तरीय नहीं है तथा इनके शिक्षक भी स्तरीय नहीं है। ये संस्थान अपने विद्यार्थियों की गुणवत्ता के कारण ही उत्कृष्ट है। यह सच है कि इन संस्थानों से निकले छात्रों की विद्वता और ज्ञान की धाक सारी दुनिया में है लेकिन यह भी सत्य है कि बिन गुरू ज्ञान न होई अत: इन संस्थानों में विद्वान शिक्षक तो अवश्य हैं। अब चूकिं रमेश आईआईटी मुम्बई के छात्र रहें हैं अत: उन्होंने कुछ व्यथा तो महसूस की होगी। लेकिन व्यतिथ रमेश यहॉ सच कहने में चूक गए क्योंकि इन संस्थानों सहित देश के सभी शिक्षण संस्थानों में अच्छे और योग्य शिक्षक मौजूद है लेकिन र्प्याप्त संख्या में नियुक्तियॉ नहीं की गई है, जिससे ये संस्थान स्थाई शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहें है। और शेष नियुक्त शिक्षक पढ़ाई और शोध जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के स्थान पर प्रशासनिक और प्रबंधन के कार्य में नियोजित कर दिए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि देश के आईआईटी संस्थानों में 55 फीसदी पद रिक्त है, आईआईएम संस्थानों के हालात भी ऐसे ही है। पिछले सत्र में प्रारम्भ हुए नए आईआईटी संस्थानों में तो ठेका शिक्षकों के सहारे पढ़ाई का काम चलाया जा रहा है। इन उच्चशिक्षण संस्थानों के साथ साथ देश भर के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षण संस्थानों तथा इनसे संबंधित महाविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद रिक्त है। वास्तव में जब पढ़ाने वाले शिक्षक ही नहीं होगें तो गुणवत्ता की बात करना बेमानी ही है। इनमें अतिथि और संविदा आधारित शिक्षको की नियुक्ति कर पढ़ाई की औपचारिकता पूर्ण कराई जा रही है।शोध और अनुसंधान की नर्सरी माने जाने वाले विश्वविद्यालय शिक्षण संस्थान और महाविद्यालयों में यह कार्य लगभग समाप्त होने की कगार पर हैं क्योंकि अतिथि और संविदा शिक्षकों के साथ हमेशा यह प्रश्नचिन्ह रहता है कि उनकी सेवाए किसी भी क्षण समाप्त हो सकती है अत:वो इस कार्य से अलग ही रहतें है। तथा कम संख्या में बचे स्थाई प्राध्यापक परीक्षा,समन्यवय और प्रबंधन जैसे कार्य में व्यस्त रहतें हैं वास्तव में ये पढ़ाई के अतिरिक्त सारे काम करते है। शिक्षकों की कमी से जूझते ये विश्वविद्यालय और महाविद्यालय मात्र परीक्षाए आयोजित कर डिग्री बॉटने वाले संस्थान बन कर रह गए हैं।

 

               शिक्षकों की कमी की बात यहीं खत्म नहीं होती है वरन बड़ें कार्पोरेट घरानों द्वारा प्रारम्भ किए तमाम निजी विश्वविद्यालयों और तकनीकि संस्थानों में भी शिक्षकों की भारी कमी है। अधिकांश का काम बायोडाटा के सहारे चल रहा है। देशभर में सड़कों के किनारे के खेतों में उग आए निजी प्रबंधन और इंजीनियरिंग संस्थानों में भी शिक्षको का भारी अभाव है। साथ ही जो शिक्षक हैं उनमें से अधिकांश निर्धारित शैक्षणिक मापदण्डों को पूरा नहीं करतें हैं।जैसे बीई उत्तीर्ण छात्र ही बीई कक्षाओं में अध्यापन का कार्य कर रहें है।अब जब शिक्षक ही नहीं होगें तो पढ़ाएगा कौन और शोध की चर्चा कैसे होगी।?

 

               वास्तव में देश की उच्च शिक्षा की दशा सुधारना है तो सबसे पहले शिक्षकों की कमी को पूरा करना होगा। देश में योग्य और प्रतिभाशाली शिक्षकों की कमी नहीं है समस्या है उनके नियोजन प्रक्रिया की। जैसे कि विश्वविद्यालयों में एक पद के नियोजन का विज्ञापन निकलता है और पदपूर्ति में वर्षो लग जाते हैं क्योंकि विज्ञापन,आवेदन,साक्षात्कार,राजनैतिक दबाब और कोर्ट के स्टे इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही नियुक्ति प्रक्रिया पूर्ण होना संभव है। महाविद्यालयों में शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया और भी जटिल है,महाविद्यालयीन शिक्षा राज्य सरकारों के जिम्मे रहती है अत: यह राज्य सरकारों के पर निर्भर रहता है कि वह शिक्षकों की नियुक्ति कब और कैसे करें ? हालॉकि अनेक राज्यों में यह कार्य वहॉ का राज्य लोक सेवा आयोग करता है जिसके अपने नियम और कायदे होते हैं। अगर राज्य सरकार पदपूर्ति का मन बना भी ले तब भी कम से कम तीन से चार वर्ष में भर्ती प्रक्रिया पूर्ण हो पाती है। चूकि शिक्षक सेवानिवृत तो प्रतिवर्ष हो रहें है लेकिन नियुक्तियॉ वर्षों से बंद है ?जैसे कि म.प्र. में लगभग 20 वर्ष से व्यापक स्तर पर भर्ती प्रक्रिया बंद है और शिक्षण संस्थान शिक्षकों से सूने है। ऐसे में हम यह अंदाजा आसानी से लगा सकते है कि देश में उच्चशिक्षा के हालात कैसे है?

 

               देश में उच्चशिक्षा के नियमन के लिए यूजीसी(विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) जैसी नियामक संस्था मौजूद है जो देश में उच्चशिक्षा की व्यवस्था के लिए नियम और शर्तें तय करती है,शिक्षकों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता को निर्धारित करती है। यूजीसी ने वर्तमान में उच्चशिक्षा संस्थान कें सबसे कनिष्ठ पद व्याख्याता या सहायक प्राध्यापक पद के लिए न्यूनतम योग्यता पीएचडी या राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा(नेट)उत्तीर्ण निर्धारित की है। यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ) विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों में शिक्षकों के पद के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक पात्रता परीक्षा नेट का आयोजन करती है यह परीक्षा वर्ष में दो बार आयोजित होती है यह काफी जटिल और स्तरीय परीक्षा है। देश में पीएचडी की डिग्री भी यूजीसी द्वारा निर्धारित गाइडलाइन के अनुसार कराई जाती है इसमें अध्येता तीन से चार वर्ष तक एक विशिष्ट विषय का अध्ययन कर शोध उपाधि प्राप्त करता हैं। देश के विश्वविद्यालयों की पीएचडी उपाधि और नेट परीक्षा का स्तर विश्वस्तरीय है और इनको पूर्ण कर शिक्षक पद पर नियुक्त होने वाला प्रत्याशी निश्चित रूप से योग्यता की कसौटी पर खरा होगा। इसके साथ विभिन्न राज्यों में राज्य स्तर पर स्लेट नाम से पात्रता परीक्षा आयोजित होती है। लेकिन विडम्बना तो यही है कि देश भर में हजारों की संख्या में नेट,स्लेट परीक्षा उत्तीर्ण और पीएचडी धारी सड़कों पर है जबकि उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों के नाम पर या तो सन्नाटा है या फिर गेस्ट या संविदा शिक्षक के जरिए काम चलाया जा रहा है।

 

               ऐसे हालात में देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था का पतन निश्चित है सरकार को चाहिए कि वह अपने उच्चशिक्षा संस्थानों में शिक्षकों के पदों की पूर्ति तुरन्त करे इसके लिए एक मात्र फार्मूला होना चाहिए यूजीसी द्वारा निर्धारित पात्रता प्राप्त प्रत्याशी को सीधी नियुक्ति दी जाए जिससे पदपूर्ति प्रक्रिया सहज और त्वरित होगी। यूजीसी राज्य सरकारों को भी निर्देर्शित करे कि उच्चशिक्षा में शिक्षकों की नियुक्ति उसके निर्देशांनुसार होनी चाहिए और इसे पीएससी के दायरे से मुक्त कर यूजीसी नेट और पीएचडी उपाधिधारी को सीधे शिक्षक पद पर नियुक्त करे।यूजीसी द्वारा पात्र घोषित प्रत्याशियों को पीएससी की कसौटी पर कसना वास्तव में इसकी स्वायत्तता और उत्कृष्टता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। देशभर के विवि और महाविद्यालयों में लम्बे समय से ऐसे शिक्षक संविदा और अतिथि शिक्षक के तौर पर काम कर रहें है जो कि यूजीसी द्वारा शिक्षक पद के लिए निर्धारित योग्यता को पूर्ण करतें है,उन्हें नियमित करने की प्रक्रिया करनी चाहिए जिससे इन संस्थानों के शैक्षणिक और शोधाकार्य को गति मिल सके।

 

               चूकि जयराम रमेश एक संवेदनशील मंत्री है अत: देश के उच्चशिक्षा जगत के गिरते स्तर से उनकी चिंता स्वाभाविक है लेकिन सच तो यह है कि देश के उच्चशिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी है न कि इनके शिक्षक अयोग्य हैं। यह तो इंजी. रमेश भी जानते हैं कि शून्य में संवाद नहीं होता है।


? डॉ. सुनील शर्मा