संस्करण: 06 जून-2011

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी बनेगा
नया कानून

? एल.एस.हरदेनिया

               सांप्रदायिक हिंसा को रोकने और हिंसा के अपराधियों को सजा दिलवाने के लिए एक विधेयक का प्रारूप तैयार किया गया है। यह प्रारूप सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने तैयार किया है। परिषद ने अपने कुछ सदस्यों को विधेयक का प्रारूप बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा था। इन सदस्यों में ऐसे लोग शामिल थे जिन्हें सांप्रदायिक हिंसा से जूझने का अनुभव है।

               सांप्रदायिक हिंसा हमारे देश की एक अत्यधिक गंभीर समस्या है। आज़ादी के बाद सबसे पहला बड़ा सांप्रदायिक दंगा मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ था। जबलपुर के साथ-साथ आसपास के छोटे नगरों में भी सांप्रदायिक हिंसा की घटनायें हुई थी।

               सन् 1961 में जबलपुर में हुए इस दंगे के बाद से अबतक देश के अनेक भागों में सांप्रदायिक दंगे हुए। देश का शायद ही कोई राज्य ऐसा होगा जहां दंगा न हुआ हो। हाँ,पश्चिम बंगाल में सन् 1977में पहली बार वामपंथी सरकार बनी। वामपंथी सरकार के सत्ता में आने के बाद वहां एक भी दंगा नहीं हुआ। यहां तक कि 1984में सिक्ख विरोधी हिंसा के दौरान भी पश्चिम बंगाल में एक भी सिक्ख का बालबांका नहीं हुआ।

               बाद के वर्षों में बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश में दंगे हुए। यहां तक कि दक्षिण भारत भी सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आ गया। इन सभी दंगों में सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों का हुआ। दंगों में मारे जाने के साथ-साथ उनकी संपत्ति की भारी हानि हुई। कुछ राज्यों में तो लगातार साल भर तक दंगे चलते रहे। सन् 1969में गुजरात में इतना भीषण दंगा हुआ कि जिसकी वीभत्सता की खबर सुनकर सीमांत गांधी खान अब्दुल खाँ पाकिस्तान से गुजरात आये। गाँधी के गुजरात में इतनी भयंकर सांप्रदायिक हिंसा से उन्हें गहरा सदमा पहुचा था। इतने बड़े पैमाने पर हिंसा क्यों हुई,इसका पता लगाने वे स्वयं भारत आये। उसी गुजरात में सन् 2002में उससे भी बड़ा दंगा हुआ जिसने सारे देश की आत्मा को झकझोर दिया। इसी तरह के दंगे बिहार,उत्तर प्रदेश व महाराष्ट्र में भी हुए।

               उत्तर प्रदेश में वहां की पी.ए.सी ने लगभग पचास मुसलमान नवयुवकों को एक बस में जबरदस्ती बिठाया और गंगा की एक नहर के पास गोली मारकर उनकी लाशों को गंगा में बहा दिया। गुजरात के दंगों में हुई क्रूरता के किस्से सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

               इन सारे दंगो के कुछ ऐसे पहलू हैं जिनके कारण एक नये प्रभावी कानून की आवश्यकता सबने महसूस की। सबसे महत्वपूर्ण कमजोरी यह रही है कि दंगाईयों को सजा नहीं होती। ऐसा कुछ हद तक कानूनों में कमियों से भी होता है। जो बहुसंख्यक दंगों में हिंसा करते हैं,उनके विरूध्द कोई भी गवाही देने को तैयार नहीं होता। यदि कोई भूलाभटका गवाही देने को तैयार हो भी जाता है तो उसे ड़रा-धमकाकर चुप करा दिया जाता हैं। इसके ठीक विपरीत यदि किसी अल्पसंख्यक अपराधी का मामला होता है तो उसके विरूध्द दर्जनों गवाह मिल जाते है और प्राय: मुसलमान अपराधी को सजा भी हो जाती है। यह एक ऐसा पहलू है जिसके कारण अल्पसंख्यक आतंक के साये में जीते हैं।

               दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका भी संदिग्ध रहती है। अनेक मामलों में ऐसा देखा गया है कि पुलिस या तो दंगाईयों से सहयोग करती है या दंगाईयों की हिंसक गतिविधियों को मूक होकर देखती रहती है। यह एक अत्यधिक खतरनाक स्थिति है। अनेक मामलों में पुलिस दंगा पीड़ितों को सुरक्षा देने के स्थान पर उन्हें और पीड़ा पहुचाती हैं। यह भी देखा गया है कि किसी दंगे के पूर्व अनेक अफवाहें फैलाई जाती हैं। अल्पसंख्यकों के विरूध्द विषवमन किया जाता है। छोटे-छोटे जुलूसों में भड़काऊ नारे लगाकर लोगों उत्तेजित किया जाता है। मीडिया भी सांप्रदायिकता हिंसा व घृणा फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

                इन सारी समस्याओं से निपटने के लिए एक नई व्यवस्था की आवश्यकता थी। इस नई व्यवस्था के लिए एक विस्तृत कानून बनाया जाना आवश्यक है। ऐसे कानून का प्रारूप बनाया गया है। यह दु:ख की बात है कि प्रारूप को बिना पढ़े लोगों ने उसकी आलोचना प्रारंभ कर दी है।

               विधेयक के प्रारूप में देश के उन समस्त समूहों की सुरक्षा के लिए प्रावधान किया गया है जो पिछले वर्षों में साम्प्रदायिक हिंसा से पीड़ित हुए। प्रारूप में स्पष्ट कहा गया है कि भारत के किसी भी राज्य में रहने वाले भाषायी या धार्मिक अल्पसंख्यक एवं अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के सदस्य, समूह की परिभाषा में आएंगे। यह देखा गया है कि जब भी दंगा होता है तो अल्पसंख्यक ही उसका खामियाजा भुगतते हैं। जैसे कश्मीर में हिन्दू पंडित, पंजाब में हिन्दू, महाराष्ट्र में अल्पसंख्यक हिन्दी-भाषी एवं दक्षिण भारतीय, असम में बांग्लाभाषी आदि। बाल ठाकरे और राज ठाकरे आदेश देते हैं कि उत्तर भारतीय मुंबई छोड़ दें। चूंकि उत्तर भारतीय अल्पसंख्या में हैं, इसलिए ठाकरे के गुंडे उन्हें पीटते हैं। सन् 1984 में कुछ राज्यों को छोड़कर लगभग सारे देश में सिक्खों को हिंसा का सामना करना पड़ा था जहां वे अल्पसंख्यक थे।

                इस तरह, इस प्रारूप में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने का भरसक प्रयास किया गया है। इसके लिए पुलिस व प्रशासन को अधिक जिम्मेदार बनाया गया है और यदि वे अपनी जिम्मेदारी निभाने में ढ़िलाई बरतते हैं तो उन्हें सख्त दंड देने की व्यवस्था की गई है। हिंसा के पूर्व, हिंसा के दौरान और हिंसा के बाद, पीड़ितों की समस्याओं के निदान के लिए एक शक्तिशाली एथारिटी के गठन का प्रावधान किया गया है। इस तरह की एथारिटी राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ राज्यों में भी स्थापित होगी। इसके पदाधिकारियों का चयन प्रधानमंत्री और प्रतिपक्ष के नेता तथा अन्य मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों की मिलीजुली समिति करेगी।

               दंगों के दौरान लोगों की हत्याएं तो होती ही हैं साथ ही आर्थिक हानि भी होती है। उनके घर और दुकानें जला और लूट ली जाती हैं। घर में जो कुछ भी होता है वह सब या तो नष्ट हो जाता है या लूट लिया जाता है। परंतु इस नुकसान की भरपाई न के बराबर हो पाती है। प्रारूप में नुकसान की पूरी क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की गई है।

               दंगों के दौरान अनेक पीड़ित अपना सब कुछ खो देते हैं। दंगों के दौरान और दंगों के बाद पीड़ितों को राहत शिविरों में रखा जाता है। परंतु मेरा स्वयं का अनुभव यह है कि इन शिविरों में आवश्यक सुविधाएं मुहैय्या नहीं कराई जातीं। यहां तक कि भोजन, सफाई, दूध और दवाई तक की आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में नहीं होती। इन सभी आवश्यक वस्तुओं का प्रदाय निर्बाध रूप से होता रहे,इसे सुनिश्चित करने के लिए शिविरों के निरीक्षण का प्रावधान किया गया है।

               गुजरात के सन् 2002 के दंगों के बाद जो शिविर बनाए गए थे उनमें नारकीय स्थिति थी। इस अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि शिविरों की व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त रखना अत्यावश्यक है।

               बाबरी मस्जिद के ध्वंस और गुजरात दंगों के बाद मुसलमानों की भारतीय व्यवस्था में आस्था डगमगा गई थी। इस विधेयक से मुसलमानों की यह आस्था पुनर्स्थापित होगी। सन् 1984 में सिक्खों ने भी यह आस्था खो दी थी। इसी तरह, अनेक स्थानों पर ईसाईयों पर भी हमले हुए हैं जिनसे इस समूह की हमारी व्यवस्था पर आस्था भी डगमगा गई है। नागरिकों के जानोमाल की सुरक्षा करना शासन का सबसे प्रमुख कर्तव्य है। यदि कोई समाज या राष्ट्र अपने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता तो ऐसे समाज का राष्ट्र का भविष्य अंधकारमय होगा। यह प्रारूप एक प्रकार से देश के सभी अल्पसंख्यकों को सुरक्षा की गारंटी देता है।

               हो सकता है कि इस प्रारूप में कुछ कमियां हों। उन कमियों को बातचीत से दूर किया जा सकता है। अभी तो यह प्रारूप संबंधित मंत्रालयों में जाएगा,उसके बाद उसे मंत्रिपरिषद के सामने पेश किया जाएगा। मंत्रिपरिषद की मंजूरी के बाद उसे संसद में पेश किया जाएगा। संसद में उस पर बहस होगी। इस लंबी प्रक्रिया के बाद यदि धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्यों एवं महिलाओं को बेहतर सुरक्षा मिलती है तो यह देश हित में होगा। आखिर हिंसा से जो नुकसान होता है उससे उस व्यक्ति या समूह का नुकसान तो होता ही है,देश का नुकसान भी होता है। यदि नए कानून से यह सब कुछ रोका जा सके तो उसका स्वागत होना चाहिए।

? एल.एस.हरदेनिया