संस्करण: 06 जून-2011

हिन्दुत्व के रणबांकुरों पर नकेल

? सुभाष गाताड़े

               अपने गांव जाओ, अपने गांव जाओ और हल्ला करो कि सारा हिन्दु एक तरफ हो जाओ। क्षेत्र को पाकिस्तान होने से बचाओ, और सारा हिन्दू एक तरफ हो जाओ। ...

 

               क्या यह सच नहीं है कि... कि उसको बोला गया कि माताजी आप का नाम क्या है... अगर उसने बोला कि बिमला देवी, तो उसको कहा की देखेंगे, सोचेंगे... पहले पांच हजार रूपए दो....अगर उसका नाम हो सायरा बानो या जो भी बेगम हुकूम बेगम...हम तो जानते नहीं हैं..बड़े डरावने नाम होते हैं इनके...करीमुल्ला..मजहरूल्लाह....अगर रात को कभी दिख जाएं ..तो डर रहे हैं।....

(वरूण गांधी 28 मार्च 2009, इण्डियन एक्सप्रेस, 18 मार्च 2011)


               हिन्दुत्व ब्रिगेड के उभरते कर्णधार और अपने श्रीमुख से अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलनेवाले भाजपा के सांसद वरूण गांधी के खिलाफ अन्तत: पीलीभीत जिले की अदालत ने आरोप तय किए हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान वरूण गांधी के भडकाऊ वक्तव्यों की काफी चर्चा हुई थी और उसी के चलते उन्हें कुछ दिन जेल में ही बीताने पड़े थे।

 

              अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक जनाब वरूण गांधी पर भारतीय दंड विधान की धारा 505 (नफरत फैलाना), 153(ए) समुदाय विशेष पर आरोप लगाना, तथा 295(ए) धार्मिक आस्थाओं का अपमान कर भावनाओं को जानबूझ कर भड़काना के तहत आरोप तय किए गए हैं। इसके अलावा जनाब वरूण गांधी पर लोक प्रतिनिधित्व कानून के तहत भी मुकदमा चलेगा। अगली सुनवाई की तारीख 6 जुलाई तय की गयी है।

 

               इण्डियन एक्सप्रेस के संवाददाता के मुताबिक वरूण गांधी ने कहा था : ' ये पंजा नहीं है, ये कमल का हाथ है। ये कट..... के गले को काट देगा चुनाव के बाद। जय श्रीराम ! रामजी की जय ! वरूण गांधी काट डालेगा! काट देंगे उस हाथ को, काट देंगे, काट डालेगा!... 'अगर किसी ने, किसी गलत तत्व के आदमी ने, किसी हिन्दू पे हाथ उठाया... तो मैं गीता की कसम खाके कहता हूं कि मैं उस हाथ को काट डालूंगा।... ; यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मार्च 2009 में पीलीभीत में आम सभा में दिए गए वक्तव्यों के बाद, जो हजारों की तादाद के बीच दिए गए थे, आखिर आरोप निर्धारित करने में लगभग दो साल का समय क्यों लग गया ?

 

              फिलवक्त यह बताया नहीं जा सकता कि मामले के निपटारे में कितना वक्त लगेगा। और ऐसे नफरत फैलानेवाले वक्तव्यों के बावजूद अन्तत: कितने गवाह टिके रहेंगें ! इसकी वजह यह है कि बीते दशक में जिन जिन लोगों के खिलाफ इन धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज किए वह बेहद धीमी गति से चल रहे हैं।

 

               मालूम हो कि फरवरी माह के आखरी सप्ताह में (2003) ही सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को एक नोटिस जारी किया था ताकि ''भडकाऊ वक्तव्य'' देने के लिए जनाब नरेंद्र मोदी, अशोक सिंहल जैसों पर सख्त कार्रवाई की जा सके। इसी सिलसिले में सर्वोच्च न्यायालय की श्री लाहोटी और श्री ब्रजेश कुमार की पीठ ने महाराष्ट्र, गुजरात सरकार को भी एक नोटिस जारी किया गया था। गौरतलब है कि उपरोक्त याचिका श्री अलिम पदमसी, श्री बी.जी.वर्गीस, श्री कुलदीप नैयर, सुश्री तिस्ता सीटलवाड और श्री वालजीभाई पटेल जैसे कई प्रमुख पत्रकारों, समाजसेवियों ने संयुक्त रूप से दायर की थी । याचिका में '' चन्द निहित स्वार्थी तत्वों का उल्लेख करते हुए जो सत्ता पाने के लिए और अपने मकसद को आगे बढ़ाने के लिए वर्ष 2002 में सामने आये सबसे खूनी जनसंहार को नये सिरे से दोहरना चाहते हैं '' की बात रखते हुए उस स्थिति में ''हर नागरिक के जिन्दगी और स्वतंत्रता के अधिकार की हिफाजत की गारंटी प्रदान करने की'' बात कही गयी थी ।

 

               राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने तो इस मामले में कई बार निर्देश जारी किये थें जिसमें उसने साम्प्रदायिक तनावों और हिंसा को भड़काने वाले वक्तव्यों पर गंभीर कार्रवाई करने का आदेश दिया था। उसने ''गुजरात पर अपने अन्तिम आदेश'' (31 मई 2002) के तहत तोगडिया, मोदी, सिंगल एण्ड कम्पनी के विभिन्न भडकाऊ बयानों पर गौर करते हुए जिन्होंने गोधरा की दुखद घटना के बाद वातावरण को विषाक्त बनाने में भूमिका अदा की के सिलसिले में निर्देश दिया था कि ''ऐसे वक्तव्यों की जांच की जाये और उस पर कार्रवाई की जाये।..''एमनेस्टी इण्टरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय मानवाधिकार संस्था ने भी '' अशोक सिंगल द्वारा दिये जा रहे भडकाऊ बयानों को गंभीरता से लेते हुए यह भी चेतावनी दी थी कि इस तरह के बयान आते रहे तो ''नये सिरे से हिंसा भड़क सकती है और फिर पहले से भारी परेशानी में रह रहे लोगों की जानमाल की सुरक्षा का खतरा खड़ा हो सकता है।''(16 सितम्बर 2002)

 

               अगर हम ऐसे मामलों में कानून के प्रावधाानों पर निगाह डालें तो हमें दिखता है कि वहां पर इस मामले में बिल्कुल स्पष्टता है। मसलन भारत की दण्ड विधान धारा 153 ए के तहत किसी भी दो समुदायों में धार्म के आधार पर दुश्मनी को बढ़ावा देना एक आपराधिक मामला है। अगर हम एमनेस्टी इण्टरनेशनल द्वारा 16 सितम्बर 2002 को जारी किये वक्तव्य को गौर से देखें तो हमें पता चलेगा कि भारत की दण्ड विधान की धारा 153के तहत दंगा फैलाने के नियत से दिये गये भडकाऊ वक्तव्य के लिए आपराधिाक मुकदमा चलाया जा सकता है, उसी तरह राष्ट्र की एकता को खतरे मे डालनेवाले बयानों पर (धारा 153बी) या किसी दूसरे व्यक्ति की धार्मिक भावना को भडकाने के लिए जानबूझकर दिये गये वक्तव्य (धारा 29बी) पर कार्रवाई की जा सकती है। धारा 505 (1), बी और सी के तहत सार्वजनिक शान्तिभंग के लिए कार्रवाई की जा सकती है तो विभिन्न तबकों के अन्दर दुश्मनी, घृणा या वैरभाव पैदा करने वाले बयानों पर धारा 505/2 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

 

               इस सिलसिले में गृहमंत्रालय द्वारा वर्ष 1997 में ''साम्प्रदायिक सदभाव बढ़ाने के लिए जारी दिशानिर्देशों' पर गौर करें तो हमें दिखता है कि साम्प्रदायिक तनावों के मामले में वह राज्य मशीनरी की जिम्मेदारी को तय करता है। निर्देश नंबर 15 कहता है कि '' ऐसी दारूण घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जिला प्रशासन को चाहिये कि वह उचित कदम बढ़ायें।'' इस सम्बन्धा में अगर हम भारत सरकार द्वारा वर्ष 1979 में स्वीकृत नागरिक और राजनीतिक अधिाकारों के लिये प्रस्तुत अंतरराष्ट्रीय संधि को देखें तो वहां भी सरकार ने इस बात के लिए अपनी प्रतिबध्दता दोहरायी है कि वह ''भेदभाव, आपसी वैरभाव या हिंसा को बढ़ावा देने वाले अंधाराष्ट्रवादी, नस्लीय और धार्मिक घृणा फैलाने वाले कदमों पर कानून के तहत पाबंदी लगाएगा।''

 

               चिंताजनक बात यह है कि इस तरह के बयान देने में हिन्दुत्व ब्रिगेड के तमाम रथी महारथी आगे ही रहते हैं। लोगों को याद होगा कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जिन्होंने गुजरात में जारी जनसंहार के सिलसिले में ''न्यूटन के क्रिया- प्रतिक्रिया के सिध्दान्त'' की दुहाई दी थी उन्होंने अपनी गौरव यात्रा में साफ साफ कहा था कि ''गुजरात को अगर विकसित होना है तो एक ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी कि प्रत्येक बच्चे को शिक्षा , संस्कार और रोजगार मिले। लेकिन इसके लिये उन लोगों को ध्यान रखना होगा जो अपनी आबादी धुआंधार बढ़ाते जा रहे हैं।'' शिवसेना के सुप्रीमो बाल ठाकरे ने अपनी दशहरा रैली में ''हिन्दू आत्मघाती दस्ते बनाने की हिमायत की थी जो आतंक फैला सकें।''

 

               स्वाभाविक तौर पर प्रश्न उठता है कि कानून के इतने सारे प्रावधाानों के बावजूद यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में जारी दिशानिर्देशों के बावजूद आखिर नफरत फैलानेवाले वक्तव्य बेरोकटोक क्यों जारी हैं ?

 

               इसकी वजह ऐसे मामलों के निपटारे में होनेवाली अक्षम्य देरी है, जिसके चलते 2002 में जिन लोगों पर मुकदमे कायम हुए उन्हें आज तक किसी भी कार्रवाई से बचाया जा सका है। न्यायपालिका के एक हिस्से में व्याप्त साम्प्रदायिक चिन्तन भी ऐसे मामलों में आततायियों को दण्डित करने से बचता है।

 

               यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि संघ परिवारी संगठनों का नेतृत्व इस मामले में सूचक मौन बनाए रखता है। एक तरह से उनके बीच व्याप्त श्रम विभाजन भी सामने आता है। वह इस हकीकत को भी बेपर्द करता है जिसमें एक तरफ वरूण गांधी, सिंगल, तोगडिया एण्ड कम्पनी जहर उगलते हैं, अल्पसंख्यक समुदायों का मज़ाक उड़ाते हैं, हिन्दु आत्मघाती दस्तों के बनाने की बात करते हैं और दूसरी तरफ आडवाणी, सुषमा स्वराज्य जैसे लोग संयम, सहिष्णुता की अपील करते हैं।

 

               गौरतलब है कि गुजरात जनसंहार के बाद आउटलुक के सम्वाददाता के साथ ( 4 नवम्बर 2002) बातचीत में एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने इस ''कार्यप्रणाली'' पर रौशनी डाली थी। उसका साफ कहना था कि '' कोई भी सक्रिय नेता आप को बता देगा कि यहां पर खुले और छिपे हुए एजेण्डा को अंजाम दिया जाता है। जहां लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग खुले राजनेता हैं तो तोगडिया जैसे लोग छिपे राजनेता हैं। वे जो कुछ कहते हैं उनमें कोई फरक नहीं होता। बस जो भाषा अपनायी जाती है वह अलग होती है। आडवाणी सरकार में बैठे हैं जबकि तोगडिया बाहर हैं। इसलिये आडवाणी की बात में संयम दिखना चाहिये जबकि तोगडिया एक आजाद आदमी हैं। देखिये तोगडिया, मोदी या सिंगल जैसे लोग हमारा काम कर रहे हैं, वे समूचे परिदृश्य का भगवाकरण कर रहे हैं। भाजपा और कुछ नहीं है संघ के कई सारे मंचों का एक गठजोड़ है। ( Outlook, 4 Nov 2002)

 

अन्तत: जरूरत इस बात की है कि ऐसे सभी मामलों मे विशेष अदालतों का गठन कर सत्वर फैसले लिए जाए ताकि आइन्दा कोई सिंघल, कोई तोगड़िया या किसी वरूण गांधी को अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर उगलने के पहले सौ बार सोचना पडे।

? सुभाष गाताड़े