संस्करण: 06 फरवरी- 2012

घोषणा पत्रों पर अमल का

रास्ता भी पूछे आयोग

? सुनील अमर

               लोकसेवकों की सेवा पश्चात राजनीतिक सक्रियता को लेकर अपनी चिंता से चुनाव आयोग ने सरकार को अवगत कराते हुए सुझाव दिया है कि सेवा निवृत्ति/मुक्ति और राजनीतिक सक्रियता के बीच एक निश्चित अंतराल का होना आवश्यक है जैसा कि सेवा पश्चात उनके निजी क्षेत्र में नौकरी करने को लेकर अभी एक वर्ष का प्रतिबंध लगा हुआ है। आयोग चाहता है कि लोकसेवक अगर नौकरी से निवृत्त हों तो एक निश्चित अवधि तक उनके राजनीति में जाने पर पाबंदी हो ताकि वे सेवाकाल के अपने प्रभाव का इस्तेमाल राजनीतिक दलों के साथ न कर सकें। आयोग का यह सुझाव उचित ही है। देश के बहुत से नौकरशाहों का इतिहास है कि वे सेवाकाल में ही सत्तारुढ़ दलों के मुसाहिब बनकर बाद में उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। उत्तर प्रदेश तो ऐसे कृत्यों के लिए खासा कुख्यात रहा है। सेवा के बाद एक साल तक निजी क्षेत्र की नौकरी न करने का प्रतिबंध भी बहुत प्रभावी नहीं है। इसका उल्लंघन करने पर सेवा पश्चात की सकल प्राप्तियों को जब्त कर लेने का प्राविधान है। बहुत से नौकरशाह इसे छोड़कर निजी क्षेत्र की नौकरी कर लेते हैं। इस प्रसंग में एक समय के दूरदर्शन के महानिदेशक भास्कर घोष का उदाहरण पर्याप्त है जिन्होंने इस ऊॅची सरकारी कुर्सी को छोड़कर स्टार टेलीविजन की नौकरी कर ली थी। इस सम्बंध में जब उनसे पत्रकारों ने पूछा था कि आपकी परिलब्धियाँ जब्त की जा सकती हैं तो उन्होंने कहा था कि इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पूरी नौकरी करने के बाद भी वहॉ जो कुछ मिलता उससे ज्यादा तो यहॉ हर महीने मिल रहा है!

                प्रसंगवश इसी के साथ आयोग का ध्यान राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्रों की तरफ भी जाना चाहिए। एक लम्बे अरसे से हम देख रहे हैं कि राजनीतिक दल चुनाव के समय अपनी नीतियों व कार्यक्रमों के साथ-साथ तमाम छद्म घोषणाओं को लेकर जनता के सामने आते हैं और अक्सर ये घोषणा पत्र अव्यावहारिक हो जाते हैं। सभी जानते हैं कि ऐसे लोकलुभावन घोषणा पत्र मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए ही होते हैं और सत्ता में आने के बाद ऐसी घोषणाऐं करने वाले राजनीतिक दल इन्हें ठंढ़े घर में डाल देते हैं क्योंकि इनका क्रियान्वयन संभव ही नहीं होता। यह साफ-साफ मतदाताओं के साथ धोखा है। अब क्योंकि इस खेल में सभी राजनीतिक दल लगे रहते हैं इसलिए कोई भी दल किसी दूसरे दल के हवा-हवाई घोषणापत्रों का विरोध नहीं करता। खानापूरी के तौर पर उसकी खिल्ली भले ही उड़ा देते हैं।

               यह तर्क दिया जा सकता है कि लोकतंत्र में चुनाव लड़ना और अपनी नीतियों-योजनाओं को प्रसारित-प्रचारित करना प्रत्येक प्रत्याशी/दल का अधिकार है और यह निर्बाध होना चाहिए लेकिन इसी के साथ क्या यह नहीं होना चाहिए कि ऐसी घोषणाऐं कर सत्ता में आने वाले राजनीतिक दलों से उनके क्रियान्वयन का ब्यौरा भी तलब किया जा सके?प्रकारान्तर से ऐसी घोषणाऐं करने वालों से इस बात के ब्यौरे भी मॉगे जाने चाहिए कि उनके पास ऐसी घोषणओं को पूरा करने की योजनाऐं क्या हैं और उसके संसाधन कहॉ से जुटायेगें। कर्नाटक के 2008के विधानसभा चुनाव में भाजपा यानी राजग तमाम ऐसी ही शेखचिल्ली मार्का घोषणाऐं करके सत्ता में आई थी। प्रदेश के 11लाख से अधिक गरीब परिवारों को 2 रुपया प्रतिकिलो चावल देना, किसानों को 3 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर कर्ज देना, 15 लाख गरीब परिवारों को मुफ्त मकान देना, सभी बेरोजगारों को 1500 रुपया प्रतिमाह भत्ता देना, खेती के लिए मुफ्त बिजली तथा किसानों की उपज का मूल्य स्थिर रखने के लिए 500 करोड़ रुपये का एक खाद्यान्न कोष स्थापित करना उसके घोषणा पत्र में शामिल था। भाजपा सत्ता में आ भी गई लेकिन सभी जानते हैं कि सत्ता में आकर उसने वहॉ असली खेल क्या किया! उक्त सारी घोषणाऐं अगर पूरी की जातीं तो पॉच वर्षों में वहॉ करीब एक लाख करोड़ रुपयों की आवश्यकता थी! चेन्नई में चुनाव जीतने वाली सुश्री जयललिता ने भी प्रत्येक छात्र को लैपटॉप देने का वादा किया हुआ था!

               उत्तर प्रदेश में इन दिनों घोषणाओं के नाम पर कोहराम मचा हुआ है। आसमान से चॉद-तारे लाने की बात अगर छोड़ दें तो बाकी सारी घोषणाऐं राजनीतिक दल कर रहे हैं। मसलन छात्रों को लैपटॉप देने की बात की जा रही है तो जीत जाने पर क्षेत्र में सायकिल के कारखाने लगाने के वादे हो रहे हैं। गो-वध पर दंड के वादे किये जा रहे हैं और किसानों को महज 1 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर कर्ज व एक लाख तक कर्ज की माफी की घोषणाऐं की जा रही हैं साथ ही बेटी के जन्म पर 30,000 रुपये एकमुश्त तो लघु किसानों को 24 हजार वार्षिक की पेंशन व सबको 24 घंटे बिजली के झुनझुने थमाए जा रहे हैं!चुनावी घोषणा पत्र जारी कर रहे एक राजनीतिक दल के राष्ट्रीय महासचिव से जब पत्रकारों ने पूछा कि सत्ता में आने पर इन घोषणाओं को पूरा करने के लिए आप धन कहाँ से लाऐंगें तो उन्होंने कहा कि अगर आपके पास इच्छाशक्ति है तो रास्ता निकल ही आता है!लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की समस्त हिमायत के बावजूद यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि अगर आप कार्यक्रम ला रहे हैं तो उनके क्रियान्वयन के लिए धन की व्यवस्था के बारे में आपकी योजना क्या है? और धन के व्यवस्था की कोई योजना आपके पास नहीं है तो खर्चे की योजना आप क्यों बना रहे हैं? क्या यह मतदाताओं के साथ धोखा नहीं है?

                   मूर्तियों को ढॅक़ने जैसा कदम उठाने वाले चुनाव आयोग को इस तरफ भी जरुर धयान देना चाहिए। यह किया जा सकता है कि चुनाव घोषणापत्र जारी करने वाले राजनीतिक दल उसी के साथ-साथ राजस्व संग्रह के ब्यौरे भी पेश करें कि सत्ता में आने पर वे इस रास्ते से धान लाऐंगें तथा उस रास्ते से खर्च करेंगें। अभी तो सारा मामला बहुत ही हास्यास्पद और लगभग आपराधिक सा है जिसमें सिर्फ अंधाधुंध खर्च की घोषणा की जाती है किन्तु कमाई की नहीं! जिन राजनीतिक दलों पर चुनाव के रास्ते सरकार में आने और फिर देश-प्रदेश के संरक्षण और विकास का दारोमदार होता है उन्हें यह जरुर बताना चाहिए कि वे राजस्व वृध्दि के लिए क्या-क्या तरीके अपनायेगें। कहा जा सकता है कि यह राजनीतिक दलों का नहीं बल्कि विशेषज्ञों व अर्थशास्त्रियों का काम है लेकिन जिन राजनीतिक दलों की घोषणाओं को संज्ञान में लिया जाता है उनके पास अकूत धन और हर प्रकार के विशेषज्ञों से युक्त संगठन हैं। साथ ही वे हर प्रकार की सलाह प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। छोटे दलों या निर्दलियों को ऐसे प्रतिबन्धों में आवश्यक छूट दी जा सकती है।

                 यह सच है कि हर चुनाव के बाद मतदाता अपने को ठगा महसूस करता है। वह देखता है कि उसके भले के लिए तमाम वादे करके सत्ता में आ बैठे राजनीतिक दल फिर एक दूसरा ही एजेन्डा लागू कर देते हैं और वह होता है उनकी मनमानी का। यही कारण है कि आज अदना से अदना मतदाता भी यह जानता है कि चुनाव बाद आने वाली सरकार उनकी कमर तोड़ने के कई कार्यक्रम ले ही आएगी। ऐसे में राजनीतिक दलों द्वारा एक सुविचारित घोषणापत्र तथा उस पर अमल की योजना का होना अत्यंत आवश्यक है। सबको लैपटाप, दुधारु गाय, पेंशन, बेरोजगारी भत्ता, 24 घंटे की बिजली और कर्जमाफी जैसी घोषणाऐं करने वाले मुंगेरीलालों से इनको पूरा करने का रास्ता भी साथ ही साथ पूछा जाना ही चाहिए।

? सुनील अमर