संस्करण: 04 अगस्त- 2014

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बुध्दि अखिलेश होती है तो जिंदगी उत्तरप्रदेश हो जाती है

     जिस देश की बड़ी आबादी के पास कपड़े-लत्तो और हगने-मूतने के भी पर्याप्त साधन नहीं हैं, दो जून की रोटी भी बमुश्किल जुटा पाते हैं, उस देश में ऐसे लोगों की कभी-कभी अचानक बहुलता दिखने लगती है जो मामूली सी बातों पर खून-खराबा करने लगते हैं। सैकड़ों की तादात में लोग अपना काम-धंधा छोड़कर सड़कों पर उतर आते हैं और दूसरों की रोजी-रोटी का जरिया जलाकर खाक कर देते हैं।       

? विवेकानंद


पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हिंसा के पीछे की राजनीति

        वोटों की राजनीति में साम्प्रदायिक धृवीकरण हमेशा बहुसंख्यकों के नाम से बने दल को लाभ पहुँचाता है। यही कारण है कि बहुसंख्यकों की पक्षधरता करने वाले राजनीतिक दल न केवल ऐसे अवसर तलाशते हैं अपितु साम्प्रदायिक तनाव के बीज बोने की निरंतर कोशिश करते हैं। ऐसे दलों ने विधिवत संगठन बना कर साम्प्रदायिकता को बढावा देने का अभियान चला रखा है। दिखावे के लिए वे राष्ट्रवाद और समाजसेवा का चोगा पहिन लेते हैं क्योंकि अपने मूल स्वरूप की बदसूरती से वे खुद भी परिचित होते हैं।

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वीरेन्द्र जैन


अखिलेश की इस बेबसी के निहितार्थ

     त्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा पिछले साल मुजफरनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद, आज तक पष्चिमी उत्तर प्रदेश के हालात को सामान्य न कर पाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। लंबे समय से सुलग रहे पष्चिमी उत्तर प्रदेश में परदे के पीछे का राजनैतिक समीकरण और रणनीति क्या है तथा किसे इसका लाभ मिलेगा, का विष्लेशण आवष्यक हो जाता है। आखिर क्या वजह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में घटी छोटी-छोटी घटनाएं बड़े बवालों की वजह बन जा रही हैं और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बेबस हैं?

 ? रीना मिश्रा


दंगों पर नियंत्रण पाने के लिए गुजरात मॉडल को अपनाने की मांग

      लोकसभा चुनाव के दौरान गुजरात के विकास मॉडल की खूब चर्चा हुई। स्वयं नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों में बार-बार गुजरात मॉडल की बात करते थे। मोदी कहते थे मुझे सत्ता सौंपिए, गुजरात मॉडल के जरिये देश विकास के ऐसे रास्ते पर दौड़ेगा कि जितनी प्रगति कांग्रेस के 65 साल के राज में नहीं हो पाई वह मेरे 60 महीने के शासन में हो जायेगी। गुजरात मॉडल क्या है वह अभी तक आम आदमी की समझ में नहीं आ पाया है।

? एल.एस.हरदेनिया


इतिहास की ऐसी तैसी विध्दता के लबादे में अहमक

            'भारतीय संस्कृति के सकारात्मक पहलू इतने गहरे हैं कि प्राचीन प्रणालियों के गुणों को पुनर्जीवित किया जा सकेगा।'' .. :'जाति प्रथा प्राचीन समयों में अच्छी काम कर रही थी और हमें उसके खिलाफ किसी तबके की तरफ से कोई शिकायत नहीं मिलती। अक्सर उसके बारे में कहा जाता है कि वह एक शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था है जो शासकवर्ग के कुछ निहित स्वार्थी हितों के आर्थिक और सामाजिक ओहदे को बरकरार रखना चाहती है।'...' भारतीय जाति व्यवस्था, जो संस्कृति के विकास के बाद में चरण की जरूरतों को सम्बोधित करने के तौर पर विकसित हुई है, वह वर्णव्यवस्था से एकीकृत थी, जैसा कि प्राचीन ग्रंथों और धर्मशास्त्रों में लिखा गया है।''

 ?  सुभाष गाताडे


सिर्फ उत्पादन बढ़ाने से ही नही आएगी कृषि में खुशहाली

           भी कुछ दिन पहले ही, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 86वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम मे बोलते हुए कहा कि देश की तरक्की में किसानों का अहम योगदान है और उनकी भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि कृशि वैज्ञानिक नई तकनीक के सहारे ऐसी स्थिति लाएं,जिससे राष्ट्र व विश्व का पेट भरे और किसान की जेब भरे। नरेन्द्र मोदी ने कृषि वैज्ञानिकों से कहा कि वे अपने शोध के बारे में सरल शब्दों में किसानों को बताएं,जिससे कि किसान नई तकनीकों और पहल का उपयोग करने के लिए आसानी से आगे आ सके।

? हरे राम मिश्र


विद्युत गृहों के निजीकरण की साजिश

      बर है कि कोयले की कमी के चलते मध्यप्रदेश के ताप विद्युत संयंत्र बंद होने की कगार पर हैं। विद्युत संकट को मुद्दा बना कर सत्ता में आई भाजपा सरकार राज्य में तीसरी पारी खेल रही है और विद्युत आपूर्ति संबंधी उसके सारे दावे खोखले होते जा रहे हैं। हालात की बदतरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस दिषा में सरकार की तमाम कोशिशें बेनतीजा रही हैं। फिलहाल कोयले की कमी के कारण उत्पादन कम हो रहा है।

?  महेश बाग़ी


किसके भले के लिए हैं जैव संवर्धित बीज?

     जैव संवर्धित बीज यानी बीजों की प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ कर उन्हें अपने मनोनुकूल बनाना। इस शताब्दी की शुरुआत से ही इस तरह के बीजों के समर्थन व विरोध का खेल देश में चल रहा है। देश के तमाम जाने-माने वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, कृषिवैज्ञानिक व राजनेता जहाँ इस तरह के बीजों के देश में परीक्षण पर एतराज जता रहे हैं वहीं इसी तरह के कई लोग इसके समर्थन में भी लगे हैं जिसके कारण स्थिति बहुत दुविधापूर्ण हो गई है।

? सुनील अमर


सुनीता-कल्पना के लिए अपनापन क्यों?

        भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा खुद को पाकिस्तान की बहू और बाहरी बताए जाने के आरोपों से काफी दुखी हैं। पिछले दिनों एक अंग्रेजी न्यूज चैनल से बात करते हुए वे खुद को संभाल नहीं पाईं और कैमरे के सामने ही उनके आंसू छलक गए। सानिया काफी देर तक सुबकती रहीं। उन्होंने सवाल किया कि क्या दूसरे देशों में भी ऐसा होता है? क्या मुझे सिर्फ इसलिए टारगेट किया जा रहा है, क्योंकि मैं महिला हूं?

? डॉ.महेश परिमल


कम्पनी बोर्ड में महिलाएं चाहिए, फिर घरवाली को बुलाओ !

      नीता अम्बानी, रौशनी नाडार, सरला देवी बिरला, गौरी किर्लोस्कर, बीना मोदी और इसी तरह नामों की सूचि और लम्बी हो सकती है। इन नामों की गिनती का क्या मतलब है?यह सभी देश के अग्रणी कार्पोरेट घरानों से सम्बन्ध रखनेवाली महिलाएं हैं। कोई किसी बड़े कार्पोरेट सम्राट की पत्नी है,तो कोई बटी है तो कोई बहू है। वैसे इनमें एक और समानता है कि यह सभी अपने आत्मीयों द्वारा बनायी गयी कम्पनियों के बोर्ड में हालही में शामिल की गयी हैं। और यह कोई महज संयोग नहीं है।

? अंजलि सिन्हा


तेजाब पीड़िताओं के प्रति कब संजीदा होंगी सरकारें

        बीते साल जुलाई में महिलाओं पर तेजाबी हमलों को रोकने और तेजाब की बिक्री के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को जो दिशा-निर्देश जारी किए थे,उससे लगा था कि महिलाओं पर अब ये वहशी हमले रूकेंगे और देश भर की राज्य सरकारें जल्द ही अपने यहां इन दिशा-निर्देशों पर अमल करेंगी। एक साल से ज्यादा गुजर गया, लेकिन बिहार,जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी के अलावा किसी भी राज्य सरकार ने ........                   

? वसीमा खान


क्या एनजीओ विकास विरोधी है?

      देश में मोदी सरकार के गठन के बाद से ही एनजीओ की भुमिका पर प्रश्नचिंह लगाए जा रहे हैं। तथा विदेशी धन से पोषित कुछ एनजीओ को विकास विरोधी  और देश विरोधी निरूपित किया जा रहा है। इन्हें रोकने के लिए एफसीआरए के नियमों में बदलाव,एनजीओ पंजीकरण एवं मान्यता संबंधी नियमों में फेरबदल की बात की जा रही है। आई बी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कुछ गैर सरकारी संगठनों के विषय में कहा जा रहा है कि........

? डॉ.सुनील शर्मा


पाकिस्तान के प्राचीन मंदिरों की ओर आकर्षित होते है सभी आस्थाओं के लोग

        प्राचीन हिन्दू पवित्र स्थलों के बारे में दस्तावेजी साक्ष्य तैयार करने के लिये लेखिका रीना अब्बासी और फोटोग्राफर मदीहा ऐजाज ने समूचे पाकिस्तान में की गई अपनी यात्रा में धर्मान्धता से जूझती आस्था को देखा।                    

? मालिनी नायर


  04 अगस्त- 2014

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