संस्करण: 03 मार्च-2014

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वोट की लालच राजनीति की अम्मा

     देश को शर्मशार करने वाली राजनीति का जो उदाहरण तमिलनाडु की जयललिता सरकार पेश करने जा रही थी, उसे यदि सुप्रीम कोर्ट ने उसे समय रहते नहीं रोका होता तो इससे बड़ा उदाहरण कोई और नहीं हो सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की मौत की सजा को फांसी में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला किया वह संविधान के मुताबिक जनता को मिले अधिकारों के प्रकाश में किया, लेकिन इसके बाद जयललिता ने जिस तरह से राजीव के हत्यारों को रिहा करने का फैसला किया वह विशुध्द वोट की राजनीति था।     

? विवेकानंद


ऐसे गठजोड़ हताशा की निशानी हैं

        ताजा राजनीतिक घटनाक्रम में उदितराज ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है, और अपनी पार्टी इंडियन जस्टिस पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया है। नेताओं का अचानक दल या गठबन्धन का विपरीत धृवीय परिवर्तन न केवल आश्चर्यचकित करता है अपितु लोकतंत्र से जनता की आस्थाओं को कमजोर भी करता है। यह परिवर्तन अपने मतदाताओं को बँधुआ मानने के गलत विश्वास से ही सम्भव होता है।

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वीरेन्द्र जैन


राजनाथ जी भाजपा सहित संघ परिवार ने

मुसलमानों के साथ सैंकड़ों गलतियां की हैं

     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के सदस्यों को अलग-अलग तरह की बातें करने में विशेषज्ञता हासिल है। परंतु वे जब भी और जो भी बातें करते हैं,उनसे देश की एकता और समरूपता को ठेस पहुंचती है। अभी हाल में विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख कार्यकर्ता श्री अशोक सिंहल ने हिन्दुओं का आव्हान किया कि वे पांच-पांच बच्चे पैदा करें। सिंहल के अनुसार,जिस रतार से मुसलमानों व ईसाईयों की आबादी में बढ़ोतरी हो रही है उससे वह दिन दूर नहीं जब हिन्दू अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएंगे।

 ? एल.एस.हरदेनिया


भ्रष्टाचार के सवाल और मोदी की चुप्पी

      गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी काफी वाचाल हैं। उनके भाषणों को सुनने पर लगता है कि आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए वे कोई भी विषय बाकी नहीं रखना चाहते हैं। देशी भ्रष्टाचार से लेकर विदेशों में जमा तथाकथित कालेधन तक, वे  अपने हिसाब से प्रहार करते रहते हैं और इधार तो वे खुद को इस देश का चौकीदार भी घोषित कर दिए हैं। मोदी को लगातार सुनने वाले इस तथ्य से अवगत होंगें कि वे अपनी पसंद और सहूलियत का सिर्फ सवाल उठाते हैं, जवाब नहीं देते। जवाब इसलिए नहीं देते कि वे जवाब देने की हालत में है ही नहीं। मोदी के उठाए सवालों का जवाब तो भाजपा और संघ के पास भी नहीं है।

? सुनील अमर


क्या ममता और अन्ना का गठबंधन कामयाब होगा?

केजरीवाल को पटकनी देने का हजारे का प्रयास  

              काली मिर्च लोकसभा में स्प्रे करने से लेकर राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने के प्रयासों के इस युग में यदि कहीं कहीं राजनैतिक कॉमेडी भी हो रही है। अन्ना और ममता बनर्जी का गठबंधन भी एक राजनैतिक कॉमेडी ही है।

                कबीर दास ने कहा है, ''जिसका गुरू अंधरा, चेला खरा निरंध। अंधा अंधो ठेल्या, दुन्यु कूप पड़ंत।'' अन्ना और ममता का जो गठबंधन हुआ है, उसकी नियति कुछ इसी तरह की होने वाली है।

 ?   अमूल्य गांगुली


एक सामूहिक बलात्कार काण्ड के पचीसवें वर्ष में न्याय के लिए

अभी भी इन्तज़ार में कुनान पोशपोरा की औरतें

           स एम यासीन, जो जम्मू कश्मीर प्रशासनिक सेवाओं में उच्च पदस्थ अधिकारी रह कर सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उन्हें 24 साल पहले की अपनी वह यात्रा अभी भी याद है, जब वह कुपवारा में डेप्युटी कमीशनर के तौर पर तैनात थे और शहर के नजदीक स्थित कुनान और पोशपोरा गांव का उन्होंने दौरा किया था। वह पहले सरकारी अधिकारी थे....

? सुभाष गाताड़े


अपराधों के साये में सिसकता उत्तर प्रदेश

      गामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर इसे केवल एक सामान्य बात भर नहीं माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के कई दिग्गज सपा नेता जहां सदन के बाहर प्रदेश में कानून का राज होने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर सदन के भीतर सपा सरकार प्रदेश में अपराधों की बेलगाम बढ़ोत्तरी की बात स्वीकार करती है। पिछली मायावती सरकार के मुकाबले वर्तमान सपा सरकार में जिस तरह से कानून और व्यवस्था लगातार लचर और बिगड़ती जा रही है, उससे यह साफ हो चुका है कि .......

?  हरे राम मिश्र


भ्रष्टाचार में उलझा पीड़ितों का न्याय

     ध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बार-बार भ्रष्टाचार करने वाले के विरूध्द कड़ी कार्यवाही किए जाने की घोषणा करते है लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों, कर्मचारियों में इसका डर नहीं देखा जा रहा है। भ्रष्टाचार करने वाले नियम कानूनों का केवल अपने लाभ को ध्यान में रखकर उपयोग कर रहे हैं पैसा कमाने के लालच ने न्याय की व्यवस्था को भी प्रभावित किया है जिसके कारण पीड़ितों को समय पर न्याय नही मिल पा रहा है। पैसा ले देकर गंभीर अपराध करने वाले भी दोषमुक्त होते देखे जा रहे हैं।  

? अमिताभ पाण्डेय


वीवीपीएटी प्रणाली :

मतदाताओं को एक और अधिकार

        पिछले साल चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों को लेकर ईवीएम यानि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन की उपयोगिता पर अशोक गहलोत सहित अनेक नेताओं ने प्रश्नचिन्ह लगाया था। कई विधानसभा क्षेत्रों के अप्रत्याशित परिणामों पर इनका मानना था कि इन मशीनों में छेड़छाड़ के जरिए परिणामों में उलटफेर की गई की गई है। अभी हाल ही में म.प्र.के  एक कांग्रेसी सांसद ने भी ईवीएम पर अविश्वास जताते हुए  आगामी लोकसभा चुनाव मतपत्र के जरिए कराने की मॉग की है। इनका भी मानना है कि ....... 

? डॉ. सुनील शर्मा


भेदभाव रोकेगा समान अवसर आयोग

      मारे देश में समानता की चाह और उसके लिए जद्दोजहद का एक लंबा इतिहास है, जो आजादी के बाद भी हमारे संविधान में प्रतिबिंबित होता है। संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों में कानून के सामने बराबरी और रोजगार के समान अवसर के अधिकार शामिल हैं। जिन्हें नीति निर्देशक सिध्दांतों के जरिए और मजबूत किया गया। बाद में जोड़े गए अनुच्छेद अड़तीस में साफ किया गया है कि राज्य आय की विषमता को कम करने की कोशिश करेगा और सिर्फ व्यक्तियों बल्कि समूहों के बीच भी सुविधाओं और अवसरों की असमानता को दूर करने के कदम उठाएगा। लेकिन आजाद हिंदुस्तान का सढ़सठ साल का इतिहास बतलाता है कि संविधान की मुकद्दस कसमें समाज में मौजूद विषमता और भेदभाव के ताने-बाने में उलझकर बेअसर हो जाती हैं।        

? जाहिद खान


प्रश्न इच्छामृत्यु की वैधता का

        भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के अन्तर्गत मिले जीवन के अधिकार में किसी व्यक्ति की प्राकृतिक अथवा  स्वाभाविक आयु को घटाने या खत्म करने का अधिकार नहीं आता। आईपीसी की धारा 309 के अन्तर्गत आत्महत्या को अपराध माना गया है। इसलिए कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से जीवन को खत्म करने का अधिकारी नहीं है। इतना ही नहीं, यदि कोई अन्य व्यक्ति किसी पीडित व्यक्ति के कष्ट को समाप्त करने के लिए ही सही, दया मृत्यु की मांग करता है, तो उस पर आईपीसी की धारा 304 के तहत हत्या का मामला चलाया जा सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमारे देष के कानून में न तो इच्छामृत्यु और न ही दया मृत्यु की इजाजत दी गई है।

? सुनील तिवारी


फिल्मों में बदलती खलनायक की छवि

      जकल बॉलीवुड में खलनायक एक महत्वपूर्ण स्थान रखने लगा है। फिल्म की स्टोरी दर्शकों के गले उतारनी हो, तो खलनायक का पात्र इतना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि पहले खलनायक फिर उसके बाद नायक की खोज होती है। फिल्म की स्टोरी अब सकारात्मक अंत की तरफ कम ही जाती है। इसे अटकाने के लिए नकारात्मक पात्र के लिए ऐसे खलनायक को मैदान में उतारा जाता है, जो नायक को कड़ी टक्कर दे सके। यही नहीं, नायक को बुरी तरह से घायल कर उसे अधामरा कर दे, ताकि नकारात्मक पात्र को भी अपने दमदार अभिनय प्रतिभा को दिखाने का अवसर मिले।       

? डॉ. महेश परिमल


8 मार्च विश्व महिला दिवस पर विशेष

स्त्रियां कब तक अबला बनी रहेंगी ?

        संयुक्त राष्ट्र में मार्च 2013 में नर-नारी समानता, महिला सशक्तिकरण और प्रजनन अधिकारों को सुनिश्चित करने संबंधी घोषणापत्र पारित हो गया तो धार्मिक मान्यताओं से प्रेरित राज्य-व्यवस्था वाले देशों की स्त्रियों में भी नयी आशा का संचार हुआ। वस्तुत: जिन समाजों में स्त्री की वैयक्तिक स्वतंत्रता तथा उसके यौन आचरण पर नियंत्रण की प्रवृत्ति है वहां इसे सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़कर देखा जाता है और स्त्री के यौन एवं प्रजनन अधिकारों की बात को धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं पर आघात समझा जाता है।

? डॉ. गीता गुप्त


  03 मार्च-2014

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