संस्करण: 3 फरवरी-2014

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बार-बार झूठ, यह धोखा नहीं धोखेबाजी है

मोदी-अरविंद ने कराया देश को शर्मिंदा....?

     गुजरात में तीन बार सत्ता पाने के बाद नरेंद्र मोदी को संभवत: ऐसा विश्वास हो गया है कि जनता कुछ नहीं जानती,जैसा वह कह देंगे वैसा ही जनता सच मान लेगी। पता नहीं उनका यह विश्वास कितना पक्का है,लेकिन जिस तरह वे लगातार झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं,उससे तो लगता है कि सौ फीसदी पक्का है। एक और बात यह कि मोदी केवल आम आदमी को ही नासमझ और अज्ञानी नहीं मानते,बल्कि.......   

? विवेकानंद


कुमार विश्वास प्रसंग और मंच के कवियों का मूल्यांकन

        ब साठ के दशक में चीन के साथ सीमा पर विवाद हुआ तब जनता में राष्ट्रभक्ति और देश प्रेम की भावना को प्रोत्साहित करने के लिए बड़े पैमाने पर कवि सम्मेलन आयोजित किये गये थे। उस दौर से हिन्दी की गीत कविता के सरल सहज रूप का तेजी से विकास हुआ। इन कवि सम्मेलनों से कवियों को मार्गव्यय व स्वागत सत्कार के अलावा कुछ पारश्रमिक मिलना भी प्रारम्भ हो गया था जिसका परिणाम यह हुआ कि यश के साथ धन के आकांक्षी अनेक लोग हिन्दी कविता के इस उद्यम से जुड़ने लगे।

?

वीरेन्द्र जैन


इन सवालों पर अपना रुख स्पष्ट करे भाजपा

     भाजपा को कुछ सवालों का जवाब देकर देश की जनता का समाधान करना चाहिए। देश में जो संसदीय व्यवस्था है उसके अनुसार चुनाव के पश्चात राजनीतिक दलों के जीते हुए सांसद एक बैठक कर अपना नेता चुनते हैं और सरकार बनाने की नौबत आने पर ऐसा चुना हुआ नेता प्रधानमंत्री पद की शपथ लेता है। क्या भाजपा इस संसदीय व्यवस्था को मानती है? यदि हाँ तो उसने किस आधार पर चुनाव पूर्व ही एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर पार्टी के उपर थोप दिया है? क्या ऐसा करना पार्टी के सांसदों के अधिकार का हनन नहीं होगा?

 ? सुनील अमर


नीतीश कुमार ने फेंका चुनावी इक्का

      राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में रामनाथ ठाकुर और हरिवंश के नामों की घोषणा के बाद जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव तीन बार प्रयास करने के बाद भी कहकशां परवीन नहीं बोल पाए। इसके अनेक अर्थ है, परंतु मुख्य अर्थ यही निकलता है कि राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों का निर्धारण सोशल इंजीनियरिंग में माहिर नीतीश कुमार के इशारे पर ही हुआ है। चुनावी वर्ष में शुरुआत से ही बिहार में राजनीतिक सरगर्मियां तेज है।

? डॉ. दुलार बाबू ठाकुर


जरूरी है सभ्य समाज में पुलिस की जवाबदेही

              देश की पुलिस के जनविरोधी बनते चरित्र, लोकतंत्र के प्रति उसकी बढ़ रही बर्बरता, समाज के प्रति उसकी जवाबदेही और जनता के बीच लगातार गिरती जा रही साख के कारणों पर बात करने से पहले,मैं खुद अपनें साथ हाल ही में घटी एक घटना का जिक्र यहां करना चाहूंगा। कुछ महीने पहले की बात है। मेरे पिता जी के नाम गांव में जो खेत और जमीन थी,उसका बैनामा धोखाधड़ी पूर्वक एक महिला ने खुद अपनी जमीन बेचते वक्त एक प्रापर्टी डीलर को कर दिया।

 ?   हरेराम मिश्र


पाकिस्तान की दूसरी आवाज़ें

           पाकिस्तान के सिविल सोसायटी के तमाम जुड़े लोगों ने - जिनमें कई प्रोफेसर है, सामाजिक कार्यकर्तें है, पत्रकार, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता शामिल हैं - पिछले दिनों 'आतंकवाद खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए अपील जारी की। बयान पर दस्तखत करनेवालों में नाभिकीय भौतिकीविद डा ए एच नय्र, मशहूर अर्थशासी डा अकमल हुसैन, वरिष्ठ पत्रकार बाबर अयाज,इदारा ए तालीम अगाही की बैला रजा जमिल,पाकिस्तान इन्स्टिटयूट आफ लेबर एजुकेशन एण्ड रिसर्च के करामत अली तथा कईयों के नाम है।

? सुभाष गाताड़े


आसमान को छू लिया है छत्तीसगढ़ की निरक्षर फुलबासन ने

      मैं जिस भी राज्य या क्षेत्र में जाता हूँ मेरा प्रयास रहता है कि मैं उस राज्य या क्षेत्र के किसी ऐसे इंसान से मिलूं जिसने उस क्षेत्र में लीक से हटकर काम किया हो। मैं अभी हाल में छत्तीसगढ़ के प्रवास में था। मैंने सोचा कि मैं छत्तीसगढ़ के किसी ऐसे व्यक्ति से मिलूं जिसने ऐसा कोई काम किया हो जो कोई आम आदमी नहीं कर पाता है। दिनांक 24जनवरी को मैं देशबंधु के कार्यालय में बैठा था। ललित सुरजन से देश-दुनिया से जुड़े अनेक विषयों पर चर्चा हो रही थी।

?  एल.एस.हरदेनिया


संरक्षण के दायरे से बाहर आदिवासी

     देश के विभिन्न हिस्सों में आदिवासी अपने जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहा है। सत्याग्रह जैसे अहिंसक आंदोलन को लोकप्रिय बनाने वाले महात्मा गांधी के रास्ते पर चलकर भी वह अपनी जमीन बचा पाने में नाकाम है। ध्यान देना होगा कि संसदीय लोकतंत्र में सरकार देशवासियों के अधिकारों की रक्षक होती है। लेकिन सरकार ही अधिकारों की अनदेखी करे या खुद ही शोषणकर्ता की भूमिका में आ जाए,तो नागरिक के लिए सरकार जैसी संस्था पर भरोसा कैसे कायम रह सकता है। भारतीय गणतंत्र में सरकार के सामने इस विश्वास को कायम करने की चुनौती होनी चाहिए,मगर तस्वीर इसके विपरीत बनती दिखाई दे रही है। 

? वरूण शैलेश


उपभोक्ता और किसानों के हक में

एक गलत फैसला!

        दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने संगठित खुदरा बाजार में  एफडीआई यानि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी के फैसले को निरस्त कर किसानों और उपभोक्ताओं के हितों की अनदेखी की है। इससे पहले भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों सहित अनेक राज्यों ने इस पर अनुमति जारी नहीं की है। जहॉ आप के इस फैसले से भविष्य में खुदरे में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध करने वाले संगठनों और राजनीतिक दलों को अपनी पीठ थपथपाने का मौका मिला है वहीं किसानों में निराशा है। वास्तव में यह कदम किसानों के हितों पर प्रतिकूल असर डालेगा। 

? डॉ. सुनील शर्मा


इज्जत के नाम पर !

      श्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में जातीय पंचायत के आदेश पर हाल ही में एक आदिवासी लड़की के साथ हुए सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। राज्य के आदिवासी इलाके में घटी इस हृदयविदारक घटना ने हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान के मुजफरगढ़ जिले की महिला मुख्तारन बीबी से हुए उस अत्याचार की याद दिला दी, जिनसे इसी तरह साल 2002 में पंचायत के निर्णय पर सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। इस बर्बरतापूर्ण घटना की जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है। जातीय पंचायत का यह फैसला, हमारे समूचे सत्ता-तंत्र और समाज पर सवालिया निशाना लगाता है।       

? जाहिद खान


मृत्युदण्ड के प्रावधान पर पुनर्विचार जरूरी

        दिल्ली में 1993 में हुए एक कार बम धमाके के दोषी देविंदर पाल सिंह भुल्लर को मौत की सजा के मामले में विगत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया था कि माफी की अपील पर देरी से फैसला आने के कारण फांसी को उम्रकैद में नहीं बदला जा सकता है। लेकिन अभी पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए मृत्यु दण्ड की सजा पाये 15अपराधियों की सजा को दया याचिका में विलम्ब के आधार पर उम्रकैद में बदल दिया।

? सुनील तिवारी


अब शिक्षा संस्थान भी हो रहे कलंकित

      भारतीय समाज में शिक्षा संस्थानों को विद्या का मन्दिर माना जाता है और शिक्षकों को अतिरिक्त सम्मान प्राप्त है। लेकिन पिछले कुछ अरसे से शिक्षा जगत में जिस प्रकार की घटनाएं घट रही हैं उनसे स्पष्ट है कि शिक्षक अपना मूल कार्य छोड़कर ऐसी अनैतिक गतिविधियों में अधिक संलग्न हैं जो विद्या के मन्दिरनों को कलंकित कर रही हैं। शिक्षा संस्थानों में पढ़े-लिखे लोग और शिक्षक तक छात्राओं के साथ दुराचार कर रहे हैं। फिर भी समाज और सरकार इस समस्या के प्रति घोर उदासीन है, यह चिन्ता की बात है।       

? डॉ. गीता गुप्त


  3 फरवरी-2014

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