संस्करण: 3 फरवरी-2014

पाकिस्तान की दूसरी आवाज़ें

? सुभाष गाताड़े

        पाकिस्तान के सिविल सोसायटी के तमाम जुड़े लोगों ने - जिनमें कई प्रोफेसर है, सामाजिक कार्यकर्तें है, पत्रकार, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता शामिल हैं - पिछले दिनों 'आतंकवाद खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए अपील जारी की। बयान पर दस्तखत करनेवालों में नाभिकीय भौतिकीविद डा ए एच नय्र, मशहूर अर्थशासी डा अकमल हुसैन, वरिष्ठ पत्रकार बाबर अयाज,इदारा ए तालीम अगाही की बैला रजा जमिल,पाकिस्तान इन्स्टिटयूट आफ लेबर एजुकेशन एण्ड रिसर्च के करामत अली तथा कईयों के नाम है।

                विगत कुछ दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद की घटनाओं में आ रहे उछाल को रेखांकित करते हुए, जिसमें आतंकियों ने पोलियो उन्मूलन मुहिम से जुड़े कार्यकर्ताओं, खास सम्प्रदाय के माननेवालों को, मीडिया कार्यकर्ताओं यहां तक कि स्कूली बच्चों को निशाना बनाया है, इसे रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सरकार का रूख उदासीनता भरा रहता है। उनके मुताबिक ऐसे आतंकी हमलों में नए साल की शुरूआत होने के बाद 210 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से आधो नागरिक हैं ; जबकि घायलों की संख्या उससे कई गुना अधिक है। उनका कहना है कि ''अच्छे'' आतंकी और ''बुरे'' आतंकी में फरक करने बजाय या आतंकवादी कार्रवाइयों में मुब्तिला नए पुराने संगठनों में फरक करने के बजाय राज्य को चाहिए कि बिना किसी अस्पष्टता के ऐसे आतंकियों एवं उनके समूहों के खिलाफ सरकार सख्त कदम उठाए।

               वैसे अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब क्वेट्टा में मजलिस ए वहादत ए मुसलमीन की अगुआई में जनवरी माह की शुरूआत में विशाल प्रदर्शन हुआ था जिसमें तालिबान पंथी समूहों द्वारा शिया समुदाय को निशाना बनाने की मुखालिफत की गयी थी। इसके चन्द रोज पहले क्वेटा शहर के बाहर सीमा पर शिया श्रध्दालुओं को ले आ रही बस को आतंकी हमले का निशाना बनाया गया था, जिसमें तमाम लोग मारे गए थे और तमाम घायल हुए थे।

             बयान में एक महत्वपूर्ण बात यह शामिल की गयी थी कि विभिन्न सरकारों द्वारा अपनाया गया कथित स्टे्रटेजिक एसेटस पाथ -जिसके अन्तर्गत सरकार कई अतिवादी समूहों की सचेतन अनदेखी करती है ताकि उन्हें अपने हिसाब से इस्तेमाल किया जा सके -छोड़ देने की जरूरत है और बिना किसी अस्पष्टता के ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो नागरिकों को नुकसान पहुंचाते हो और देश की शान्ति एवं कानून को बाधित करते हों।

               फिलवक्त यह नहीं बताया जा सकता कि सरकार इस मामले में क्या कदम उठाएगी, मगर इतना तो तय है कि इसने आतंकवाद की विकराल होती जा रही समस्या के प्रति तमाम लोगों का नए सिरेसे ध्यान आकर्षित किया है। यह आतंकी कितने बर्बर ढंग से काम करते हैं इसका अन्दाजा  तालिबानी ताकतों के प्रभुत्ववाले पाकिस्तान के खैबर पख्तुनवा सूबे के शिया बहुल इलाके के एक इब्राहिमजई स्कूल की इस घटना से भी पता चल सकता है, जब स्कूल में असेम्बली में पहुंच कर वहां बम विस्फोट करने निकले आत्मघाती शख्स को कुछ अनहोनी देख कर स्कूल के ही एक छात्र ने ललकारा था और इसी हड़बड़ी में आतंकी एवं स्कूली बच्चा दोनों की ठौर मृत्यु हुई थी। उस किशोर का नाम एतज़ाज हस्सन बंगश था, जिसे आज की तारीख में एक नए नायक का दर्जा दिया गया है, जिसने अपनी शहादत से हजारों सहपाठी छात्रों की जान बचायी। मालूम हो कि उस दिन सुबह की स्कूल असेम्बली के लिए लगभग दो हजार छात्र एकत्रित थे। इस आतंकी हमले के लिए लश्कर ए झंगवी नामक आतंकी संगठन ने जिम्मेदारी ली है।

               एतज़ाज की इस कुर्बानी ने जहां एक तरफ इसी इलाके की रहनेवाली छात्रा मलाला यूसूफजई का लड़कियों की शिक्षा के लिए चलाए संघर्ष और उसके चलते तालिबानियों द्वारा उस पर किए गए हमले की याद ताजा की, वहीं दूसरी तरफ उसने पाकिस्तान के इस इलाके में असहमति रखनेवाले लोगों, कलाकारों को झेलनी पड़ती हिंसा को भी नए सिरेसे उजागर किया है।

               अभी पिछले साल की बात है पश्तो भाषा की उभरती हुई मलिका ए तरन्नुम गज़ाला जावेद - जो बहुत कम उम्र में ही अपने गायन से शोहरत की बुलन्दियों पर पहुंची थीं, उसकी पेशावर की सड़कों पर हत्या कर दी गयी थी, मरते दम जिनकी उम्र महज 24 साल थी। गज़ाला, अर्थात मृगनयनी, जो प्रेम के गीत गाती थी, अपने समाज एवं संस्कृति के गीत गाती थी। पश्तो के उसके गीत न केवल पाकिस्तान में बल्कि अफगाणिस्तान में भी बहुत लोकप्रिय थे। निजी जिन्दगी में भी वह विद्रोहिणी थी, जिसने परम्पराओं के बोझ तले दबे पितृसत्तात्मक समाज में अपने पति से अलग होने का खुद फैसला किया था। पाकिस्तान की स्वात घाटी की रहनेवाली गज़ाला, जहां पर इन दिनों तालिबानियों की तूती बोलती है, जिन्होंने संगीत, नृत्य आदि को 'गैरइस्लामिक' घोषित किया है जिनकी वजह से गज़ाला को तीन साल पहले वहां से भागना पड़ा था। उनकी जान को जिस तरह का ख़तरा था, जिसकी वजह से उन्हें अपनी रेकार्डिंग भी दुबई में करनी पड़ती थी।

                लोग बता सकते हैं कि विभिन्न कलाकारों के दमन का यह सिलसिला पाकिस्तान के खैबर पख्तुनवा के इस इलाके में लगभग दस साल पहले शुरू हुआ था जब यहां 'मुत्ताहिदा मजलिस ए अमल' नामसे अतिदक्षिणपंथी इस्लामिक पार्टियों का गठबन्धन सत्ता में आया था, जिन्होंने संगीत, नृत्य के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी। यह इस्लाम की एक खास किस्म की व्याख्या थी, जिस पर सौदी अरब में पेट्रोडॉलर के सहारे फल फूल रहे वहाबी इस्लाम की साफ छाया नज़र आ रही थी। ऐसा माहौल था कि कुछ कलाकारों ने अपनी कैरियर से ही तौबा की और खामोश हो गए या कुछ ने वही गाना कूबूल किया जिसकी तालिबानियों ने इजाजत' दी थी।

              पाकिस्तान, जिसे एक 'असफल राष्ट्र' कह कर बहस से भी बाहर कर देने की रवायत हमारे यहां मौजूद हैं, वहां किसी एतज़ाज़ की शहादत या किसी गज़ाला के अपनी जान जोखिम में डाल कर गाने को क्या नाम दिया जा सकता है ? दीवानगी ! जूनून !! या कुछ अन्य !!! इसमें कोई दोराय नहीं कि पाकिस्तान के मौजूदा सियासी समाजी हालात ऐसे हैं कि एक वक्त के उसके अमेरिकी आंकाओं से लेकर तमाम अन्य नि:ष्पक्ष विश्लेषक भी सैनिक जनरलों द्वारा वहां अंजाम दिए गए तख्तापलट, इस्लामिक ताकतों के वहां बढ़ते बोलबाले और सहिष्णुता की आवाज़ों के लगातार मध्दिम होते जाने जैसी घटनाओं से एक खास किस्म का निष्कर्ष निकालते हैं।

       मगर पाकिस्तान में एक के बाद एक नज़र आ रही ऐसी मौतों का क्या किसी अलग ढंग से विश्लेषण किया जा सकता है ? अपने आलेख 'पाकिस्तान्स एनलाइटनमेन्ट मार्टायर्स' अर्थात पाकिस्तान के प्रबोधन शहीद में कुछ समय पहले वहां की नामी पत्रकार बीना सरवर (www.beenasarwar.com) ने पाकिस्तान के उन तमाम प्रगतिशील बुध्दिजीवियों और कार्यकर्ताओं को श्रद्वांजलि अर्पित की थी जो सुरक्षा बलों या तालिबानियों के हाथों मारे गए थे। आई एस आई के हाथों मारे गए खोजी पत्रकार सलीम शहजाद की असामयिक मौत और उसके चन्द दिनों बाद क्वेट्टा में प्रोफेसर सबा दश्तियारी की हत्या के बाद लिखे उपरोक्त आलेख में उन्होंने पाकिस्तानी समाज में 'प्रबोधन' के मूल्यों के लिए संघर्षरत रहे कइयों का जिक्र किया था। पंजाब के गवर्नर रहे सलमान तासीर की मौत के दो माह बाद मारे गए शाहबाज बट्टी या बलुचिस्तान में हयूमन राइटस कमीशन आफ पाकिस्तान के समन्वयक नईम साबिर, बलुचिस्तान विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नाजिमा तालिब, भूमाफिया के खिलाफ संघर्षरत निसार बलोच, हाजी गनी और अबु बकर जैसे मछुआरे जिन्होंने किनारे बने मैंग्रूव के पेड़ों को की तबाही की सरकारी कोशिशों को पुरजोर विरोध किया था। उन्होंने उन तमाम पत्रकारों भी का जिक्र किया था जो उस साल मारे गए थे।

              प्रोफेसर सबा दश्तियारी के बारे में बीना सरवर ने लिखा था कि वह महज मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज़ बुलन्द नहीं कर रहे थे, मगर इससे भी 'खतरनाक बातों' को अंजाम दे रहे थे। वह युवा मनों को प्रगतिशील विचारों से परिचित करा रहे थे। लियारी की झुग्गियों में अपनी बुनियादी तालीम हासिल करनेवाले प्रोफेसर सबा एक तरह से बेहद नियंत्रित विश्वविद्यालय की चहारदीवारी में एक किस्म के खुले विश्वविद्यालय का संचालन कर रहे थे।

              निश्चित ही ये तमाम बेशकीमती लोग, जिन्हें इस बात का जरूर अन्दाज़ा रहता होगा कि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का मतलब क्या होगा, अगर 'असफल' कहे जा रहे पड़ोसी मुल्क में आजभी सामने आ रहे हैं, इसका मतलब यही कि कहीं न कहीं अवाम के बीच वह धारा -अलबत्ता मध्दिम ही सही - मौजूद है, जो कटटरपंथ के खिलाफ सहिष्णुता, बहिष्करण के खिलाफ समावेश, बीते 'स्वर्णिम युग' की ओर लौटने के बजाय प्रगतिउन्मुखता की हिमायती हैं।

               मसलन कितने लोग इस बात से वाकीफ हैं कि पाकिस्तान में 'पाकिस्तान अथेइस्ट एण्ड अगनॉस्टिक्स' (पीएए) अर्थात पाकिस्तान के नास्तिक एवम अज्ञेयवादी नामक एक समूह की स्थापना हुई है, जिनकी तादाद धीरे धीरे बढ़ रही है। पिछले साल 14 अगस्त को ही उन्होंने अपनी वेबसाइट डब्लूडब्लूडब्लू डाट ई पीएएडाट आर्ग शुरू की, जो तुरन्त लोकप्रिय हुई। वेबसाइट के लांच होने के 48 घण्टे के अन्दर ही 95 देशों के 17,000 से अधिक लोगों ने उसे हिट किया, जिनमें सउदी अरब भी शामिल था। वे इस बात को जानते हैं कि वे ऐसे मुल्क में सक्रिय हैं जहां ईशनिन्दा का मतलब जान का जोखिम - भले ही सरकारी अदालतें आप को बख्श दें, मगर अतिवादी समूह आप को जरूर मार सकते हैं, इसके बावजूद उन्होंने समविचारी लोगों तक पहुंचने और सबसे महत्वपूर्ण, जनता को बताने का रास्ता चुना है। उनका अनुभव है कि पाकिस्तान में कुछ लोग धर्म के नाम पर जारी इस हिंसा से क्षुब्ध होकर धर्म पर सवाल उठाने को तैयार हो रहे हैं।

   ? सुभाष गाताड़े