संस्करण: 03 दिसम्बर -2012

मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा का यह कैसा गुणवत्ता विस्तार वर्ष ?

?  डॉ. गीता गुप्त

              वैसे तो पूरे देश में शिक्षा की बदहाली चिंता का विषय है। लेकिन मध्यप्रदेश में चूंकि यह उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का विस्तार वर्ष घोषित किया गया है अतएव इस पर मंथन आवश्यक है। शिक्षा जीवन की बुनियाद होती है। वह विद्यार्थियों के अस्तित्व का निर्माण करती है, जिसपर समूचे राष्ट्र का भविष्य अवलंबित होता है। अतएव शिक्षा का गुणवत्तापूर्ण होना अनिवार्य है। लेकिन शिक्षा में गुणवत्ता आएगी कैसे ? यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे देश को अच्छे चिकित्सक, अभियंता, विधिावेत्ता, शिल्पकार, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद् आदि की आवश्यकता है। मगर इन सबके निर्माता अर्थात-शिक्षक आज बेहद बुरे दौर से गुजर रहे हैं। फिर भी सरकार का ध्यान इस पर नहीं है। यह विडम्बना ही तो है।

                मध्यप्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में सेमेस्टर पध्दति लागू की जा चुकी है। यहां तक कि अब स्वाधयायी परीक्षार्थियों को भी इसी पध्दति से परीक्षा देकर उपाधि प्राप्त करनी होगी। मगर इस पध्दति की ख़ामियां कोई उजागर नहीं करना चाहता। उच्च शिक्षा का लक्ष्य केवल उपाधिधारी युवाओं की जमात तैयार करना कदापि नहीं हो सकता। मगर वर्तमान व्यवस्था में विद्यार्थी सिर्फ साक्षर हो रहे हैं, शिक्षित नहीं। शिक्षा केवल परीक्षा आधारित रह गयी है। कक्षा में पढ़ाई भले न हो परंतु परीक्षा में विद्यार्थी उत्तीर्ण हो-यही संस्थान की उत्तमता का परिचायक है। सतत-मूल्यांकन पध्दति भी एक औपचारिकता मात्र है जिसे विद्यार्थी गंभीरता से नहीं लेते और शिक्षक गंभीर हो तो विद्यार्थी कभी मूल्यांकन की कसौटी पर खरे नहीं उतर सकते। फिर ऐसे में, जबकि प्रदेश के अनेक महाविद्यालय शिक्षकविहीन हैं, सहायक प्राध्यापक के 6414 स्वीकृत पदों में से 1336 पद खाली है। 183 महाविद्यालय प्रभारी प्राचार्यों के भरोसे चल रहे हैं। कानूनी पेचीदगी के कारण शिक्षकों की संविदा नियुक्ति भी भोपाल और होशंगाबाद जैसे संभागों में नहीं हो सकी, तो ज़ाहिर सी बात है कि इसका खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है। छोटे गांव-कस्बों और तहसीलों की दशा सर्वाधिाक चिंताजनक है, जहां विज्ञान जैसे संकाय भी खोल तो दिए गए मगर, महाविद्यालयों में स्थायी या अस्थायी शिक्षक की कोई व्यवस्था नहीं की गई और अब तो परीक्षाएं आरंभ हो चली हैं।

               प्रदेश के अधिकतर नवोद्धाटित महाविद्यालय भवन विहीन है। मगर प्राचार्य विहीन और शिक्षकविहीन होना भी उनकी नियति है। ऐसे में वहा प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों को क्या हासिल होगा ? इस बारे में कौन सोचता है ? उच्च शिक्षा विभाग की वार्षिक रपट के मुताबिक प्रोफेसर के स्वीकृत 675 पदों में से 530 पद रिक्त है। राजगढ़ जिले का पचोर स्थित महाविद्यालय सिर्फ तीन शिक्षकों के सहारे चल रहा है। रायसेन जिले के गैरतगंज महाविद्यालय में मात्र दो शिक्षक हैं। सीहोर जिले के इछावर में भी सिर्फ दो शिक्षक हैं। भोपाल जिले के बैरसियां महाविद्यालय में वनस्पतिशास्त्र, रसायनशास्त्र और गणित जैसे विषयों के शिक्षक वर्षों से नहीं है। अन्य कई जिलों में भी यही स्थिति है। इसके उलट, राजधानी भोपाल सहित इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर के महाविद्यालयों में स्वीकृत पदों से कहीं अधिाक शिक्षक पदस्थ हैं, मगर सरकार उन्हें वहां स्थानांतरित नहीं करती, जहां शिक्षकों का  अभाव है। अक्तूबर 2012 में 'डिप्लॉय' जैसी व्यवस्था अवश्य सामने आई जिसके अंतर्गत सिर्फ दो माह के लिए कुछ अतिशेष शिक्षकों को दूरस्थ अंचलों में अध्यापन हेतु भेजा गया है। किंतु मधय नवंबर से परीक्षाएं आरंभ हो गई। इसके अलावा दशहरे दीपावली के कारण कई छुट्टियां रहीं तो कितना अधयापन हुआ होगा, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। दूसरी बात, तमाम महाविद्यालयों के रिक्त पदों पर जब आज तक नियुक्तियां नहीं हुई, तो शिक्षा संस्थानों में किस गुण्ावत्ता का विस्तार हो रहा है ?

               निश्चित रूप से, शिक्षा की गुणवत्ता में शिक्षक की भूमिका सर्वोपरि होती है। परंतु संसाधनों की उपलब्धाता, स्तरीय पाठयक्रम और उत्कृष्ट शिक्षा पध्दति का स्थान भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। इन सबका मणिकांचन संयोग ही शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाता है जो ज्ञान संपन्न, सभ्य, संस्कारित और अनुशासित पीढ़ी के निर्माण में सहायक होता है। लेकिन प्रदेश में सभी महाविद्यालयों के पास भवन नहीं है। शिक्षकों का अभाव सर्वविदित है। तीन-चार हजार रुपये प्रतिमाह के मेहनताने पर जो शिक्षक (अस्थायी) नियुक्त किए भी जा रहे हैं, वे कैसी शिक्षा देंगे ? पाठयक्रम का यह हाल है कि पचासों वर्षों से उनमें कोई संशोधन नहीं किया गया है। 63 वर्षीय एक प्रोफेसर ने बताया कि आज वे एम.ए. हिंदी का जो पाठयक्रम पढ़ा रहे हैं, उनके 88 वर्षीय पिता ने भी अपने जमाने में एम.ए. करते समय वहीं पढ़ा था। तो प्रश्न उठता है कि क्या पाठयक्रम की प्रासंगिकता पचासों वर्ष बाद भी यथावत हैं ? सेमेस्टर पध्दति के मद्देनजर जो बदलाव किए गए वे एकांगी हैं अतएवं विद्यार्थियों के लिए हितकर नहीं हैं। जैसे राष्ट्रभाषा हिंदी को जो पाठयक्रम लगातार तीन वर्ष स्नातक कक्षाओं में पढ़ाया जाता था, अब तीन सेमेस्टर (प्रथत, तृतीन एवं पंचम) में ही सीमित कर दिया गया। मगर न नियम-नियंता ने सोचा कि वर्ष भर के पाठयक्रम का अधययन-अधयापन एक सत्र में कैसे संभव होगा ? और न शिक्षकों ने आवाज उठायी कि यह अव्यावहारिक है।

              इसी तरह एक सत्र में चयनित शिक्षकों का एक ही प्रश्नपत्र पढ़ने की व्यवस्था परीक्षा की तैयारी की दृष्टि से भले ही सुविधाजनक हो, मगर इससे विद्यार्थियों में ज्ञान का अपेक्षित विस्तार नहीं हो सकेगा। क्योंकि एक सत्र की परीक्षा के बाद वे 'बीती ताहि बिसार दे' का अनुशीलन कर अगले सत्र का पाठयक्रम पढ़ेंगे। कथन का आशयन यह कि शिक्षा ज्ञान आधारित न होकर परीक्षा आधारित हो गई है। इसीलिए परीक्षा में नकल और फर्जीवाड़ा के प्रकरण्ा बढ़ रहे हैं। येन-केन-प्रकारेण डिग्री पाने की जुगत लगाई जा रही है। मेडिकल और इंजीनियरिंग सहित सभी परीक्षाओं में फर्जी परीक्षार्थी पकड़े जा रहे हैं। शिक्षा में नैतिक मूल्यों के अभाववश विद्यार्थी हिंसक, अमानवीय और अपराधोन्मुख हो रहे हैं। यह हमारे परिवार, समाज और देश के लिए कितना घातक है, अलग से कहने की बात नहीं। चूंकि शिक्षा में गुणवत्ता की बात की जा रही है और गुणवत्ता-विस्तार वर्ष मनाया जा रहा है तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि प्रदेश में भवनविहीन, प्राचार्यविहीन, शिक्षकविहीन और अव्यावहारिक बदलावों वाली शिक्षा पध्दति के बावजूद हम उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की खुशफहमी पाले हुए हैं तो क्या सचमुच हमारी युवा पीढ़ी कभी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल कर पाएगी ?

              निस्संदेह, हमारी शिक्षा के लिए यह बहुत चुनौतीपूर्ण समय है। केवल परीक्षा के अंकों और कागज़ी नियमों में उलझी शिक्षा गुणवत्ता का पर्याय नहीं हो सकती। पाठयक्रमों और शिक्षा पध्दति में अभी अनेक संशोधनों की दरकार है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए उसमें नैतिक मूल्यों का समावेश करना होगा। शिक्षकों के विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ समाज ओर देश के हित को भी धयान में रखकर अपने कर्तव्य एवं दायित्व निभाने होंगे। हमारे शिक्षाविदों, राजनेताओं और प्रशासकों को ईमानदारीपूर्वक सोचना होगा कि आखिर वे अपने प्रदेश और देश को कैसी पीढ़ी देना चाहते हैं ? जब सब मिलकर एक साथ चिंतन करेंगे और फिर ठोस पहल करेंगे तब वह सुयोग आएगा जिसमें हम सचमुच शिक्षा की गुणवत्ता का पर्व मना सकें।

 
? डॉ. गीता गुप्त