संस्करण: 03 दिसम्बर -2012

केंद्रीय मंत्री मण्डल ने नई दवा नीति को मंजूरी दी

सस्ती होंगी दवाएं

?  प्रमोद भार्गव

                भारत सरकार अब आम आदमी के स्वास्थ्य की चिंता के मद्देनजर अनूठी, जरुरी व कड़ी पहल करती दिखाई दे रही है। हाल ही में केंद्र सरकार ने देश के सभी सरकारी अस्पतालों में मुत जेनेरिक दवाएं दी जाने की शुरुआत की है। अब इसी दिश में एक कदम और आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय मंत्रीमण्डल ने सभी आवश्यक दवाओं की कीमतें 20 फीसदी तक घटाने का अभूतपूर्व निर्णय लिया है। इनमें कैंसर व एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों के अलावा अवसाद दूर करने और ताकत में इजाफा करने वाली दवाएं भी शामिल हैं। कुल मिलाकर सरकार 348 प्रकार की दवाओं की कीमतें तय करेगी। सभी ब्रान्डेड दवाओं की औसत कीमत निकाल कर उसे अधिाकतम कीमत घोशित किया जाएगा।

               मालूम हो देश में बीते एक दशक के दौरान दवाओं की कीमत में जबरदस्त इजाफा हुआ है। बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां तो जैसे हर प्रकार के सरकारी नियंत्रण से खुद को बाहर ही मानती हैं। यही वजह है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1996 से 2006 के बीच दवाओं की औसत कीमत 40 फीसदी तक बढ़ी है। ब्राण्डेड दवाओं की कीमतें तो जेनेरिक दवाओं की तुलना में 1,123 फीसदी मंहगी हैं। जबकि ये मूल्य के बरक्स असरकारी भी नहीं हैं। यहां हैरानी में डालने वाली बात यह भी है कि जो दवाएं सरकारी नियंत्रण में थीं, उनमें मूल्य वृध्दि महज 0.02 फीसदी दर्ज हुई। ऐसी दवाएं जो न सरकारी नियंत्रण में हैं और न ही जरुरी दवाओं की सूची में दर्ज हैं, उनके दाम भी 137 प्रतिशत तक बढ़े हैं। राष्ट्रीय दवा मूल्य प्राधिकरण की ओर से दवाओं में मुनाफे का आंकड़ा लागत से सौ फीसदी ज्यादा रखने की छूट दी गई है। मसलन लागत से दोगुनी ज्यादा कीमत में दवा बाजार में नहीं बेची जा सकती है। हालांकि मुनाफे की हवस में बदलते दवा कारोबार की ओर सरकार को विभिन्न संस्थाएं बार-बार चेताती रही हैं, लेकिन न जाने क्यों इस सीधो आम आदमी से जुड़े गंभीर मसले को सरकार नजरअंदाज करती रही ?   

                कुछ समय पहले कंपनी मामलों के मंत्रालय की एक सर्वे रिपोर्ट ने सरकार को आगाह किया था कि दवायें आम आदमी की पहुंच से जानबूझकर बाहर की जा रही हैं। इस रिपोर्ट ने तय किया है कि दवाओं की मंहगाई का कारण दवा में लगने वाली सामग्री का महंगा होना नहीं है बल्कि दवा कंपनियों का मुनाफे की हवस में बदल जाना है। इस लालच के चलते कंपनियां राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के नियमों का भी पालन नहीं करती हैं। इसके मुताबिक दवाओं की कीमत सिर्फ लागत से सौ गुनी ज्यादा रख सकते हैं। लेकिन दवाओं की कीमत 1023 फीसदी तक ज्यादा वसूली जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्लैक्सोस्मिथलाईन, फाईजर, रैनबैक्सी, डॉ.रेड्डी लैब्स और एलेमबिक जैसी नामी गिरामी दवा कंपनियां भी दो सौ से पांच सौ गुना ज्यादा कीमत अपने दवा उत्पादों की रख रही हैं।

              इसके पहले नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने भी देशी विदेशी दवा कंपनियों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि दवा कंपनियों ने सरकार द्वारा दी उत्पाद शुल्क का लाभ तो लिया लेकिन दवाओं की कीमतों में कटौती नहीं की। इस तरह से ग्राहकों को करीब 43 करोड़ का चूना लगाया, साथ ही 183 करोड़ रूपये का गोलमाल सरकार को राजस्व कर न चुकाकर किया। इस धोखाधड़ी को लेकर सीएजी ने सरकार को दवा मूल्य नियंत्रण अधिनियम में संशोधन का सुझाव भी दिया था। यह सरकार की ढिलाई का ही परिणाम है कि उत्पाद शुल्क में छुट लेने के बावजूद कंपनियों ने कीमतें तो कम की नहीं, उल्टे नकली व स्तरहीन दवाएं बनाने वाली कंपनियों ने भी बाजार में मजबूती से कारोबार फैला लिया।

                इंसान की जीवन-रक्षा से जुड़ा दवा करोबार अपने देश में तेजी से मुनाफे की अमानवीय व अनैतिक हवस में बदल गया है। चिकित्सकों को महंगे उपहार देकर रोगियों के लिए मंहगी और गैर जरुरी दवाएं लिखवाने का प्रचलन लाभ का धंधा हो गया है। इस गोरखधंधे पर लगाम लगाने के नजरिये से कुछ समय पहले केन्द्र सरकार ने दवा कंपनियों से ही एक आचार संहिता लागू कर उसे कड़ाई से अमल में लाने की अपील की थी। लेकिन संहिता का जो स्वरुप सामने लाया गया, वह राहत देने वाला नहीं था। संहिता में चिकित्सकों को उपहार व रिश्वत देकर न तो अनैतिक कारगुजारियों को लेकर कोई साफगोई है और न ही संहिता की प्रस्तावित शर्तें कानूनन बाध्यकारी हैं। इन प्रस्तावों को लेकर दवा संघों में भी मतभेद हैं।

                हमारे देश में मुक्त बाजार की उदारवादी व्यवस्था के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जो आगमन हुआ, उसके तईं जिस तेजी से व्यक्तिगत व व्यवसायजन्य अर्थ-लिप्सा और लूटतंत्र का विस्तार हुआ, उसके शिकार चिकित्सक तो हुए ही सरकारी और गैर सरकारी ढांचा भी हुआ। नतीजतन देखते-देखते भारत के दवा बाजार में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की 70 प्रतिशत से भी ज्यादा की भागीदारी हो गई। इनमें से 25 फीसदी दवा कंपनियां ऐसी हैं जिन पर व्यवसायजन्य अनैतिकता अपनाने के कारण अमेरिका भारी आर्थिक दण्ड दे चुका है।

               सिंतबर 2008 में भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनी रैनबैक्सी की तीस जेनेरिक दवाओं को अमेरिका ने प्रतिबंधित किया था। रैनबैक्सी की देवास (मध्यप्रदेश) और पांवटा साहिब (हिमाचल प्रदेश) में बनने वाली दवाओं के आयात पर अमेरिका ने रोक लगाई थी। अमेरिका की सरकारी संस्था फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) का दावा था कि रैनबैक्सी की भारतीय इकाइयों से जिन दवाओं का उत्पादन हो रहा है उनका मानक स्तर अमेरिका में बनने वाली दवाओं से घटिया है। ये दवाएं अमेरिकी दवा आचार संहिता की कसौटी पर भी खरी नहीं उतरी। जबकि भारत की रैनबैक्सी ऐसी दवा कंपनी है जो अमेरिका को सबसे ज्यादा जेनेरिक दवाओं का निर्यात करती है। रैनबैक्सी एक साल में करीब पौने दो सौ करोड़ डॉलर की दवाएं बेचने का कारोबार करती है। ऐसी ही बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसी आचार संहिता के पालन के पक्ष में नहीं हैं।

              किसी बाध्यकारी कानून को अमल में लाने में भी ये रोड़ा अटकाने का काम करती हैं। क्योंकि ये अपना कारोबार विज्ञापनों व चिकित्सकों को मुनाफा देकर ही फैलाये हुए हैं। छोटी दवा कंपनियों के संघ का तो यहां तक कहना है कि यदि चिकित्सकों को उपहार देने की कुप्रथा पर ही कानूनी तौर से रोक लगा दी जाए तो दवाओं की कीमतें 50 फीसदी तक कम हो जाएंगी। चूंकि दवा का निर्माण एक विशेष तकनीक के तहत किया जाता है और रोग व दवा विशेषज्ञ चिकित्सक ही पर्चे पर एक निश्चित दवा लेने को कहते हैं। दरअसल इस तथ्य की पृष्ठभूमि में यह मकसद अंतर्निहित है कि रोगी और उसके अविभावक दवाओं में विलय रसायनों के असर व अनुपात से अनभिज्ञ होते हैं इसलिए वे दवा अपनी मर्जी से नहीं ले सकते। इस कारण चिकित्सक की लिखी दवा लेना जरूरी होती है। लिहाजा चिकित्सक मरीज की इस लाचारी का लाभ धड़ल्ले से उठा रहे हैं।

               ऐसे हालात में चिकित्सक अनैतिकता और दवा कंपनियां केवल लाभ का दृष्टिकोण अपनाएंगी तो आर्थिक रूप से कमजोर तबका तो स्वास्थ्य चिकित्सा से बाहर होगा ही, जो मरीज दवा ले रहे हैं उनके मर्ज की दवा सटीक दी जा रही हैं अथवा नहीं इसकी गारंटी भी नहीं रह जाएगी। इस कारण सरकार ने 2009 के आरंभ में दवा कंपनियों के संघ से स्वयं एक आचार संहिता बनाकर अपनाने को कहा था। साथ ही सरकार ने यह हिदायत भी दी थी कि यदि कंपनियां इस अवैध गोरखधंध पर अंकुश नहीं लगातीं तो सरकार को इस बाबत कड़ा कानून लाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

               लेकिन सरकारी चेतावनी की परवाह किए बिना दवा कंपनियों का संघ जो नई आचार संहिता सामने लाया उसमें उपहार के रूप में रिश्वत देने का केवल तरीका बदला गया। मसलन तोहफों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा। संहिता में केवल दवा निर्माताओं से उम्मीद जताई गई है कि वे चिकित्सकों को टीवी, फ्रिज, एसी, लेपटॉप, सीडी, डीवीडी जैसे इलेक्ट्रोनिक उपकरण व नकद राशि नहीं देंगे। वैज्ञानिक सम्मेलन, कार्यशालाओं और परिचर्चाओं के बहाने भी तोहफे देने का सिलसिला और चिकित्सकों की विदेश यात्राएं जारी रहेंगी। जाहिर है आचार संहिता के बहाने चिकित्सक और उनके परिजनों को विदेश यात्रा की सुविधा को परंपरा बनाने का फरेब संहिता में जानबूझकर डाला गया। अब केन्द्रीय मंत्रीमण्डल ने दवाओं की कीमतें 20 फीसदी घटाने का जो निर्णय लिया है, वह स्वागत योग्य कदम है। यदि सरकार थोडी आौर कडाई बरते तो कंपनियों द्वारा चिकित्सकों को दिए जाने वाले उपहारों और विदेश यात्राओं पर भी रोक लगा सकती है। यदि ऐसा किया जाता है तो दवाओं की कीमतों में लगभग 50 फीसदी गिरावट की उम्मीद की जा सकती है। 

? प्रमोद भार्गव