संस्करण: 03 दिसम्बर -2012

राजनैतिक समझ से दूर है कतिपय राजनैतिक दल

राजनैतिक शुचिता की चिंता है सिर्फ कांग्रेस को

? राजेन्द्र जोशी

               पने आगे की बड़ी लकीर को मिटाकर अपनी छोटी लकीर को बड़ा दिखाने की फितरत को ही कतिपय राजनैतिक दल अपनी योग्यता प्रदर्शित करने में माहिर हो गये हैं। स्वयं तो जनहित या सेवा के कार्यों को अंजाम देने की क्षमता नहीं रखते किंतु दूसरा दल यदि अपनी नीतियों और सिध्दांतों पर चलकर समाज में कोई आदर्श पेश करता है तो उसपर तर्क-कुतर्क करते हुए उस दल से जुड़े नेताओं की मज़ाक उड़ाना उन पर भद्दी टिप्पणियां करना और हुड़दंग मचाकर समाज में कनफ्यूजन फैलाकर तालियां पिटवाने को ही राजनीति समझ लेते हैं। कतिपय ऐसी राजनैतिक पार्टियां जो अस्तित्व में हैं या नई-नई गठित होती जा रही हैं, उनकी फितरत यदि देखी जाय तो यही समझ में आता है कि उन्हें न तो समाज सेवा से कोई मतलब है और न ही उनमें देश की अस्मिता के प्रति कोई सम्मान की भावना है।

               कुछ राजनैतिक दल खुद अपनी ही पीठ ठोंककर वाहवाही लूटने में दिनरात एक कर रहे हैं, तो कुछ दल जनता के सामने झूठे वायदे, आश्वासन और प्रलोभनों के घोषणापत्र छाप-छापकर उनके बंडल एक अंधेरे कोने में डम्प कर देते हैं जिनपर धूल चढ़ जाती है और उनके पृष्ठों में दीपक लग जाती है। इस तरह के दलों के नेता तालियों की गड़गड़ाहट की आक्सीजन लेकर सांस लेते हैं और आत्ममुग्धता को ही शक्तिवर्धक टॉनिक मान बैठते हैं। प्रलोभनों और शासकीय खजाने में सेंध लगाकर उसे लूटने-लुटाने के हथकंडों को अपनाकर राजनीति के स्तम्भ पर अपना धवज फहराने की चाह रखने वाली राजनीति से आज कतिपय प्रदेश विचलित हो उठे हैं। राजनीति के तथाकथित पुरोधओं की हुड़दंगबाजियां, जश्न के रूप में जारी हैं। पर्व, उत्सव, त्यौहार या अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक अवसर जनभावनाओं और जनआस्थाओं के केंद्र होते हैं, ऐसे अवसरों को अपनी राजनीति चमकाने का उपलक्ष्य मानकर कतिपय दलों के नेता राजनैतिक क्षेत्र में घुसपैठ तो कर लेते हैं किंतु अपनी खरीदी गई लोकप्रियता को लम्बे समय तक इनज्वाय नहीं कर पाते।

                  वर्तमान में देश की यह विडम्बना है कि यहां देशसेवा के नाम पर कुछेक राजनैतिक दल सिर्फ इसलिए गठित हो जाते हैं कि उनके नेताओं के स्वप्न में सत्ता की कुर्सी पर रखे चासनी के थाल दिखने लगते हैं। सपने के दौरान टपकती लार उन्हें जागृत अवस्था में कुछ भी करने को उकसा देती है। कतिपय राजनैतिक दलों का जन्म ही इसलिए हुआ है कि उनका लक्ष्य 'जन' नहीं 'सिंहासन और सिर्फ सिंहासन है और सिंहासन प्राप्ति के लिए भले ही मर्यादा के बाहर जाकर' जूतम पैजार ही क्यों न करना पड़े।

                   प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों में अपने अपने क्षेत्र के बारे में गहरी समझ होना जरूरी है। उद्योग और व्यवसाय का क्षेत्र हो या सेवा का क्षेत्र ही क्यों न हो, इन क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों में अपने व्यवसाय या सेवा के बारे में सही समझ और उचित ज्ञान होना जरूरी होता है। ऐसे ही राजनीति के क्षेत्र में झंडा उठाकर चलने वाले हर व्यक्ति में राजनैतिक समझ होना नितांत आवश्यक होता है। कतिपय दलों में नेतागिरी करने के कुछ उत्साही और शौकीन लोग जुड़ तो जाते हैं किंतु उनमें राजनैतिक समझ का अभाव होता है। नेता में राजनैतिक समझ के अभाव का दुष्परिणाम यह होता है कि वे स्वयं तो अपने आपको हास्यास्पद बनाते जा रहे हैं और अपनी नासमझी से अपने राजनैतिक दल की भी किरकिरी करा लेते हैं।

                 भ्रामक प्रचार और दूसरे प्रतिद्वंन्दी दलों के नेताओं के चरित्र हनन की साजिश ही इस बात का प्रमाण होती है कि ऐसे दल केवल हो-हल्ला और हुड़दंग मचाकर आम जनता को राजनैतिक दलों के प्रति समाज में नफरत के बीज बो देते हैं। ऐसे अनेक बड़े और छोटे छोटे राजनैतिक दल राजनैतिक सूझबूझ और राजनैतिक शुचिता से दूर ही दूर रहते हैं जो सत्तासीन होने के स्वार्थ के शिकार हैं। वर्तमान के राजनैतिक दौर में जो परिदृश्य उभरकर सामने आता जा रहा है उसमें हुड़दंग, फितरत और आडम्बर के माधयम से जो दल कुछ ज्यादा ही उचक रहे हैं उनमें अपने आपको राष्ट्रवादी प्रचारित करने वाला दल भाजपा और उसके दल प्रमुख के साथ ही कतिपय नेता एक्सपोज हो चुके हैं। कहावत है। 'सूत न पोनी, जुलाहो के लट्ठम लट्ठ'। भाजपा इन दिनों इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए कभी नरेन्द्र मोदीजी को, कभी लालकृष्ण आडवाणी जी को तो कभी सुषमाजी या अरुण जेटली को प्रधानमंत्री का चोला पहनाने की कवायद में उलझ रही है। इनके अलावा राम जेठमलानी जी अपनी राजनीति की एक अलग परिभाषा गढ़ रहे हैं। भगवान राम की माला के अपने आपको गुरिया समझने वाले कतिपय नेता इस माला के धागे के बंधन को तोड़ चुके हैं जिसके गुरिये अलग-अलग अपना अस्तित्व प्रदर्शित करने में लग गये हैं। लोकसभा के निर्वाचन नजदीक आते-आते भाजपा की माला के मनकों में बिखराव उनकी राजनैतिक हुड़दंगबाजी के अलावा कुछ नहीं है।

                 इधर राजनैतिक समझ यदि किसी दल में बची है, जिसमें जनभावना की कद्र करने की ललक है और राष्ट्र की अस्मिता के संरक्षण के प्रति चिंता तथा राजनैतिक शुचिता को बनाये रखने का संकल्प है, तो वहां कांग्रेस। कांग्रेस आगामी निर्वाचन के परिप्रेक्ष्य में जिस तरह सूझबूझ से कदम बढ़ा रही है वह इसी बात से जाहिर है कि उसने चुनाव अभियान के लिए विभिन्न समितियों में ऐसे ऐसे नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी हैं जिनपर पार्टी के भविष्य की उम्मीदें टिकी हैं।

   ? राजेन्द्र जोशी