संस्करण: 03 दिसम्बर -2012

उ.प्र. में घोषणाओं पर अमल नहीं, खानापूरी

? सुनील अमर

                  त्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जिस तरह अपनी चुनावी घोषणाओं को पूरा कर रहे हैं, उससे लोगों में निराशा और क्षोभ है। यह सच है कि उन्होंने शपथ ग्रहण करते ही घोषणाओं पर अमल करने की अपनी प्रतिबध्दता जाहिर कर दी थी लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद शायद उन्हें समझ में आया होगा कि घोषणाओं के पिटारे का पेट भरना इतना आसान नहीं है। यही कारण है कि जिन घोषणाओें पर अमल हो भी रहा है, वह राहतकारी न होकर, खानापूरी भर रह गया है। प्रदेश में खजाने की हालत ठीक नहीं है और तमाम तरह के राजनीतिक कारणों से सरकारें टैक्स बढ़ाने से परहेज करती हैं। ऐसे में चुनावी वादों पर पूरी तरह अमल संभव नहीं हो पाता। इस बार सत्ता में आने से पहले समाजवादी पार्टी ने समाज के हर वर्ग को लोक लुभावन सपने दिखाये थे। इनमें से किसान, छात्र व शिक्षित बेरोजगार तो उनके खास लक्ष्य थे और अब यही लोग हैं जो सरकार के वादा-क्रियान्वयन के तौर-तरीकों से नाराज हैं।

                  मुख्यमंत्री की ताजा घोषणा किसानों की ऋण माफी की है जिस पर किसानों में भारी असंतोष है। चुनाव पूर्व समाजवादी पार्टी ने जब घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर पचास हजार रुपये तक के कृषि ऋण माफ किये जाएंगें तो किसानों ने यही समझा था कि प्राय: सभी को लाभ मिलेगा लेकिन अभी गत सप्ताह मुख्यमंत्री ने नयी शर्ते थोपते हुए घोषणा कि कर्ज माफी सिर्फ उन्हीं किसानों को मिलेगी जिन्होंने अपने जिले के भूमि विकास बैंक से अपनी कृषि योग्य जमीन को बंधक रखकर सिर्फ पचास हजार तक का ऋण लिया हो तथा लिये गये कर्ज का दस प्रतिशत धन मार्च 2013 तक जमा भी किया हो। जो किसान ये शर्तें पूरी नहीं करते उन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। इस नयी शर्त से वे किसान ठगा महसूस कर रहे हैं जिन्होंने राष्ट्रीयकृत बैंकों से कृषि कार्यों हेतु ऋण लिया है। यह जानना जरुरी है कि किसान प्राय: राष्ट्रीयकृत बैंकों से ही कर्ज लेते हैं और वहॉ भी बिना जमीन बंधक बनाये कोई ऋण नहीं दिया जाता। प्राय: सभी राष्ट्रीयकृत बैंक किसान क्रेडिट कार्ड जैसी केन्द्र सरकार की योजना में भी न सिर्फ किसानों की जमीन बंधक बनाते हैं बल्कि दो जमानतदार भी लेते हैं। बैंकों का यही रवैया शिक्षा ऋण जैसी योजना में भी रहता है। समाजवादी पार्टी ने चुनावों के दौरान कभी यह नहीं कहा था कि सत्ता में आने पर वह सिर्फ भूमि विकास बैंक से लिये गये किसानों के कर्ज माफ करेगी। यह मुख्यमंत्री का नया पैंतरा है। जाहिर है कि कर्ज माफी की शर्तों से किसान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं और विपक्ष दलों का यह आरोप उचित लगता है कि सरकार ने कर्ज माफी के नाम पर किसानों को धोखा दिया है। लगभग 20 करोड़ की आबादी वाले इस महाप्रदेश में महज सात लाख किसान ही कर्ज माफी के दायरे में आ रहे हैं। बिडम्बना यह है कि समाजवादी पार्टी की चुनावी घोषणा के कारण उन किसानों ने भी कर्ज की किश्तें जमा करनी बंद कर दीं जो नियमित जमा कर रहे थे। अब जबकि ऐसे किसान कर्ज माफी के दायरे में नहीं आ रहे हैं तो उनका हताश होना स्वाभाविक है क्योंकि न सिर्फ उनकी तमाम किश्तें रुक गयीं हैं बल्कि उन पर ब्याज भी उन्हें देना पड़ रहा है। सरकार की घोषणा से बैंकों को भी उम्मीद हो गयी थी कि उनका पैसा एकमुश्त ही वापस आ जाएगा, इसलिए बैंकों ने कर्जदारों से वसूली भी धीमी कर दी थी। कर्ज माफी की शर्तें घोषित हो जाने के बाद बैंकों ने अपनी वसूली तेज कर दी हेै और किसान दोहरे चपेटे में आ गये हैं।

                लगभग यही रवैया प्रदेश की सपा सरकार ने बेरोजगारों को भत्ता देने वाली योजना का भी किया। चुनाव के दौरान तो ऐसा दिखाया गया कि मानों किसी भी उम्र या वर्ग के बेरोजगार को पंजीकरण के बाद भत्ता मिलेगा लेकिन सत्ता में आने के बाद इतनी बंदिशें, इतने बंध-उपबंध बना दिये गये कि तमाम बेरोजगारों ने तौबा ही कर ली। बेरोजगारों के साथ इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि उन्हें एक हजार रुपया मासिक भत्ता देने के बदले उनसे माह में दस दिन काम कराने की शर्त रखी गयी, जो कि मनरेगा की दैनिक मजदूरी से भी कम थी और उनसे इस आशय का शपथ पत्र देने को कहा गया कि वे या उनके परिवार का कोई व्यक्ति न तो और कोई काम कर रहा है और न करेगा। इसके उल्लंघन को दंडात्मक बनाया गया। प्रदेश की सपा सरकार ने अभी कुछ दिनों पूर्व सरकारी नलकूप व नहरों से किसानों की सिंचाई को माफ कर दिया है। यह भी उनके चुनावी घोषणा पत्र में था। इससे भी बहुसंख्य किसानों का भला नहीं होने वाला है क्योंकि एक तो अधिकांश सरकारी नलकूप हमेशा खराब ही रहते है, दूसरे प्रदेश में बिजली की किल्लत किसी से छिपी नहीं है। यही हाल नहरों का है। जब भी किसानों को फसल या खेतों की सिंचाई की जरुरत रहती है, नहरों में पानी ही नहीं आता। सरकारी नलकूप और नहरों के इर्द गिर्द लगे निजी नलकूप खुद ही हकीकत बयान कर देते हैं कि किसानों का काम इन सरकारी साधनों के भरोसे नहीं चल रहा है। यह भी एक विडम्बना ही है कि सरकारी नलकूप और नहरों की संख्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही सर्वाधिक है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की हालत बहुत ही खराब है। इस छूट का लाभ भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को ही ज्यादा मिलेगा। बेहतर होता कि मुख्यमंत्री किसानों को डीजल पर अलग से छूट देते तथा उनके नलकूपों की बिजली सस्ती करते। इससे अधिकांश किसान लाभान्वित होते।

                 प्रदेश की पूर्ववर्ती बसपा सरकार के कार्यकाल के अंतिम दिनों नवम्बर 2012 में अधयापक पात्रता परीक्षा यानी टी.ई.टी. हुई थी और लाखों बेरोजगारों को नौकरी लगने की उम्मीद हो गयी थी। मार्च 2012 में अखिलेश यादव की सरकार सत्ता में आ गयी। तब से तमाम तरह की पैंतरेबाजी शासन स्तर पर की गयी। कभी इसमें चयन हेतु चार सूत्री आधार की कवायद हुई तो कभी पॉच। अभी इसका निर्णय हो नहीं सका है जबकि इसके शीघ्र निस्तारण हेतु प्रदेश के उच्च न्यायालय ने भी कई बार टोका है। चुनाव के दौरान ही सपा ने छात्रों को लैपटॉप व कम्प्यूटर देने का वादा किया था। आज तक एक भी छात्र को यह मिल नहीं पाया है और अभी निकट भविष्य में इसकी कोई उम्मीद भी नहीं है। सरकार जिस दर पर और जितनी संख्या में ये उपकरण चाहती है, उनका शीघ्र निर्माण आसान नहीं। सपा ने  अपनी कन्या विद्या धन नामक अपनी पुरानी योजना का कुछ ऐसा नवीनीकरण किया है कि अब उससे सिर्फ एक वर्ग ही लाभान्वित हो रहा है। समाज के आम गरीबों की लड़कियाँ इस दायरे में आ ही नहीं रहीं हैं। बेहतर होता कि सपा सरकार इस योजना का नाम 'दलित कन्या विद्या धन' योजना रख देती! जिस मुस्लिम तबके के कथित तुष्टीकरण को लेकर अखिलेश सरकार पर आरोप लगाये जा रहे हैं वह भी अपने को उपेक्षित महसूस कर रहा है और खासा नाराज है और उसका कहना है कि सरकार मुसलमानों का नहीं चंद मुस्लिम नेताओं का भला करने में लगी है। असल में उत्तर प्रदेश सरकार संभावित लोकसभा चुनाव को लेकर हड़बड़ी में आ गयी लगती है और वह प्रदेश में दूरगामी परिणाम वाले कार्यक्रमों को क्रियान्वित नहीं कर पा रही है।

? सुनील अमर