संस्करण: 03 दिसम्बर -2012

मध्यप्रदेश में बच्चों से सर्वाधिक भेदभाव

? अमिताभ पाण्डेय

                भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बच्चों को देश का भविष्य बताया। उन्होंने देश का भविष्य उज्जवल हो,इसलिए बच्चों के भविष्य को उज्जवल बनाये जाने पर जोर दिया। पंडित नेहरू का कहना था कि बच्चों को बेहतर शिक्षा देकर उनके भविष्य को उज्जवल बनाया जा सकता है ताकि शिक्षित बच्चे जिम्मेदार नागरिक बनकर समृध्द और सक्षम भारत के निर्माण में अपना योगदान दे सके। बच्चों की बेहतरी के लिए,उनके उज्जवल भविष्य के लिए पंडित नेहरू ने जो सपना देखा उसे हमारे देश में आधुनिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से साकार किया जा रहा है। अनेक विसंगतियों के बावजूद आधुनिक शिक्षा प्रणाली बच्चों के समग्र विकास पर जोर देती है। उन्हें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक दृष्टिकोण से विकास के अवसर उपलब्ध करवाती है।

               पंडित नेहरू की भावना के अनुसार हमारे देश में प्रत्येक बच्चे को शिक्षा से जोडने के लिए अनेक योजनाएं बनाई गई। इसी क्रम में केन्द्र सरकार ने ने दो वर्ष पूर्व निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम देश में लागू किया। इस अधिनियम के प्रभावशील हो जाने के बाद बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करना अधिक आसान हो गया है। इस अधिनियम के कारण निजी स्कूलों के दरवाजे भी गरीब बच्चों को मुत एवं अनिवार्य शिक्षा के लिए खुल गये है। निर्धन और कमजोर वर्ग के बच्चों को शिक्षा से जोडने के लिए यह अधिनियम कारगर साबित हुआ है। अधिनियम के तहत सभी स्कूल संचालकों को ऐसे निर्देश दिये गये है कि बच्चों के साथ आर्थिक, सामाजिक, जातिगत आधार पर भेदभाव नहीं किया जायें। सभी धर्म, जाति, वर्ग के बच्चों को समान रूप शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार अधिनियम ने बच्चों को दिया है।

               शिक्षा के अधिकार अधिनियम को केन्द्र सरकार ने इस भावना के साथ लागू किया कि शिक्षा प्राप्त करते हुए सभी बच्चों के साथ समान रूप से सहानूभूतिपूर्ण,उत्साहवर्धक व्यवहार हो। हाल ही में कुछ ऐसे मामले भी देखने में आये हैं जिनसे यह जाहिर हुआ है कि स्कूलों में बच्चों के साथ समानता का व्यवहार नहीं हो रहा है। बच्चे जाति, धर्म, अमीर, गरीब के आधार पर भेदभाव के शिकार हो रहे है। यह स्थिती चितांजनक है और कमजोर वर्ग के बच्चों के मन में अपमान, उपेक्षा, हीनभावना को जन्म दे सकती है। बच्चों के साथ स्कूलों में किस प्रकार भेदभाव हो रहा है। इसका खुलासा हाल ही में केन्दीय मानव संसाधन मंत्रालय को प्राप्त एक रिपोर्ट में हुआ है। यह रिपोर्ट 41 स्वतंत्र निगरानी संस्थाओं ने 5 राज्यों के 186 स्कूलों में 2 साल तक बच्चों के साथ होने वाले व्यवहार का गहन अध्ययन करने के बाद तैयार की है। स्कूलों में भेदभाव विषय पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक स्कूली बच्चे धर्म, जाति, लिगं के साथ ही आर्थिक कारण से भी भेदभाव के शिकार हो रहे है। यह भेदभाव बच्चों की पढाई और उन्हें दिये जाने वाले मध्यान्ह भोजन के दौरान साफ तौर पर देखा गया है।

                 स्कूलों में भेदभाव की निगरानी करनेवाली संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने अक्टूबर 2010 से सितम्बर 2012 के मध्यप्रदेश, उडीसा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात के विभिन्न स्कूलों का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान भेदभाव को लेकर सर्वाधिक चिंताजनक स्थिती मध्यप्रदेश के स्कूलों में नजर आई। मध्यप्रदेश के बैतूल, बुरहानपुर, छिन्दवाडा, सिंगरौली, पन्ना,छतरपुर सहित कुछ अन्य जिलों के स्कूलों में मध्यान्ह भोजन बनाने, परोसने, खाने में जातिगत भेदभाव की शिकायतें मिली। धार्मिक आधार पर बच्चों से भेदभाव राजस्थान के डूगंरपुर क्षेत्र में अधिक देखा गया। राजस्थान के भरतपुर,उडीसा के अमलापाडा के स्कूल में भी जातिगत भेदभाव की शिकायतें मिली।  यह भी पता चला कि मध्यान्ह भोजन के दौरान स्कूल में दलित वर्ग के बच्चों को अलग बिठाया जाता है। जिन स्कूलों में दलित वर्ग के लोगों ने मध्यान्ह भोजन बनाया तो उसे कुछ छात्रों ने खाने से इंकार कर दिया। कई स्कूलों में लैगिंक आधार पर भेदभाव देखा गया जहॉ मध्यान्ह भोजन परोसने के काम में केवल छात्राओं को ही लगाया गया। कुछ निजी स्कूलों में गरीब वर्ग के बच्चों को अलग बैठाने अथवा उन्हें अपमानित जाने की शिकायतें भी मिली है।

                स्कूलों में भेदभाव पर अध्ययन उपरान्त तैयार की गई यह रिपोर्ट बताती है कि देश के जिन 5 राज्यों में स्कूली बच्चों में भेदभाव देखा गया,उनमें मध्यप्रदेश के बच्चे सर्वाधिक भेदभाव के शिकार हो रहे है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में तो प्रतिष्ठित निजी स्कूलों में गरीब बच्चों  के साथ भेदभाव किये जाने के मामले कुछ माह पूर्व सामने आये थें लेकिन किसी भी स्कूल के विरूध्द कठोर कार्यवाही नहीं की गई। यही कारण है कि शासकीय स्कूल हों अथवा निजी स्कूल बच्चे लगातार भेदभाव के शिकार हो रहे हैं। स्कूल प्रबंधन बच्चों के प्रति भेदभाव रोकने के लिए गंभीर नहीं है। निजी स्कूलों में तो गरीब बच्चों के साथ भेदभाव साफ तौर पर देखा जा सकता है । भेदभाव की यह स्थिती बच्चों के मानसिक विकास में बडी बाधा बन सकती है जिसे रोकने के प्रभावी प्रयास नजर नहीं आ रहे है।

                स्कूलों में भेदभाव की रिपोर्ट सामने आने पर मानव संसाधन मंत्रालय ने कार्यवाही की पहल की है। इस मंत्रालय के स्कूल शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव अमरजीत सिंह ने कहा है कि मध्यान्ह भोजन योजना का लक्ष्य छात्रों को सामाजिक समानता के लिए प्रेरित करना और धर्म, जाति, वर्ग, लिगं आधारित भेदभाव को खत्म करना है। श्री सिंह ने इस सम्बन्ध में निर्देश भी जारी किये है।

               इधर मध्यप्रदेश में राज्य शिक्षा केन्द्र की आयुक्त रश्मि अरूण शमी ने भी सभी जिलों के जिला शिक्षा अधिाकारियों को निर्देश दिये है कि स्कूलों में भेदभाव न हो, यह सुनिश्चित किया जाये। यदि किसी स्कूल में भेदभाव की शिकायत मिली तो तीन दिन में आवश्यक कार्यवाही की जाये।

                उल्लेखनीय है कि मधयप्रदेश के निजी स्कूलों में पढने वाले गरीब बच्चे भी  भेदभाव के शिकार होते है। निजी स्कूलों में पिछले 2 वर्ष में 2 लाख 75 हजार बच्चों को मुफत प्रवेश मिला है। भेदभाव और अपमान का शिकार होने वालों में इस वर्ग के बच्चे ही अधिक है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम में भेदभाव करने वाले स्कूलों के विरूधद सख्त कार्यवाही किये जाने के निर्देश हैं। ऐसे स्कूलों की मान्यता भी समाप्त की जाती है लेकिन स्कूल प्रबंधन भेदभाव रोकने के प्रति गंभीर नहीं है। वरिष्ठ अधिाकारी भी भेदभाव की शिकायत मिलने पर स्कूल प्रबंधन को नोटिस भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते है। ऐसे नोटिस को स्कूल संचालक गंभीरता से नहीं लेते और अधिकारी भी स्कूलों के विरूधद कार्यवाही के प्रति उदासीन होते है। जब तक भेदभाव करने वाले स्कूलों में से किसी की मान्यता खत्म नहीं की जायेगी तब तक बच्चे इसके शिकार होते रहेगें । भेदभाव खत्म करने के लिए कुछ स्कूलों के विरूध्द सिर्फ नोटिस देने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि ऐसी कार्यवाहीं करना होगी जो भेदभाव करने वाले अन्य स्कूलों के लिए सबक बन सके।

? अमिताभ पाण्डेय

(लेखक सामाजिक मुद्दों के स्वतंत्र पत्रकार है।)