संस्करण: 03 दिसम्बर -2012

गुजरात चुनाव की बेला में भाजपा में जूतम-पैजार

? एल.एस.हरदेनिया

               जैसे-जैसे गुजरात विधानसभा चुनाव की तिथियां नजदीक आ रही हैं वैसे-वैसे भारतीय जनता पार्टी का आंतरिक संकट और गहरा होता जा रहा है। अभी तक भाजपा का आंतरिक संकट पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी तक सीमित था। परन्तु उसमें एक नया मुद्दा जुड़ गया है। इस नये मुद्दे का संबंध सी.बी.आई. के नये निदेशक की नियुक्ति है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद राम जेठमलानी को पार्टी से निलंबित कर दिया गया है। निलंबन का कारण उनके द्वारा बार-बार भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का त्याग पत्र मांगना है। जेठमलानी की राय है कि गडकरी के विरूध्द भ्रष्टाचार के आरोप के चलते उन्हें त्यागपत्र देना चाहिए। उनके द्वारा गडकरी के त्यागपत्र की मांग तो की ही जा रही थी इसी दरम्यान जेठमलानी ने एक नया मुद्दा उठा दिया। केन्द्र सरकार को सी.बी.आई के नये निदेशक की नियुक्ति करनी थी। इस नियुक्ति को लेकर लोकसभा में भाजपा नेता सुषमा स्वराज एवं राज्यसभा में भाजपा नेता अरूण जेटली ने प्रधानमंत्री के पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने मांग  की कि फिलहाल सी.बी.आई. के निर्देशक की नियुक्ति रोक दी जाये और फिर उसे उस प्रक्रिया के अन्तर्गत किया जाये जिसका निर्धारण राज्यसभा की समिति द्वारा किया गया है। इस संबंध में जेठमलानी ने आरोप लगाया कि सुषमा स्वराज और अरूण जेटली ने यह रवैया एक विशेष पुलिस अधिकारी की सहायता करने के लिए अपनाया है। जेठमलानी ने इस तरह दोनों भाजपा नेताओं पर एक गंभीर आरोप लगाया। बात यहीं तक सीमित रहती तो गनीमत थी। परन्तु इससे बढ़कर जेठमलानी ने प्रधानमंत्री द्वारा की गई नियुक्ति का समर्थन किया। इस बीच अभिनेता-राजनीतिज्ञ भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने भी सी.बी.आई. के निदेशक की नियुक्ति के बारे में जेठमलानी द्वारा अपनाये गये रवैये का समर्थन कर दिया। भाजपा के नेतृत्व ने जेठमलानी के रवैये को अनुशासन हीनता माना और उन्हें दंडित करने का निर्णय लिया। पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया। निलंबन के बाद इस तरह की अफवाहें फैलीं कि अब उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया जाएगा। उन्हें निष्कासित किया जाय या नहीं इस मुद्दे पर विचार करने के लिये पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक हुई जिसमें उन्हें कारण बताओ नोटिस देने का फैसला किया गया। इस नोटिस के द्वारा जेठमलानी से पूछा गया है कि क्यों न उन्हें 6 साल के लिया पार्टी से निकाल दिया जाए। पार्टी के इस निर्णय के बारे में जेठमलानी ने कहा कि वे इस समय बहुत व्यस्त हैं और दस दिन के अंदर नोटिस का उत्तर नहीं दे पाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि हो सकता है वे इस नोटिस को कचरे की टोकरी में फेंक दें। उनके इस बयान से स्पष्ट है कि वे भाजपा नेतृत्व की रत्ती भर भी परवाह नहीं करते। लगता है गुजरात  चुनाव के चलते जेठमलानी को पार्टी से निष्कासित करने का साहस भाजपा नहीं जुटा पाई।

                 पार्टी के समक्ष अब यह सवाल है कि वह यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ कैसा व्यवहार करे। जहां तक गडकरी का मामला है, दोनों सिन्हा उनके त्यागपत्र की मांग कर चुके हैं। शत्रुघ्न सिन्हा ने सी.बी.आई. के निदेशक की नियुक्ति के मामले में जेठमलानी के रवैये का समर्थन किया है। इसके बावजूद यदि भाजपा शत्रुधन सिन्हा के विरूध्द कार्यवाही नहीं करती है तो पार्टी के नेतृत्व पर दोहरा मानदंड अपनाने का आरोप लगेगा। इसी तरह यदि यशवंत सिन्हा के विरूध्द भी कार्यवाही नहीं होती है तो भी इसी तरह का आरोप लगेगा। यशवंत सिन्हा और शत्रुधन सिन्हा का बिहार और झारखंड में काफी प्रभाव है। यदि दोनों के विरूध्द कार्यवाही होती है तो उसका सीधा प्रभाव बिहार की राजनीति पर पड़ेगा। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार पहले से ही भाजपा विरोधाी रवैया अपनाये हुये हैं। उन्होंने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि ऐसा व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता है जिसकी धर्म निरपेक्षता में आस्था न हो। यदि यशवंत सिन्हा और शत्रुधन सिन्हा के विरूध्द अनुशासनात्मक कार्यवाही होती है तो उसे लेकर भाजपा की बिहार एवं झारखंड शाखा में फूट हो सकती है। इसलिये इन दोनों के विरूध्द कार्यवाही करने के पहले भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को दस बार सोचना पड़ेगा।

                इस दरम्यान गडकरी से संबंधिात घटनाक्रम ने एक नया मोड़ दिया। अभी तक गडकरी का त्यागपत्र वे भाजपा नेता ही मांग रहे थे जिनका संबंध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से नहीं था। परन्तु भाजपा की मुश्किल उस समय और बढ़ गई जब भाजपा के एक वरिष्ठ नेता एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांताकुमार, जिनका संबंध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से रहा है ने भी गडकरी के विरूध्द आवाज उठाई। उन्होंने भी कहा है कि गडकरी के विरूध्द जो आरोप लगे हैं उनकी जांच होना चाहिये। भाजपा नेता शांताकुमार द्वारा उठायी गयी मांग की उपेक्षा करना कठिन होगा।

                पहले यह समझा जाता था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक के कारण भारतीय जनता पार्टी में अनुशासन बना रहेगा। परन्तु धीरे-धीरे अब यह बात गलत सिध्द हो रही है। गुजरात में तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े नेता ही विभाजित हैं। बताया तो यहां तक जाता है कि संघ से जुड़े तपे तपाये नेता तक नरेन्द्र मोदी से नाराज हैं। इन लोगों को नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली कदापि नहीं भाती है। इसी के चलते ही संघ से जुड़े अनेक नेताओं ने भाजपा और मोदी के विरूध्द विद्रोह कर दिया। केशुभाई पटेल इसके जीते जागते उदाहरण हैं, जिन्होंने संघ के परामर्श की उपेक्षा करते हुय गुजरात में अलग पार्टी बना ली है और चुनावी मैदान में उतरकर नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने के प्रयास कर रहे हैं। दावा किया जाता है कि संघ से जुड़े अनेक नेता केशुभाई का साथ दे रहे हैं। इसके पूर्व संघ के प्रमुख नेता नागपुर के म.गो. वैध सार्वजनिक रूप से यह आरोप लगा चुके हैं कि गडकरी के विरूध्द जो कुछ भी हो रहा है उसमें नरेन्द्र मोदी का हाथ है।

                कर्नाटक में भी एक ऐसे भाजपा नेता ने विद्रोह की घोषणा कर दी है जो संघ की शाखा में वर्षों कवायद करने के बाद भाजपा में आये थे और जिनके प्रभाव और प्रयासों से कर्नाटक में भाजपा सत्ता आई थी। ये नेता हैं येदियुरप्पा जो दिसंबर के प्रथम सप्ताह में एक नई पार्टी बनाने वाले हैं।

                 मध्यप्रदेश में हालांकि समस्या उतनी गंभीर नहीं परन्तु यदा कदा विद्रोह के स्वर सुनाई देते हैं। इस समय मध्यप्रदेश में संगठन के चुनाव हो रहे हैं। इस चुनाव के लिये जो प्रक्रिया अपनाई गई है पार्टी के कुछ नेताओं ने उसकी सार्वजनिक रूप से आलोचना की है। जिन्होंने आलोचना की है उनमें भाजपा सांसद रघुनंदन शर्मा शामिल हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि शर्मा भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े हैं।

                   अभी तक यह समझा जाता था कि भाजपा की कितनी ही गंभीर समस्या हो संघ का नेतृत्व उसे सुलझा लेता है। परन्तु अब स्थिति काफी बदल गई है। और संघ उस स्थिति में नहीं है जब उसका डंडा भाजपा पर चल सकता है। अब तो स्थिति यह है कि भाजपा से जुड़े संघ के कार्यकर्ता और नेता स्वयं गुटों में विभाजित हैं। इस तरह संघ के नेतृत्व के सामने यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह किस गुट का साथ दे।

? एल.एस.हरदेनिया