संस्करण: 03 दिसम्बर -2012

देशभर में सबको मुफ्त दवा

हेतु केंद्र सरकार का कदम

? डॉ. सुनील शर्मा

                विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार म्यांमार व बॉग्लादेश के बाद भारत तीसरा देश है जो अपने नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएॅ देने में विफल रहा है। प्रसिद्व स्वास्थ्य पत्रिका लांसेट ने 2011 में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया था कि भारत में बीमारी में आने वाले भारी भरकम खर्च के कारण हर साल 3.9करोड़ लोग गरीबी के रेखा में शामिल हो जाते है। वहीं कार्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा दवाओं के संबंध में कराए गए शोध में पाया गया है कि देश विदेश की जानी मानी दवा कम्पनियॉ भारत में 203से 1123फीसदी तक मृनाफा कमा रही है। फलत: मॅहगी दवाओं एवं मंहगी निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने में अक्षम करोड़ों लोग अनैतिक ढंग से ठगी का कारोबार करने वाले नीम हकीमों का शिकार होतें हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी चिकित्सा सुविधा न मिलने के कारण लाखों गरीब और अशिक्षित मरीज ओझा और पण्डों के ताबीज के चक्कर में पड़कर असमय ही काल कलवित हो जातें है। मॅहगी दवा और इसके चलते इलाज की अनुपलब्धता से देश में जन्म लेने वाले प्रति हजार बच्चों में से 63 बच्चे पॉच साल पूरा करने के पहले ही मौत का शिकार बन जाते है। यह मृत्यु दर दक्षिण एशिया में सर्वाधिाक है। देश में 48 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं तथा शिशु एवं मातृत्व मृत्यु दर के मामले में भी हमारा देश चोटी पर है। जहॉ एक ओर महंगी दवाओं के चलते भारतीय गरीबी और मौत का शिकार बन रहें हैं वहीं कई अफ्रीकी देश भारत से सस्ती जेनेरिक दवाओं का आयात कर अपने अस्पतालों में मुत में वितरित कर रहें है। उल्लेखनीय है कि भारत में इलाज का 72फीसदी हिस्सा मंहगी ब्रांडेड दवाओं को खरीदने में खर्च हो रहा है। जैसे जैसे निजी दवा कम्पनियों का आधिापत्य बढ़ रहा है वैसे वैसे दवाओं पर होने वाला खर्च बढ़ता जा रहा है। एनएसएसओ के ऑकड़ों के अनुसार अस्पतालों में भर्ती मरीजों को जहॉ 1986 में 31.2 फीसदी दवाएॅ मुत मिलती थी वहीं 2004 में यह ऑकड़ा मात्र 9 फीसदी रह गया। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जहॉ एक ओर विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाओं के चलते हमारा देश विदेशियों के लिए मेडिकल टूरिज्म के रूप में उभर रहा है वहीं दूसरी ओर निजी अस्पतालों का महॅगा इलाज करोड़ों भारतीयों से दूर है। वास्तव में दवाओं का अति मॅहगा होनी ही भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का मूल कारण है।

                    वैसे भारत दुनिया के उन देशों में से एक है जिनमें दवाएॅ अत्यंत सस्ती है लेकिन दवा कम्पनियों और डाक्टरों के गठजोड़ के चलते मरीजों को मॅहगी दवाएॅ खरीदना मजबूरी है। दवाओं की कीमत कम रखने के उपाय लंबे समय से किए जा रहें हैं। इस दिशा में पहला प्रयास 1975 मे जयसुख लाल हाथी समिति की स्थापना से हुआ। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर कई आवश्यक दवाओं की कीमत में नियंत्रण करने में सफलता मिली। लेकिन 1995 में इसमें कई संशोधन किए जिससे दवाओं की कीमतें तेजी से बढ़ी। सरकार ने 74 दवाओं को छोड़कर बाकीं को बाजार के हवाले छोड़ दिया। और बाजार ने अपना खेल खेला डाक्टरों के लोभ के चलते मरीजों को महॅगी दवा की घुट्टी पिलाना शुरू किया। अब डाक्टर जेनेरिक दवाएॅ जो कि सस्ती होती हैं के स्थान पर ब्राण्डेड दवाएॅ ही मरीजों को लिखते हैं। डाक्टरों द्वारा लिखी दवाएॅ तयशुदा या उनके स्वयं के मेडीकल स्टोर्स पर ही मिलती है। अधिकतर दवा निर्माता मुनाफे को देखते हुए कीमत तय करते है। जिससे विभिन्न कम्पनियों की एक ही दवा की कीमतों में 10 से 40 गुना तक का अंतर आम है। और डाक्टर कमीशन के चक्कर में इनमें से मॅहगी दवा ही अपने पुर्जे पर लिखता है। अब प्रश्न ये है दवा की बेहिसाब कीमतों से लुटते मरीजों की रक्षा कैसे संभव है? तो इसके लिए रास्ते हैं-डाक्टरों को बाध्य किया जाए कि वो मरीजों को सस्ती और जेनेरिक दवाएॅ ही लिखे है। तथा सरकार सस्ती और जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करे। इसके लिए राजस्थान सरकार का जीवन रक्षक दवाओं के मुत वितरण मॉडल को अपनाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि राजस्थान की कांग्रेस  सरकार द्वारा अक्टूबर 2011से जारी जीवनरक्षक दवाओं के मुत वितरण योजना के अच्छे परिणाम मिले हैं यहॉ 15000 स्टोर खोले गए और फिर निजी उपक्रमों को सहभागी बनाकर जीवन रक्षक दवाओं का मुत वितरण किया जा रहा है। जिससे यहॉ पिछले एक साल में सरकारी अस्पतालों में जाने वालों की संख्या में 100 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की है। तमिलनाडु में 1995 से इस तरह की योजना सफलतापूर्वक लागु है। वैसे उच्च गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाओं का मुफ्त वितरण कोई मॅहगा काम नहीं है। कमीशन आफ माइक्रो इकॉनामिक्स एण्ड हेल्थ की गणना के अनुसार देश के सभी बाहृय रोगियों को यदि उच्च गुणवत्ता युक्त जेनेरिक दवाएॅ निशुल्क दी जाएॅ तो सालाना खर्च सिर्फ 9000 करोड़ रूपये होगा जबकि 2012-13 बजट के अनुसार स्वास्थ्य पर खर्च 34000 करोड़ रूपये प्रस्तावित है।

                 वैसे दवाओं के बढ़ते खर्च से निजात दिलाने  सरकारी और नागरिक समूहों के प्रयास जारी है। सुप्रीम कोर्ट में आल इण्डिया ड्रग एक्शन नेटवर्क और अन्य की ओर से 2003 में दायर जनहित याचिका के मद्देनजर सरकारी स्तर पर  आम आदमी को सस्ती दवाएॅ उपलब्ध कराने की योजना पर कवायद जारी है। इसके लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निधारण नीति 2011 का ड्राफ्ट तैयार किया है। इससे लगभग 60 फीसदी फार्मूलेशन मूल्य नियंत्रण के दायरे में आ जाएॅगे। केंद्र सरकार ने मुत दवा वितरण की योजना पर भी हरी झण्डी दिया दी है और 12 वीं योजना के अंत तक इसे पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। वास्तव में देश का हेल्थ इण्डेक्स सुधारना है तो आम आदमी तक सस्ती दवाओं की पहुॅच बनाना होगी। जो कि सरकार के दृढ़ निश्चय से ही संभव होगा।

? डॉ. सुनील शर्मा