संस्करण: 03 दिसम्बर -2012

क्या नाथम् चुन्दूर के रास्ते चलेगा ?

?    सुभाष गाताड़े

               गर हम नहीं लड़ते

               अगर हम लड़ते नहीं जाते

               तो दुश्मन अपनी संगीनों से हमें खत्म कर डालेगा

               और हमारी हड्डियों की ओर इशारा करके कहेगा

                देखा, यह गुलामों की हड्डियां हैं,

                गुलामों की

              दलित समुदाय से जुड़ी राजम्मा, नाथम् की निवासी, अपनी वीरान आंखों से अपने जले हुए घर को बार बार निहारती है। और जब भी वह देखती है,उसकी आंखों से आंसू टपकते हैं। अपने घर के एक एक हिस्से में उसकी स्मृतियों का भण्डार छिपा है, जो उसे अपने मरहूम पति की याद दिलाता है, जिसने अपनी तमाम उम्र गांव के जमींदार के यहां मजदूरी की।

                कभी कभी ऐसे भी लमहे आते हैं जब उसकी चीख आसमान को भेदते हुए निकल जाती है, जब उसकी आंखों के सामने उस मनहूस तारीख के तमाम मंज़र नमूदार होते हैं,जब इलाके की दबंग जाति के हथियारबन्द दस्तों ने,जिन्होंने अपने हाथों में पेट्रोल के कैन भी लिए थे,बस्ती पर हमला कर लूटपाट एवं आगजनी को अंजाम दिया था। कहा गया था कि उनकी बिरादरी की एक बेटी द्वारा राजम्मा की बिरादरी के एक नौजवान से किए प्रेमविवाह और तमाम दबावों के बावजूद अपने माता पिता के घर लौटने से इन्कार के बाद वह  'अपमानित' हुए थे और उसका बदला चुकाने के लिए उन्होंने राजम्मा की बस्ती नाथम एवं बगल की कई दलित बस्तियों को हमले का निशाना बनाया था। वह तथा नाथम के अन्य उसके समुदाय के लोग अपनी जान इसी वजह से बचा सके थे कि बस्ती के ही एक नौजवान ने आकर उन्हें सूचित किया था और जान बचाने के लिए वे सभी आसपास के खेतों में छिप गए थे।

                 7 नवम्बर को हुए इस काण्ड को दो सप्ताह से अधिाक वक्त बीत चुका है। और यह सवाल सभी के सामने मुंह बाए खड़ा है कि एक वक्त जयोति थास, पेरियार एवं अन्य सामाजिक क्रान्तिकारियों की अगुआई में चले आन्दोलन का साक्षी सूबा तमिलनाडु शूद्र जातियों से उपजे सम्पन्नशाली तबकों एवं दलितों के बीच के हिंसक संघर्षों का अखाड़ा कैसे बन चुका है। और यह भी पूछा जा रहा है कि इस स्थिति से दलितों को कब मुक्ति मिलेगी ?

               जले हुए मकान, टूटे हुए घर के सामान, जली साइकिलें, मोटरसाइकिलें एवं टेलीविजन सेटस, फाड़ी गयी स्कूली किताबें, जले हुए पढ़ाई के प्रमाणपत्र एवं राशनकार्ड, तमिलनाडु के धरमपुरी जिले के नैक्कनकोट्टाई ग्राम की तीन दलित बस्तियों - नाथम, कोण्डमपट्टी और अण्णानगर - पर हमले के बाद यही मंज़र सभी के सामने था। इलाके की वर्चस्वशाली जाति वनियार से जुड़े लोगों द्वारा किए इस संगठित हमले में दलितों के 500में से 268 मकान आग के हवाले कर दिए गए थे।

               वैसे देखें तो समय कितना बदल चुका है। साठ के दशक के उत्तरार्ध्द में या सत्तर के दशक के पूर्वार्ध्द में इलाके के दलित एवं अन्य पिछड़े समुदायों के लोग इलाके में आकार ले रहे कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़े थे। नाथम के पास जुड़ी सड़क पर जनता के लिए लड़ते शहीद हुए दो युवाओं की मूर्तियां भी लगी हैं, जिनमें से एक वनियार था। अब वे दिन बीत गए हैं और वही लोग इन दिनों समुदाय आधारित पार्टियों से ताल्लुक रखते हैं। जमीनी स्तर पर भी तमाम बदलाव आए हैं। नाथम तथा आसपास की तमाम दलित बस्तियों के युवा एवं कमानेलायक पुरूषों का अच्छा खासा हिस्सा इन दिनों बंगलौर में छोटे मोटे काम में मुब्तिला हैं। कुछ लोग निर्माण मजदूर हैं, कुछ लोग अन्य छोटे मोटे रोजगार में लगे हैं और अपनी हाडतोड मेहनत के बलबूते उन्होंने अपने गांवों में भी निवेश किया है,कुछ लोग जमीनों के भी मालिक बने हैं। शिक्षा पाने को लेकर भी दलितों में ललक बनी है। जाहिर है दलित जीवनविश्व में आ रहे तमाम बदलाव एवं दलितों की बढ़ती दावेदारी लम्बे समय से पिछड़ी जातियों में शुमार वनियार जाति के आंखों में खटक रही थी और वह गोया मौके की तलाश में थे।

               और वनियार जाति जी नागराजन की बेटी दिव्या द्वारा दलित तबके से जुड़े इलियाराजा से की शादी के बहाने उन्होंने 'दलितों को सबक सीखाने की ठानी। वनियार जाति की खाप पंचायत ने इलियाराजा के परिवार को चेतावनी दी कि वह दिव्या को वापस भेज दे,वरना खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहे। दिव्या ने किसी भी सूरत में अपने माता पिता के घर जाने से इन्कार किया और इसी बात पर नागराजन ने आत्महत्या की। और कुछ घण्टों के अन्दर ही वनियार जाति के युवाओं की लगभग 2,000 के करीब भीड़ ने दलित बस्तियों को अपना निशाना बनाया।

               घटना से जुड़े तमाम रिपोर्ट इसी बात को रेखांकित करते हैं कि सबकुछ बेहद सुनियोजित ढंग से चलाया गया। मकानों में लूटपाट एवं बड़े पैमाने पर आगजनीराज्य की कानून एवं व्यवस्था मशीनरी की पूरी नाकामयाबी का उदाहरण थी, जिसने तमाम सूचनाओं के बावजूद मामले में दखल देने से इन्कार किया और अब झेंप मिटाने के लिए वही मशीनरी सक्रिय दिख रही है। छपते-छपते यह ख़बर भी आयी है कि राज्य सरकार ने दलित अत्याचार की इस घटना की जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच सीआईडी पुलिस को सौंप दिया है। यह अलग बात है कि उसने अभी भी उन दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिानियम (1989) के अन्तर्गत मुकदमे काय नहीं किए हैं, जिन्होंने मामले की जांच में तथा आगे की कार्रवाई के मामले में भयानक लापरवाही बरती।

               वैसे यह बात को सुनिश्चित मान लेना कि जांच एजेंसियां ठीक से जांच करेंगी, यहभी सही नहीं है। अगर लोग सतर्क एवं जागरूक नहीं हैं तो इन जांच एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारी -जहां वर्णमानसिकता बड़े पैमाने पर विद्यमान है - समूचे घटनाक्रम के लिए दलितों पर ही दोषारोपण कर सकते हैं, ऐसी कई मिसालें मौजूद हैं। दिल्ली के पास घटित गोहाना काण्ड इसकी एक विशिष्ट मिसाल है। मालूम हो कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से महज 50-60 किलोमीटर दूर इस स्थान पर वर्ष 2005 में वाल्मिकियों की बस्ती पर इलाके की दबंग जाति (जाट) लोगों ने हमला किया था और कई मकानों में लूटपाट कर उन्हें जला डाला था। आपसी झगड़े में दलित युवाओं के हाथों हुई एक जाट युवक की हत्या का बदला चुकाने के नाम पर यह कार्रवाई की गयी थी,जिस दौरान पुलिस भी मूकदर्शक बनी रही थी। मामले की सम्वेदनशीलता को देखते हुए सीबीआई जांच की घोषणा हुई थी,सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक हरियाणा के गोहाना में 2005 में हुए दंगों के मामले में सीबीआई ने अपने आरोपपत्रा में कहा है कि बाल्मीकि बस्ती के कुछ लोगों ने मुआवजे की मंशा से अपने घरों में खुद ही आग लगाई थी। ... जिन 28 जले हुए घरों का सीबीआई ने मुआयना किया, उनमें से 19 बुरी तरह जल गये थे। इनमें नौ घरों का मुआयना किया गया, जिसमें लगता है कि इनमें मुआवजा लेने के लिए जान-बूझ कर आग लगाई गई।....महज इतनाही नहीं कि अपनी बात को 'पुष्ट' करने के लिये आरोपपत्र यहभी बताता है कि 'गेट, ताले और दरवाजों को तोड़ने का कोई सबूत नहीं मिलता तथा कपडे ज़ैसी बेकार की चीजें कमरों में बटोरी हुई मिलीं और घर का सामान जानबूझ कर बिखेरा गया मिला।' 

              - भास्कर, 12 जनवरी 2007, दिल्ली संस्करण

               क्षेपक के तौर पर यह बताया जा सकता है कि 2005 में उत्तर भारत में घटित गोहाना काण्ड एवं 2012 में दक्षिण में सामने आए इस नाथम काण्ड में एक अन्य विचित्र समानता भी देखी जा सकती है। नाथम एवं आसपास की दलित बस्तियों में आए हमलावरों ने लूटपाट के अलावा अपना निशाना उन साइकिलों को बनाया था जिन पर बैठकर दलित बच्चे स्कूल जाते हैं, इतनाही नहीं उन्होंने उनकी पाठयपुस्तकें एवं प्रमाणपत्रों को भी चुन चुन कर जलाया, गोहाना में भी यही विचित्रा तथ्य सामने आया था। स्पष्ट था कि वर्चस्वशाली जातियां फिर भले वह दक्षिण की हों या उत्तर की हों यह अच्छी तरह समझती हैं कि उत्पीड़ित तबके इसी वजह से आगे बढ़ने की हिमाकत कर पा रहे हैं क्योंकि ज्ञान पाने का हक़ उन्हें मिल गया है।

               नाथम एवं नैक्कनकोट्टाई ग्राम की अन्य दलित बस्तियों - कोण्डमपट्टी और अण्णानगर - में दबंग जाति के लोगों द्वारा की गयी आगजनी एवं लूटपाट को लेकर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं पुडुच्चेरी के मानवाधिाकार कार्यकर्ताओं एवं पत्राकारों के एक दल द्वारा उठायी गयी मांगें गौरतलब हैं। पिछले दिनों उन्होंने इन बस्तियों का दौरा किया एवं वास्तविक नुकसान का जायजा लिया। पीड़ितों को मुआवजा देने के अलावा उन्होंने यह मांग की कि नाथम में ही विशेष अदालतें कायम की जाएं ताकि मुकदमे की सुनवाई के लिए दलितों को अधिाक दूरी तक जाना ना पड़े (द हिन्दू, 16 नवम्बर 2012)

                वैसे बहुत कम लोग अनुसूचित जातियों एव अनुसूचित जनजातियों अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) के इस अहम प्रावधान से वाकीफ दिखते हैं, कि इसके अन्तर्गत ऐसा किया जा सकता है। दरअसल वर्ष 1991 में सामने आए चुंदूर (आंधा्र प्रदेश) काण्ड जिसमें इलाके की वर्चस्वशाली जाति रेड्डी समुदाय की उग्र भीड़ ने कई दलितों को मार डाला था, इस घटना में दलितों एवं अन्य जनतांत्रिक ताकतों के लम्बे संघर्ष की बदौलत विशेष अदालत चुंदूर गांव में ही कायम हुई थी, जिसने 2007 को दिए अपने फैसले में इस सामूहिक जनसंहार में संलिप्तता को लेकर बीस अभियुक्तों को उमर कैद की सज़ा भी सुनायी थी तो 35 अन्य लोगों को एक साल कैद बामशक्कत सुनायी थी। इस अधिानियम के बीस साला इतिहास में यह शायद एकमात्र अवसर था कि ऐसी अदालत घटनास्थल पर ही कायम हुई थी। इस तथ्य को रेखांकित किया जाना जरूरी है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन में अपनी सहभागिता का लम्बा अनुभव कहें या आंधा्र प्रदेश की तमाम जनतांत्रिक एवं वाम शक्तियों द्वारा उनके संघर्ष को दिए समर्थन का नतीजा कहें, इलाके के दलित पूरी तरह संगठित थे कि जब तक विशेष अदालत गांव में बनी नहीं उन्होंने न अदालत के किसी समन को ग्रहण किया और न कभी थोड़ी दूर बनी उस अदालत में गए जहां मामले की सुनवाई का राज्य सरकार ने घोषणा की थी। उन्होंने एक सुर से मांग की कि अदालत को उनके पास आना पड़ेगा और फिर सरकार को झुकना पड़ा था। इतना ही नहीं उन्होंने यहभी मांग की थी कि उन्हें ऐसा पब्लिक प्रॉसिक्यूटर एवं न्यायाधाीश मिले जिसका रेकार्ड दलित अत्याचारों के मामले में सकारात्मक हो। सरकार को यहां भी झुकना पड़ा था।

               चुंदूर के दलितों की जीत एक अन्य मामले में भी ऐतिहासिक कही जा सकती है। अत्याचारों के ऐसे सभी मामले में यह बेहद सामान्य है कि जैसे जैसे वक्त बीतता है पीड़ितों एवं उनके परिवारों की न्याय पाने के संघर्ष में रूचि कम होती जाती है। आप इसे मुकदमे की थकान का नतीजा कहें, उन पर पड़नेवाले दबाव का नतीजा मानें या उन्हें दिए जानेवाले प्रलोभन का असर कहें, वे कभी कभी अपने बयानों को अदालत में पलटते नज़र आते हैं। लेकिन ऐसी कोई भी बात चुंदूर में नहीं सामने आयी। चुंदूर में दलितों को इन्साफ दिलाने की मुहिम में मुब्तिला लोगों की समझबूझ के चलते इन सोलह सालों के दौरान वे पूरी तरह संगठित रहे और उन्होंने इलाके की वर्चस्वशाली जाति को सबक सीखा कर ही दम लिया।

               सवाल यह उठता है कि क्या नाथम एवं नैक्कनकोट्टाई ग्राम की अन्य दलित बस्तियों - कोण्डमपट्टी और अण्णानगर -के दलित संगठित रह कर चुंदूर के दलितों द्वारा दिखाए रास्ते पर चल सकेंगे ? हमारे सामने एक विशाल सम्भावना मौजूद है और एक ऐतिहासिक चुनौती भी ।

? सुभाष गाताड़े