संस्करण: 31  अक्टूबर- 2011

बाजार भाव पर क्यों नहीं होती कृषि मूल्य वृध्दि

? सुनील अमर

               कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) द्वारा सुझाए गए गेंहूॅ के मूल्य वृध्दि प्रस्ताव को आधा स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार ने रबी की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया है। देखने में तो यह वृध्दि अब तक की सबसे अधिक एकमुश्त वृध्दि कही जा सकती है लेकिन बाजार की दशा को देखते हुए शक है कि यह किसानों के घावों पर मरहम लगा सकेगी। 

               गत वर्ष तो गेंहॅू के दामों में सिर्फ बीस रुपये प्रति कुंतल की ही वृध्दि की गई थी। इस पर जब किसानों ने सरकारी क्रय केंद्रों के बजाय निजी क्रेताओं को गेंहूॅ बेचना शुरु कर दिया तो हारकर सरकार ने 50रुपये प्रति कुंतल का बोनस भी स्वीकार किया। तब कहीं जाकर सरकारी गेंहूॅ 1170रुपये प्रति कुंतल हो पाया था। सो इस बार भी खेती से चार पैसा पाने की उम्मीद किसानों को छोड़ देनी चाहिए। कृषि संसाधनों व दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दाम आसमान छूने के बावजूद सरकार के मन में उनके प्रति कोई झुकाव नहीं है।

               सीएसीपी ने वर्ष 2012-13 के लिए गेंहूॅ के न्यूनतम समर्थन मूल्य में रु.230 वृध्दि का प्रस्ताव  किया था लेकिन खाद्य व वित्त मंत्रालयों ने इस पर यह कहते हुए आपत्ति जतायी थी कि इससे मॅहगाई और बढ़ जाएगी। सीएसीपी के बजाय केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस वर्ष गेंहूॅ के मूल्य में रु. 115 प्रति क्विंटल वृध्दि की राय दी थी और वही मानी भी गई। जानना दिलचस्प होगा कि अभी कुछ वर्ष पहले तक दो रुपया और पाँच रुपया प्रति कुंतल की वृध्दि की जाती रही है। किसानों के साथ यह कितना क्रूर मजाक है! नये समर्थन मूल्य से गेंहॅू का दाम 11 पैसा प्रति किलो मंहगा हो जाएगा। देश में क्या और कोई ऐसी वस्तु है जिसके दाम में महज 11पैसे प्रति किलो की वृध्दि होती हो? घटती जमीन और छोटी होती जोतों के कारण देश में लगभग 70 प्रतिशत किसान ऐसे हैं जो शायद ही 10 कुंतल गेंहॅू बेचने की क्षमता रखते हों। सरकार के 20 रुपया कुंतल दाम बढ़ा देने से उन्हें 200 रुपये और मिल जाएगें। यही एक किसान की सकल प्राप्ति है और यह उसके छह महीने की कमाई का प्रतिफलन है!इससे क्या यह नहीं लगता कि अनाज की मूल्य वृध्दि करते समय सरकार उसे पैदा करने वाले किसान की नहीं बल्कि उसे खरीदने वाले मध्यम वर्ग का ख्याल रखती है? वैसे कटु सत्य तो यह है कि सरकार के दाम बढ़ाने का लाभ महज 30 प्रतिशत वे किसान ही उठाते हैं जो बड़े काश्तकार होते हैं।

               कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) से एक सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि उपज का मूल्य निर्धारण करते समय क्या वह इसके समानान्तर अन्य क्षेत्रों के आय में हो रही वृध्दि और बाजार का ख्याल नहीं रखता? क्या यह ध्यान रखने का काम उसका नहीं है कि किसान अपनी खेती से जीविकोपार्जन कर सके? इस वर्ष फरवरी में संसद के बजट सत्र में आर्थिक सर्वेक्षण पेश होने के पूर्व प्रधानमंत्री ने राज्य सभा में कृषि और किसानी को सरकार की प्राथमिकता बताया था। उनकी इस घोषणा के बाद से डीजल व ऑयल, रासायनिक उर्वरक, बीज व कीटनाशक आदि के दामों में काफी वृध्दि हो चुकी है तथा बाजार में दैनिक उपभोग की वस्तुओं के दाम कहॉ से कहॉ पहुॅच गये हैं। क्या इसी के समतुल्य कृषि उपज का दाम नहीं बढ़ना चाहिए?सरकार अपने कर्मचारियों को जिस मानक से वेतन व मॅहगाई भत्ते की वृध्दि देती है, क्या उसी के अनुरुप किसानों को उनकी उपज का दाम नहीं मिलना चाहिए? पिछले पॉच साल का आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि कृषि क्षेत्र की लगातार उपेक्षा के कारण किसानों के आत्महत्या करने का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। इस संत्रास के कारण बीते 15 वर्षों में ढ़ाई लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। कृषि के अलाभकारी होने का क्या इससे बड़ा सबूत भी चाहिए?

               आयोग को चाहिए कि वह किसानों के लिए उनकी जोत के हिसाब से एक न्यूनतम आमदनी निश्चित करने की व्यवस्था करे। मूल्य वृध्दि के नाटक से कुछ नहीं होने वाला है। देश में जिस तरह सीमांत किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है उससे या तो किसान सिर्फ खाने भर को ही अनाज पैदा करेंगें और बाकी का सरकार को विदेशों से दोगुनी कीमत पर आयात करना होगा या फिर सरकार विकट तानाशाही का प्रदर्शन करते हुए उनकी जमीनें अधिगृहीत कर ले और देशी-विदेशी उद्योगपतियों को खेती करने के लिए सौंप दे। यह रहस्य समझ में नहीं आता कि सरकार विदेशों से निम्न कोटि का सड़ा हुआ गेंहॅू 2000-2200 रुपया प्रति क्विंटल खरीद सकती है लेकिन अपने किसानों को वह 1500 रुपया क्विंटल भी देने को तैयार नहीं!

               सरकार की मूल्य निर्धारण समितियॉ वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर वैसे ही कृषि लागत निकालती हैं जैसे हवा-हवाई ढ़ॅग से मुद्रा स्फीति तय की जाती है। कहने को इसमें एकाधा किसान प्रतिनिधि भी रहते हैं लेकिन वे फार्म-संस्कृति वाले होते हैं। ये समितियॉ कभी भी मुख्यालयों से 150-200किलोमीटर दूर जाकर सीमांत किसानों से उनका दु:ख-दर्द और कृषि लागत पूछने की जहमत नहीं उठाती। आप देख सकते हैं कि आज न्यूज चैनलों पर तथाकथित कृषि चर्चा में किस तरह लक-दक लोग ( और प्राय: तो सूट-बूट और टाई युक्त विशेषज्ञ भी! ) भाग लेते नजर आते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार अगर किसान को उसकी जोत पर न्यूनतम आमदनी की गारंटी नहीं दे सकती तो उसे चाहिए कि कम से कम 10साल पहले के किसी भी कालखंड को वह मानक मान ले और उसके अनुरुप जिस अनुपात में आवश्यक वस्तुओं के बाजार भाव बढ़ें, किसानो के उत्पाद के भी दाम उसी अनुरुप तय किये जांय। आखिर किसान अपनी दैनिक जरुरत की कुछ ही चीजें पैदा कर पाता है बाकी उसे भी बाजार से खरीदनी पड़ती हैं। प्रसंगवश जानना दिलचस्प होगा कि वर्ष 1967में एक क्विंटल गेंहॅू में 121ली. डीजल मिलता था लेकिन आज सिर्फ 24ली.! उस वक्त ढ़ाई क्विंटल  गेंहॅू में एक तोला सोना मिल जाता था और आज? आज देश का 95 प्रतिशत किसान गेंहॅू बेचकर सोना खरीदने के बारे में सोच भी नहीं सकता! कैसे आ गया इतना नीचे गेहॅू का दाम? यह हाल तब है जब षुरु से ही किसानों की उपज का दाम लगाने की जिम्मेदारी सरकार ने ही ले रखी है।

? सुनील अमर