संस्करण: 31  अक्टूबर- 2011

अब वह नकोशी

दगडी या धोंडी नहीं !         

? अंजलि सिन्हा

               महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण अन्य किसी बात के लिए जाने जाएं या नहीं मगर बाद में इस बात के लिए जरूर याद किए जाएंगे कि उनके कार्यकाल में उनके अपने गृहजिले सातारा में तमाम लड़कियों को नयी पहचान दी गयी थी,जिसके अन्तर्गत माता पिता द्वारा अपनी ही बेटियों को दिए गए नकारात्मक बोध से लैस नामों से उन्हें मुक्ति दिलायी गयी थी।

               मराठी में 'नकोशी' का अर्थ अनचाही तथा 'दगडी', 'धोंडी' का अर्थ पत्थर होता है। पिछले दिनों महाराष्ट्र में सातारा जिला में जिला प्रशासन द्वारा समाज में महिलाओं के दर्जे को उंचा उठाने के उद्देश्य से एक अनोखा कार्यक्रम लिया गया। जिला अधिकारी एन रामस्वामी ने बताया कि एक सर्वेक्षण के द्वारा नकोशी या नकुशा नाम का पता लगाया गया। स्कूल रिकार्ड में 280 लड़कियों के यह नाम मिले। फिर उन बालिकाओं के अभिभावकों से मिलकर उन्हें राजी करने की कोशिश की गयी कि वे बच्चियों के नाम बदलवायें । जिला परिषद में इन लड़कियों के पहचान और नामकरण समारोह का आयोजन किया जहां घरवालों तथा खुद लडकियों ने अपने पसन्द से अपना नया नाम दिया। स्कूल रेकॉर्ड में भी इन नामों को बदलने की प्रक्रिया चली। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि इस इलाके में फिर कोई नवजात जन्म लेती है तो शायद ही उसका नाम माता-पिता नकोशी रखें क्योंकि इस आयोजन का सन्देश हर घर में पहुंचा होगा। यद्यपि लड़कियों का मानसम्मान बढाने के लिए यह कदम छोटा ही है किन्तु कई ऐसे कदम मिलकर ही माहोल बदल सकते हैं। सरकारी स्तर से किया गया ऐसा प्रयास सराहनीय है।

              निश्चित ही नकोशी नाम एक स्त्रोत है यह जानने का कि भेदभाव है लेकिन इसके अलावा अन्य कई तरीके हैं जो बताते हैं कि बेटा बेटी में कितना अन्तर मौजूद है मसलन बराबर की शिक्षा नहीं है। जाहिर है यह परिघटना सिर्फ सातारा जिले में ही विद्यमान नहीं है। बेटियों के प्रति अपनी गहरी उपेक्षा प्रगट करनेवाले नाम भारत के दूसरे हिस्सों में भी आसानी से ढूंढे जा सकते हैं,जैसे हरियाणा के कई गांवों में भटेरी नाम काफी प्रचलित है। भटेरी दरअसल 'बहुतेरी' का ही तद्भव रूप है, इसका अर्थ भी 'फालतू' कहा जा सकता है।

               कुछ माह पहले देश के एक अग्रणी अंग्रेजी दैनिक (इण्डियन एक्सप्रेस) में महाराष्ट्र के सातारा जिले के बारे में दी गयी एक रिपोर्ट ने पहली बार इस परिघटना पर रोशनी डाली थी। जिला स्वास्थ्य विभाग को जब अपने दैनंदिन कामों के दौरान 'नकोशी' नाम वाली चन्द लड़कियां मिली तो यह अजीब सा नाम सुन कर अधिक जानकारी हासिल करने के लिए एक सर्वेक्षण किया गया ताकि जाना जा सके कि ऐसी कितनी लड़कियां आसपास रहती हैं। सर्वेक्षण के रिपोर्ट देख कर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी चकित थे जिन्हें 0 से 16 साल की उम्र के बीच 222 ऐसी लड़कियां मिली थीं जिनके नाम नकोशी थे। सर्वे में यह पता चला कि बेटे के इन्तज़ार में पैदा हुई बेटियों का ही नाम अधिकतर यह है। अधिकतर लड़कियों ने सर्वेक्षणकर्ताओं को बताया था कि उन्हें उनका यह नाम पसन्द नहीं है। इनमें से कई लड़कियों को तो माता-पिता स्कूल तक नहीं भेजते थे।

               फिर जिला स्वास्थ्य विभाग ने उस इलाके में एक जनजागरण अभियान चलाया था जिसमें मातापिता को भेदभाव के खिलाफ जागरूक करने के अलावा इन लड़कियों के नए नामकरण के प्रयास की भी चर्चा चली। डाक्टर भगवान पवार,जिन्होंने जिले में इस परियोजना की शुरूआत की,उनका कहना था कि यद्यपि जिले में बेटा बेटी अनुपात धीरे धीरे सुधर रहा है लेकिन फिर भी लक्ष्य दूर है। यहां 1,000 पर 884 लड़कियों का अनुपात है। जितनी संख्या में नकोशी नाम का पता उपरोक्त जिले की कुछ तहसीलों में लगाया जा चुका उससे यह पता चला था कि यह उपेक्षा अपवादों में नहीं है।

               एक ही जिला में इतनी बडी संख्या में नकोशी नाम का पाया जाना भी इस बात का सबूत है कि लड़किया कितनी अवांछित है। यदि उसकी स्थिति ऐसी है तो फिर क्यों नही लोग मौका और सुविधा मिलते ही  उन्हें गर्भ में ही खतम कर देने का प्रयास करेंगे। जिन्हें मार नहीं पाये और जो जनम से ही अनचाही और अवांछित होंगी तो उनके विकास पर कितना धयान रहता होगा यह सोचने वाली बात है। ऐसी मानसिकता के रहते क्या हम उम्मीद कर सकते है कि समाज महिलाओं को समानता का दर्जा मिल सकता है?

                 समस्या की गम्भीरता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले एक दशक में लड़कियों की संख्या 1,000 लड़कों पर 940 से घट कर 914 हो गयी है। विश्लेषकों तथा समाजविज्ञानियों ने यह चिन्ता व्यक्त की है कि महिलाओं की संख्या जितनी कम होगी उनके साथ अन्याय और हिंसा उतनी ही बढ़ सकती है।

               महिलाओं के साथ भेदभाव कितने गहरे स्तर पर मौजूद है यह संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानवविकास रिपोर्ट 2010 से भी जाना जा सकता है। इसके मुताबिक भारत में मातृमृत्यु दर पड़ोसी देश पाकिस्तान से भी खराब है। यहां प्रति एक लाख जीवित जन्मे बच्चे पर बच्चा जनते समय 450माताओं की मृत्यु हो जाती है जबकि पाकिस्तान में 320 माताएं दम तोड़ती है। माता बनने के लिये आवश्यक आयु सीमा भी हमारे यहां कम है। मानव विकास रिपोर्ट के लैंगिक असमानता सूचकांक में भारत का रेकार्ड पाकिस्तान सहित कई पिछड़े और निर्धन पड़ोसियों से खराब है। समग्र विकास सूचकांक में भारत 119 वे स्थान पर है।

                आज भी जमीन पर मालिकाना हक में औरत का प्रतिशत मात्रा 9.21 फीसदी है। (विश्व के खाद्य एवं कृषि संगठन एफ ए ओ के मुताबिक)। एफ ए ओ ने 78 देशों के बारे में आंकड़े पेश किए हैं जहां औरत और पुरूष के बीच जमीन के बंटवारे में भारी अन्तर है। यही स्थिति शेष चल-अचल सम्पत्ति में भी बनी हुई है। यद्यपि आज के समय में वे कमाने के लिए आगे आ रही हैं लेकिन अन्तर को पाटने में अभी दशकों लग जाएंगे। जब तक परिवारों में सम्पत्ति तथा आय में बराबर की स्थिति स्त्री पुरूष की नहीं बन पाती तब तक भरण-पोषण का मसला बना रहेगा। बावजूद इसके यदि औरत स्वयं सक्षम है तो उसे खुद ही भरण-पोषण से इन्कार कर देना चाहिए वह इसलिए ताकि उसकी निर्भरता पूर्वपति पर न बने लेकिन अपना बराबर की हकदारी नहीं छोड़नी चाहिए।

               लेकिन बेटी को क्यों नहीं पैदा करना चाहते हैं इसके कारणों की पड़ताल भी जरूरी है तथा साथ ही साथ दोषियों को सज़ा मिले यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अब तक इस समस्या को समाधान बेहद सतही स्तर पर ढूंढा जाता रहा है जिसमें माना जाता है कि लोगों को विभिन्न जागरूकता अभियानों द्वारा यह सन्देश दिया जाए कि बेटी कैसे अनमोल है और वे बेटी को कमतर न समझें, माता पिता बेटा बेटी में भेद न करें आदि। दूसरी तरफ कानून बनाने पर जोर रहा जिसे कभी ठीक से लागू ही नहीं किया गया।

               लेकिन यदि मूल कारण पर ठीक से समझ बना कर रणनीति बनायी जाती तो औरत के सामाजिक हैसियत में फरक डालने के लिए गम्भीर उपाय निकाले गए होते जिसमें कि उनके आर्थिक सशक्तिकरण पर जोर होता,उन्हें समाज के हर क्षेत्र में बराबर का प्रतिनिधित्व मिले यह सुनिश्चित किया जाता। तभी तो वास्तविक स्थिति बदलती। यदि विशेष प्रयासों से सभी नौकरियों में बराबरी मिलती, घर परिवार की जिम्मेदारी पुरूषों की तरह ही उठाने में उन्हें भरपूर अवसर मिलता तो एक दशक बीतते ही उसका असर दिखने लगता।

               नाम रखने में उपेक्षा करना या खराब नाम रखना तो सामाजिक हैसियत का निम्न स्तर दर्शाता ही है। जैसे कुछ रोज पहले मधयप्रदेश के किसी जिले के गांव की ख़बर थी जहां गांव के वर्चस्वशाली जाति के घर में जनमी सन्तान का नाम दशरथ रखा गया था, कुछ समय बाद जब आदिवासी  परिवार में बेटा जनमा तब शौक से उन्होंने भी उसका नाम दशरथ रखा। वर्चस्वशाली जाति के सदस्यों को यह बात इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने आदिवासी परिवार के मुखिया को बुला कर पेड़ से बांधा कर पीट दिया और नाम बदलने के लिए मजबूर किया।

 
? अंजलि सिन्हा