संस्करण: 31  अक्टूबर- 2011

लवासा पर पर्यावरण मंत्रालय ने

अख्तियार किया सख्त रुख      

? जाहिद खान

               हमारे मुल्क में बीते एक दशक में जिस तरह से विकास के नाम पर पर्यावरण का विनाश हुआ, वैसा शायद ही कभी हुआ होगा। गोया कि किसी भी पार्टी की हुकूमत हो, नीतिगत निर्णय लेते वक्त वह पर्यावरण संरक्षण की जरा सी भी परवाह नहीं करती। पर्यावरण की तरफ से वे पूरी तरह अपनी आंखे मूंद लेती हैं। यही वजह है कि पर्यावरण को गंभीर नुक्सान पहुंचा। मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों में आज भी ऐसी कई परियोजनाएं चल रहीं हैं,जिनको मंजूरी देते वक्त पर्यावरण का कोई ख्याल नहीं रखा गया। महाराष्ट्र स्थित लवासा में एलसीएल की हिल सिटी ऐसी ही एक परियोजना है,जो पिछले कुछ सालों से पर्यावरण व वन नियमों का उल्लंघन कर परवान चढ़ रही थी। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने हाल ही में इस विवादास्पद परियोजना को मंजूरी देने से साफ इंकार कर दिया है। परियोजना पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए मंत्रालय का कहना है कि जब तक पूर्व शर्तों का पालन नहीं किया जाता,तब तक पर्यावरण मंजूरी नहीं दी जा सकती। परियोजना को अनधिकृत और पर्यावरण के प्रतिकूल ठहराते हुए,मंत्रालय ने कंपनी को परियोजना स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।

                गौरतलब है कि मंत्रालय का नया आदेश मुंबई हाईकोर्ट के पिछले महीने के निर्देश के बाद आया है। जिसमें अदालत ने मंत्रालय को लवासा कारपोरेशन के पुणे के नजदीक टाउनशिप परियोजना के आवेदन नियमन पर तीन हफ्ते में आखिरी फैसला करने को कहा था। मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा ''पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के उल्लंघन पर ठोस कार्रवाई की पूर्व शर्त का अनुपालन नहीं किया गया है। लिहाजा, मंत्रालय लवासा की दो हजार हेक्टेयर में बनने वाली परियोजना के पहले चरण को पर्यावरण मंजूरी देने में असमर्थ है।''मंत्रालय ने लवासा के चेयरमैन की इस दलील, पर्यावरण मंजूरी मिलने से पहले कुछ दीगर परियोजनाओं पर निर्माण कार्य शुरू हो गया था, को खारिज करते हुए आगे कहा लवासा की तुलना दीगर छोटी परियोजनाओं से नहीं किया जा सकता। यह योजना इनसे पूरी तरह से अलग है। लवासा परियोजना दो हजार हेक्टेयर में फैली है, जो कि पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। इसमें बड़े पैमाने पर कटाई व जमीन की भराई होगी, जिसके चलते भविष्य में जल निकासी बंदोबस्त में बदलाव आ सकता है। यही नहीं, पर्यावरण के नुकसान का असर भी बड़े इलाके पर होगा। ऐसे में जरूरी है कि परियोजना के लिए पूर्व शर्तों का अनुपालन हो।

               दरअसल, एलसीएल की हिल सिटी परियोजना पर्यावरण प्रभाव आकलन की 1994, 2004, और 2006 की अधिसूचनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर आकार ले रही थी। लवासा कारपोरेशन ने पर्यावरण मंत्रालय से बिना मंजूरी मिले ही पुणे के नजदीक अपना निर्माण कार्य शुरू कर दिया था। 100 वर्ग कि.मी. में फैले इस पूरे इलाके को पहले तो एक सर्वे फर्म ने संबंधित परियोजना शुरू करने के लिए उपयुक्त करार दिया और फिर बाद में महाराष्ट्र हुकूमत ने परियोजना के गुण-दोष को देखे बिना आनन-फानन में इसके लिए विधेयक पास कर दिया। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की भागीदारी वाली सरकार, निविदा के नियम-कायदों की वजह से होने वाली देरी को कम करने के लिए इस व्यवस्था को ही लांघ गई। बताया जाता है कि इस कंपनी में शरद पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले के 12 फीसद शेयर हैं, वहीं उनके पति की हिस्सेदारी अलग। जाहिर है, जब परियोजना में सत्ताधारी पार्टी के लीडरों की सीधे-सीधे हिस्सेदारी हो तो अड़ंगा लगाने वाला कौन था ? बहरहाल, विवादास्पद बिल की मंजूरी के बाद भी महाराष्ट्र के सियासी हल्के में इस परियोजना पर जरा सा भी शोर नहीं मचा। एक हजार बड़ी अट्टालिकाओं और 500 अपार्टमेंट की हाईटेक हिल सिटी के लिए 25 गांवो को पल भर में उजाड़ दिया गया। परियोजना को कामयाब बनाने के लिए स्थानीय आदिवासियों पर जबरन विस्थापन आरोपित किया गया।

               पर्यावरण नियमों की अनदेखी, स्थानीय आदिवासियों के विस्थापन के अलावा लवासा परियोजना में ऐसी कई अनियमितताएं बरती जा रहीं थीं,जिसे जानकर भी महाराष्ट्र सरकार नजरअंदाज किए हुए थी। मसलन, लवासा को जिस वारसगांव बांध के पानी के सहारे विकसित किया जा रहा है,उसका पानी पुणे के लोग इस्तेमाल करते हैं। बीते कुछ सालों से पुणे खुद, पानी की कमी का संकट झेल रहा है। मगर यह सब जानते हुए भी सरकार ने वारसगांव के बांध के पानी को लवासा की ओर मोड़ने की इजाजत दे दी। यही नहीं 11.5 टीएमसी क्षमता वाले वारसगांव बांध के पानी से भी जब लवासा की जरूरत पूरी नहीं हो पाई,तो सरकार ने कृष्णा घाटी में बिना किसी ठोस पर्यावरणीय जांच के जल संग्रहण और नए बांध बनाने पर भी सहमति दे दी। यानी, लवासा हिल सिटी को परवान चढ़ाने के लिए कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन सरकार ने हर नियम, कायदे-कानूनों को ताक पर रख दिया। ऐसे में स्थानीय अवाम की गुहार कौन सुनता ? उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुई। पानी जब सिर से ऊपर हो गया, तब जाकर पर्यावरण मंत्रालय ने इसमें हस्तक्षेप किया।

               मंत्रालय ने एलसीएल को पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 की धारा 5 के तहत बीते साल 25 नवम्बर को कारण बताओ नोटिस जारी किया और 15 दिन के अंदर अपना जबाव दाखिल करने को कहा। कंपनी मंत्रालय को कोई जबाव देती, इसके उलट उसने मुंबई हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दी। हाईकोर्ट ने रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य और केन्द्र दोनों को परियोजना स्थल पर जाने और निर्माण कार्यों का गहन निरीक्षण करने के निर्देश दिए। केन्द्र और राज्य की विशेषज्ञ आकलन समिति ने लवासा सिटी का दौरा किया और पर्यावरण मंत्रालय को अपनी आखिरी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट के संपूर्ण अध्ययन के बाद पर्यावरण मंत्रालय इस नतीजे पर पहुंचा कि एलसीएल की पूरी परियोजना न सिर्फ गैर कानूनी है,बल्कि पर्यावरण के प्रतिकूल भी है। हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मंत्रालय ने परियोजना पर अब सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। उसने कंपनी के सामने कुछ शर्तें रखी हैं। एलसीएल यदि इन शर्तों पर कोई वाजिब प्रतिक्रिया देती है और मंत्रालय को इस मामले में आगे बढ़ने योग्य संबंधित और विश्वसनीय सामग्री मुहैया कराती है,तो मंत्रालय कंपनी की परियोजना पर गुण-दोष के आधार पर विचार करेगा। मंत्रालय ने कंपनी को साफ कर दिया है, कि इस मामले में विचार तभी किया जाएगा, जब पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करने के लिए दंड का भुगतान और पर्याप्त राशि के साथ पर्यावरण बहाली कोष की स्थापना व परियोजना की व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन रपट तैयार और प्रबंधान योजना बनाई जाएगी।

               कुल मिलाकर, पूरा मामला मुंबई हाई कोर्ट में विचाराधीन है और आखिरी फैसला अभी आना बाकी है। परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी पर अंतिम फैसला महाराष्ट्र सरकार की इस मामले में कार्रवाई व मुंबई हाई कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगा। लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने परियोजना पर सख्त रुख अख्तियार कर कंपनी को यह साफ-साफ जतला दिया है कि वह अपना काम नियमों के मुताबिक और उचित तरीके से करे। परियोजना के लिए कानून में अलग से कोई नरमी नहीं लाई जाएगी। यह सही भी है। प्राकृतिक संसाधानों के दोहन की मंजूरी देने के मामले में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। यदि प्राकृतिक संसाधानों के दोहन की इजाजत देने की प्रक्रिया सक्षम, प्रतियोगी और पारदर्शी तरीके से होगी, तो पर्यावरण का विनाश भी कम होगा। आर्थिक वृध्दि के नाम पर पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाने की किसी भी कार्रवाई को जायज नहीं ठहराया जा सकता। सरकार को ऐंसी संतुलित नीति बनानी चाहिए, जिसमें आर्थिक वृध्दि के साथ पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। उम्मीद है, लवासा मामले में सरकार के सख्त रुख के बाद, मुल्क में बीते कुछ सालों से पर्यावरण विनाश की शर्त पर किए जा रहे आर्थिक विकास पर कुछ लगाम लगेगी।

 
? जाहिद खान