संस्करण: 31  अक्टूबर- 2011

खुल गई मोदी की पोल

विकास पुरुष नहीं प्रचार पुरुष

? विवेकानंद

               पाखंड का पर्वत कितना ही विशाल क्यों न हो जाए, सच की एक ठोकर उसे धरासाई कर देती है। गुजरात के मुख्यमंषी नरेंद्र मोदी ने स्वयं को विकास पुरुष घोषित करने के लिए जो-जो हथकंडे अपनाए मानव विकास रिपोर्ट में वे सब खंड-खंड होकर बिखर गए। रिपोर्ट के मुताबिक नरेंद्र मोदी के गुजरात राज्य की स्थिति अन्य राज्यों के मुकाबले खराब है। गुजरात में कुपोषित बच्चों की संख्या ज्यादा है, इस मामले में स्वयं का प्रचार कराके विकास पुरुष बने मोदी, हर पेट को रोटी और हाथों को रोजगार देने का दावा करने वाले मोदी महान के राज्य में पांच साल से कम उम्र के बच्चे 44.6फीसदी कुपोषण से पीडित हैं। राज्य में 70फीसदी बच्चे एनीमिया से पीडित हैं। इस दिशा में विकास का थोथा डंका पीटने वाले मोदी की अपेक्षा उत्तार प्रदेश में मायावती और बिहार में नीतीश कुमार ने बेहतर काम किया है।

               यह आंकडे बताते हैं कि मोदी वास्तव में राज्य का विकास करके विकास पुरुष नहीं बने हैं बल्कि स्वयं का प्रचार करके और कई जगह राज्य की कुछ अच्छी बातों जो वहां के नागरिकों की गाढी कमाई से अस्तित्व में आईं हैं, को अपने पक्ष में दिखा-दिखाकर विकास पुरुष का मुखौटा पहने घूम रहे हैं। जैसा कि उन्होंने अमेरिका की रिपोर्ट के साथ किया। कहा जाता है कि अमरीकी कांग्रेस रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट में मोदी के शासन की सराहना की थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत की प्रभावी शासन और प्रभावशाली विकास का सबसे अच्छा उदाहरण गुजरात है। जहां मोदी के सुव्यवस्थित आर्थिक प्रक्रिया है। वास्तव में यह अधूरा सच है, इसका खुलासा अगले ही दिन अमेरिकी अफसरों ने कर दिया था। इस रिपोर्ट का केवल वही हिस्सा प्रचारित किया गया था जिसमें गुजरात की तारीफ की गई थी, जबकि वे हिस्से छोड दिए गए थे जिसकी जमकर आलोचना की गई थी। मोदी के विषय में अमेरिका का बयान ठीक वैसा ही था जैसा भाजपा का रहता है। यानि मोदी प्रधानमंषी पद के दावेदार हो सकते हैं। अब जाहिर सी बात है कि यदि भाजपा की ओर से मोदी प्रधानमंत्री इन वेटिंग होते हैं तो उनका मुकाबला प्रचार के दौरान कांग्रेस के सबसे प्रभावी चेहरे राहुल गांधी से होगा। अमेरिकी रिपोर्ट में भी यही कहा गया, लेकिन इस रिपोर्ट को भाजपा ने इस तरह प्रचारित किया मानो मोदी महात्मा हो गए हों। स्वयं मोदी ने इसे गुजराती जनता का सम्मान बताया।

                बहरहाल यह सारी कवायद मोदी की स्वयं की और भाजपा में बनते जा रहे मोदी गुट की है। मोदी की महत्वाकांक्षा अब प्रधानमंत्री बनने की है,इसलिए उन्होंने वे हथकंडे अपनाने शुरू किए हैं जिनसे उन्हें प्रचार अधिक मिले। इसके लिए वे अपने ही सबसे बडे नेता को आंखें दिखाने से बाज नहीं आए। स्वयं की मार्केटिंग के लिए उन्होंने उपवास की रणनीति अपनाई। पहले तीन दिन के और वर्तमान में चल रहे साप्ताहिक उपवास प्रचार पाने के क्रम का सिलसिला हैं। उनमें सद्भावना कितनी है इसका उदाहरण उन्होंने मुस्लिम समुदाय के सम्मान का प्रतीक टोपी और काफा ठुकराकर कर दिया। लेकिन प्रचार की इस दौड में वे भूल गए कि पाखंड का पर्वत चाहे जितना विशाल हो सच्चाई की एक ठोकर से टूट कर बिखर जाता है। और यही हुआ जब मानव सूचकांक की रिपोर्ट सामने आई। अब न तो स्वयं मोदी से जवाब देते बन रहा है और न ही पार्टी में उनकी गैंग को। वैसे मोदी हमेशा से प्रचार के भूखे रहे हैं। वे हमेशा कुछ न कुछ ऐसा करते या कहते रहते हैं कि उन्हें अखबारों और टीवी चैनलों में जगह मिलती रहे। केंद्र सरकार को कोसना तो विपक्षी दलों की राज्य सरकारों का जन्म सिध्द अधिकार है, मोदी कभी इससे कई कदम आगे जाकर भी बयानबाजी कर जाते हैं। चुनाव करीब हों तो यह जुबान और भी तीखी हो जाती है। इस जुबान पर बजने वाली चंद तालियों से मोदी समझते हैं कि उन्होंने जैसे कोई ब्रह्मवाक्य बोल दिया हो। राहुल गांधी और सोनिया गांधी को लेकर उनके कई बयान चर्चा में रहे हैं। लेकिन जिसका हृदय साफ नहीं होती, वक्त भी उसका साथ नहीं देता। मोदी गुजरात के विकास के लिए जितने चर्चा में नहीं रहे उतने विनाशक कार्यों को लेकर चर्चा में रहे। कुछ अतिवादी किस्म के लोग भले ही मोदी को सिर पर बैठा रहे हों लेकिन वास्तव में राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता नगण्य है। गुजरात दंगा, फर्जी मुठभेड, हरेन पंड्या हत्याकांड उनके इर्द-गिर्द घूमते ही रहते हैं। मोदी ने सारे प्रयास किए कि उनके दामन पर लगे यह गहरे दाग धुल जाएं लेकिन वक्त अपना हिसाब कर ही लेता है। एसआईटी के अफसरों को अपने प्रभाव में लेकर मोदी ने यहां तक कोशिश करवा ली कि मोदी के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं,लेकिन ऐन मौके पर संजीव भट्ट ने मोदी की असलियत सुप्रीम कोर्ट के सामने रख दी। मोदी ने इस अफसर को सलाखों के पीछे धकेलने के लिए एक अदने से कांस्टेबल का सहारा लिया,भट्ट के ऊपर केस दर्ज करवाया गया कि उन्होंने कांस्टेबल से जबरन हलफनामे पर दस्तखत करवाए थे। भट्ट को गिरफ्तार किया गया और प्रयास किए गए कि अब ये कभी जेल से बाहर न आएं, लेकिन न्याय के मंदिर में मोदी की मनमानी नहीं चली, भट्ट जमानत पर रिहा कर दिए गए। अब उन्हें एक नए मामले में फंसाया जा रहा है,आरोप है कि सायरन खरीदी में भट्ट ने 20लाख रुपए का घोटाला किया है। लेकिन वक्त उनका इंसाफ करेगा। सुप्रीम कोर्ट की एमिकस क्यूरी ने निचली अदालत से गुजरात दंगों में मोदी पर केस चलाने की सिफारिश की है। यह वक्त का इंसाफ है,जो प्रचार से महिमामंडित हुए लोगों से प्रभावित नहीं होता। यह सच की ठोकर है जो पाखंड से बने पर्वत को कानूनी प्रक्रिया में उलझकर देर से ही सही पर धूल धूसरित कर देगी।

? विवेकानंद