संस्करण: 31  अक्टूबर- 2011

'धर्मोध्दारक आतंकी'

मालेगांव बाम्बर्स से मलिक कादरियों का महिमामण्डन कब तक ?

? सुभाष गाताड़े

               आप ऐसे समाज को क्या कह सकते हैं जहां मासूमों के हत्यारे या निरपराधों को बम से उड़ानेवाले लोगों का महिमामण्डन किया जाने लगता है! निश्चित ही ऐसा समाज किसी भी मायने में स्वस्थ या सभ्य समाज नहीं कहा जा सकता है। दक्षिण एशिया के दो पड़ोसी मुल्कों में - जो महज 64 साल पहले एकही थे - एक दूसरे के नफरत पर टिके विचारों की जो हवा बहायी जा रही है, वहां हम अक्सर इसी हकीकत से रूबरू होते हैं। और ऐसा प्रतीत होता रहता है कि गोया इन दो पड़ोसी मुल्कों में इस बात को लेकर होड़सी मची हो।

                अभी ज्यादा दिन नहीं बीता जब पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में आतंकी मलिक कादरी को विशेष अदालत द्वारा सुनायी गयी सज़ा के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे। इन उग्र प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि 'इस्लाम के इस योध्दा' को रिहा किया जाए। आखिर क्या 'महान' काम किया था इस 'योध्दा' ने ? मालूम हो कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के दमन का हथियार बने ईशनिन्दा कानून का विरोध करने के लिए एवं उसे हटाने की मांग करने के लिए गवर्नर सलमान तासीर की सरेआम हत्या इसी ने की थी, जो उनकी सुरक्षा गारद का हिस्सा था। और यह कोई पहली दफा नहीं था कि इस्लामिक कट्टरपंथी समूह से जुड़े आतंकी मलिक कादरी का महिमामण्डन किया जा रहा था। सलमान तासीर की हत्या के बाद जब उसे इस्लामाबाद की अदालत में पेश किया गया था, तब इन्हीं कट्टरपंथी संगठनों की तरफ से उस पर गुलाब की पंखुड़िया बरसायी गयी थी और उसे इस्लाम का रक्षक (गाज़ी)घोषित किया गया था। उसका वकालतनामा लेने के लिए हजारों वकील आगे आए थे।

               शायद यह उन्हीं दिनों की बात है जब सूबा कर्नाटक के उल्लाल नगर में दशहरा के आसपास मालेगांव बम धामाके की आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की तारीफ में कसीदे पढ़ता हुआ दस फीट उंचा पोस्टर चस्पां हुआ था जो समूचे शहर में बेचैनी का सबब बना रहा था। 'ओम शक्ति फ्रेण्डस्' नामक युवाओं की संस्था की तरफ से उल्लाल बस स्टेण्ड के पास स्थित पुराने उल्लाल पुलिस स्टेशन के पास लगे उपरोक्त पोस्टर पर प्रज्ञा ठाकुर की तस्वीर के साथ भगवद्गीता का श्लोक भी लिखा था ''यदा यदा ही धर्मस्य/ग्लानिर भवति भारत/परित्राणाय् साधुनाम/विनाशायच दुष्कृताम्/अभ्युत्थानम् अधर्मस्य/ तदातमनम सृजमि अहम'' (जबभी धर्म की हानि होती है तो दुश्कर्मियों के नाश के लिए एवं धर्म की रक्षा के लिए मैं जनम लेता हूं।) पास में 'साध्वी प्रज्ञा सिंह द्वार' भी खड़ा किया गया था। स्पष्ट था कि पोस्टर लगाने वाले मानते थे कि मालेगांव शहर की मुस्लिमबहुल बस्ती में विस्फोटकों से भरी मोटरसाइकिल खड़ी करने की साजिश रचनेवाली प्रज्ञा सिंह 'धर्म की रक्षक' है। इतनाही नहीं अपने पूर्वसहयोगी सुनिल जोशी की हत्या को साजिशाना अंजाम देने वाली इस महिला का यह कृत्य भी 'धर्म की रक्षा' का दूसरा नाम है।

               इस बात को जानते हुए कि निरपराधों की साजिशाना हत्या करने के गम्भीर आरोप में प्रज्ञा एवं उसके हिन्दुत्व आतंकी गिरोह के लोग जेल में बन्द हैं,जिन पर मुकदमा चल रहा है और उसका महिमामण्डन शहर में बेचैनी का सबब बन सकता है, इसके बावजूद पुलिस ने तीन दिन तक कोई कार्रवाई नहीं की। अन्तत: जब नागरिक अधिकार संगठनों तथा साम्प्रदायिकता के विरोध में सक्रिय 'कौमु सौहार्दु वेदिके' नामक संगठन ने विरोध किया तब उसे हटाया गया, मगर साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश करने के लिए लगानेवालों पर मुकदमा कायम करने की जरूरत नहीं महसूस की।

               पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ी रही साध्वी प्रज्ञा का जीवनवृत्ता बताता है कि वह कई भाजपा नेताओं के सम्पर्क में रही है,करीब रही है। याद रहे उसकी गिरतारी के बाद उसके कुछ फोटोग्राफ्स मीडिया में भी उछले थे, जिसमें उसके इन सम्बन्धों, सम्पर्कों का खुलासा था। एक फोटोग्राफ तो कई स्थानों पर छपा था, जिसमें वह तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के साथ मौजूद थी। बताया गया था कि मधयप्रदेश के एक काबिना मंत्री की दुर्घटना पर हुई मौत के बाद ये सभी लोग उसके परिवारजनों से मिलने आए थे। बाद में राजनाथ सिंह ने कुछ सफाई देकर प्रज्ञा से दूरी दिखाने की कोशिश की थी।

                अगर हम भारत में हिन्दुत्व आतंक के उद्भव या एक तरह से पुर्नउद्भव पर गौर करें तो यही पाते हैं कि आतंक के इस रूप का महिमामण्डन कत्ताई अनोखा नहीं जान पड़ता। अगर आज भी आप हिन्दुत्ववादी जमातों के साहित्य को पलटेंगे या उनकी वेबसाइटों को देखेंगे तो कहीं से भी महात्मा गांधी के हत्यारे नथुराम गोडसे एवं उसके सहयोगियों के प्रति आलोचना की बात नज़र नहीं आती है। दबी जुबान से आज भी आजाद हिन्दोस्तां के इन प्रथम आतंकवादी के तौर पर सम्बोधित किए जाने वाले इन लोगों के कदम को 'समझ लेने'आदि की बात चलती है। यह अकारण नहीं कि नथुराम गोडसे को जिस दिन फांसी पर चढ़ाया गया,उस दिन को महाराष्ट्र में आज भी कई स्थानों पर हिन्दुत्ववादी संगठन 'शहादत दिवस' के तौर पर मनाते हैं।

               हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष 2008 में जब महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते के जांबाज प्रमुख हेमन्त करकरे की अगुआई में इस हिन्दुत्ववादी आतंकी नेटवर्क का जब खुलासा हुआ था और जांच की आंच इस ब्रिगेड के तमाम बड़े नेताओं तक पहुंची थी, तब किस तरह संघ परिवारी संगठनों, तथा शिवसेना की तरफ से करकरे को निशाना बनाते हुए मुहिम चलायी गयी थी,जिसमें करकरे को हिन्दु विरोधी घोषित किया गया था। इन दिनों रथयात्रा पर निकले जनाब आडवाणी ने भी संसद के पटल पर 'प्रज्ञा के साथ हो रही ज्यादती की आलोचना की थी और जांच की मांग की थी।'

               यह अकारण नहीं था कि जब प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित, दयानन्द पाण्डेय एवं उनके आतंकी मोडयूल के सदस्यों को अदालत में पेश किया जाता था तब इन्हीं हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटा कर उन पर गुलाब की पंखुडियां बरसायी जाती थी। अगर आप वर्ष 2008नवम्बर-दिसम्बर या 2009 के शुरूआती महिनों के अख़बारों को पलटेंगे तो उन फोटोग्राफस से भी रूबरू हो सकते हैं, जिसमें इन आतंकियों पर पंखुडियां बरसायी जा रही थी। एक तरह से देखें तो आतंकियों को इस कदर सम्मानित करने के मामले में भारत के लोग पाकिस्तान की तुलना में अगुआ निकले।

                 इस साल की शुरूआत में (10 जनवरी 2011) संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत ने दावा किया था कि '' अधिकतर ऐसे लोग जिन्हें सरकार ने बम विस्फोटों के विभिन्न मामलों में अभियुक्त बनाया है, उनमें से कुछ ने स्वेच्छा से संघ छोड़ा था और कुछ को संघ ने उनके अतिवाद के लिए यह कहते हुए निकाल दिया था कि उसके लिए यहां जगह नहीं है।'' निश्चित ही कानून के तहत जनाब भागवत की क्या यह जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वह उन सभी का नाम बताएं ताकि हम यह चिन्हित कर सकें कि पुलिस के किन मामलों में संघ के ''पूर्व'' कार्यकर्ता सक्रिय रहे।

               पिछले दिनों पाकिस्तान के एक युवा बैण्ड 'बेगैरत ब्रिगेड' द्वारा बनाए गए एक अलबम की काफी चर्चा रही। प्रस्तुत अलबम पाकिस्तान के सियासी समाजी हालात पर करारा व्यंग कसता है। इसी में वह यहभी सवाल उठाता है कि आखिर पाकिस्तान में अब्दुल सलाम जैसे नोबेल पुरस्कार विजेताओं का सम्मान क्यों नहीं होता है जबकि आज उसके नायक मलिक कादरी एवं कसाब बने हुए हैं ? ख़बरों के मुताबिक यूटयूब पर 70 हजार से अधिाक लोगों ने इस गीत को देखा और उन्हें मुख्यधारा के कई लोगों ने अच्छे आफर भी दिए हैं।

               क्या धरती के इस हिस्से का कोई संगीतकार प्रज्ञा सिंह एवं हिन्दुत्व आतंकवाद के उसके जैसे मानवद्रोहियों को लेकर ऐसे ही किसी गीत/अलबम की रचना करेगा या हमें आने वाले दिनों में 'धर्म रक्षक'के तौर पर उनके महिमामण्डन के नए नए संस्करणों से रूबरू होना पड़ेगा ?


? सुभाष गाताड़े