संस्करण: 31 मार्च-2014

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नरेंद्र मोदी को आरएसएस और भाजपा ही

प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे

     पिछले कई महीनों से इलेक्ट्रानिक मीडिया पर नरेंद्र मोदी छाये हुये हैं। यदि मीडिया देश के मतदाता का सक्षम प्राधिकारी भाग्य विधाता होता तो अरबों रुपये के चुनावी झमेले में पड़ने की आवश्यकता ही नहीं थी,मोदी सीधो प्रधानमंत्री बन जाते और मीडिया हाउस उनके ओएसडी। सौभाग्यकवश ऐसा नहीं है,आम जनता मीडिया द्वारा नियंत्रित नहीं है। यदि 10वर्ष पहले 2004का इतिहास देखा जाय तो भाजपा ने आडवाणी जी को केवल पीएम-इन-वेटिंग घोषित किया था, मीडिया ने उन्हें सीधे पीएम ही बना दिया था।       

? मोकर्रम खान


पितामह ! यह कर्म का फल है

        तिहास गवाह है, अपराध को खुली आंखों से देखते हुए भी अपराधी का साथ देने का परिणाम अपमान के साथ सर सैया के रूप में मिलता है। लेकिन दुर्भाग्य कि यह प्रेरक प्रसंग केवल दूसरों को नसीहत देने के काम आते हैं। आदमी खुद इन पर अमल नहीं करता। बीजेपी में लालकृष्ण आडवाणी की हालत ठीक उसी तरह है जैसे महाभारत के पितामह भीष्म की थी। भीष्म ने शकुनी के कपटी पांसों से खेला जा रहा जुआं और उसके बाद द्रोपदी के वस्त्रहरण का प्रयास चुपचाप देखा था। वे चाहते तो दुर्याधन, दु:शासन को इस कृत्य से रोक सकते थे, इसमें न तो उनकी प्रतिज्ञा आड़े आ रही थी और न ही उनकी बात को काटने का किसी में साहस था, लेकिन पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कुलगुरू कृपाचार्य जैसे दिग्गज हाथ बांधे इस कुकृत्य को देखते रहे।

?

विवेकानंद


भाजपा में बगावत की वजह है संघ का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप

     लोक सभा चुनावों की अधिसूचना जारी होने के बाद ही से लोकतंत्र के इस महाकुंभ की हलचल बढ़ गई है। कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियां जी जान से जनता को रिझाने के लिए अपने अभियान में जुट गई हैं, तो वही क्षेत्रीय दलों के कई नेता खंडित जानादेश की स्थिति में अपने भाग खुलने की आशा में खेत खलिहानों की धूल फांक रहे हैं। नए समीकरणों की तलाश और उसे अंतिम रूप देने की प्रक्रिया भी अपने आखिरी पड़ाव पर है। कुछ बहुत छोटे दलों, जिनका आधार आम तौर पर जातीय ही होता है, अपने तत्कालिक हितों को साधने में व्यस्त हैं। 

 ? मसीहुद्दीन संजरी


मुजफ्फरनगर दंगे : इंसाफ की आस

      श्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में पिछले साल हुई सांप्रदायिक हिंसा ने हमारे लोकतंत्र को शर्मसार कर दिया था। इसने राज्य मशीनरी की उपेक्षा से उपजी सांप्रदायिक हिंसा का वीभत्स रूप पेश किया । नफरत भरे सांप्रदायिक प्रचार को त्वरित रूप से रोकने के बजाय राज्य मशीनरी ने निष्क्रिय रहकर फलने-फूलने का भरपूर अवसर दिया जिसके परिणाम स्वरुप पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धार्मिक उन्माद से लबरेज सांप्रदायिक हिंसा का क्रूरतम रूप दृष्टिगोचर हुआ जबकि यह क्षेत्र बाबरी विध्वंस और बीजेपी की रथयात्रा के दौरान भी बिलकुल शांत रहा था।

? मोहम्मद आरिफ


सपा-भाजपा को

खेल बिगड़ने का अंदेशा

              भाजपा द्वारा नरेन्द्र मोदी को वाराणसी से उम्मीदवार घोषित किए जाने पर समाजवादी पार्टी ने निश्चित तौर पर बड़ी राहत महसूस की होगी। उसे लगा होगा कि मुजफर नगर के दंगों तथा अन्यान्य कारणों से सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी से नाराज चल रहे मुसलमानों को मोदी के वाराणसी से जीत जाने तथा प्रधानमंत्री बन जाने का भय, सपा के साथ गोलबंद कर देगा। चुनाव नजदीक आ जाने से अब यह बात साफ होती जा रही है कि देश के मुसलमान किसी भी कीमत पर मोदी को प्रधानमंत्री बनता हुआ देखना नहीं चाहते।

 ?   सुनील अमर


अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे है अजीत सिंह

           देश के राजनैतिक परिदृश्य में कुछ चेहरे और उनके कृत्य हमेशा से ही आवाम के लिए बेहद दिलचस्प रहे हैं। राष्ट्रीय लोक दल के मुखिया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट अस्मिता के वाहक चौधरी अजीत सिंह इस देश के राजनैतिक परिदृश्य में एक ऐसी ही शख्सियत रहे हैं जिन्होंनें, विचारधारा से हटकर किसी भी दल के साथ गठबंधन करने और, उस गठबंधन को अपने हित के लिए कभी भी खत्म करने में कतई गुरेज नहीं किया। अगर पिछले लोकसभा चुनाव की ही बात की जाए तो, उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन भाजपा गठबंधन के चुनाव हार जाने के बाद वे कांग्रेस का दामन थाम कर केन्द्र में मंत्री बन गए।

? हरेराम मिश्र


अनैतिकिता और अवसरवाद की अति तंत्र में अनास्था उपजाती है

      भाजपा केम्प से प्रतिदिन जो खबरें आ रही हैं वे भीड़ के नाम पर अवसरवादी भिखमंगे एकत्रित करने की खबरें हैं। उल्लेखनीय है कि एक प्रदेश की राजधानी में नगर के बीचों बीच एक पार्क है और उसके किनारे रैन बसेरा है। इस पार्क के आसपास सैकड़ों की संख्या में भिखारी रहते हैं जो अपने काम पर निकलने के अलावा अपना पूरा समय इसी पार्क में बिताते हैं और बहुत अधिक प्रतिकूल मौसम में रैन बसेरे का सहारा ले लेते हैं। यह पार्क राजनीतिक दलों और स्वयंसेवी गैर सरकारी संगठनों की रैलियों धरनों अनशन आदि के काम में भी आता है। उक्त भिखारियों का एक ठेकेदार है जो तय दर पर राजनीतिक दलों या गैर सरकारी संगठनों के लिए भीड़ सप्लाई करने का काम करता है।

?  वीरेन्द्र जैन


प्रतिक्रियावादी साम्प्रदायिक ताकतों को शिकस्त देना प्रत्येक देशभक्त का पुनीत कर्तव्य है

     नारस में आयोजित ऑल इंडिया सेक्युलर फोरम के दो दिवसीय सम्मेलन के बाद जारी अपील में देश की सभी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक शक्तियों से अपील की गई है कि वे एकजुट होकर उन काली ताकतों को शिकस्त दें जो आधुनिक भारत का चरित्र बदलने पर आमादा हैं। बनारस में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के अनेक राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। दिनांक 23-24 मार्च को संपन्न अधिवेशन में इस बात पर चिंता प्रगट की गई कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा योजनाबध्द तरीके से झूठ का प्रचार कर रहा है और सच को दबा रहा है।  

? एल.एस.हरदेनिया


वाराणसी की विशिष्ट परम्परा

        हाँ बुध्दिजीवियों के कार्य ने ज्ञान के नाम पर व्यक्तियों की पहचान को अधिक प्रोत्साहित किया है।

                वाराणसी की पहचान प्रतीकात्मकता के साथ निर्धारित है। यहां की प्रत्येक कहानी पाप और उससे मुक्ति के अपने विशिष्ट मिश्रण के साथ सामने आती है। मुझे विगत दिनों विस्मरित वाराणसी परियोजना को समझने का अवसर मिला था,हो सकता है शायद उसमें थोड़े से विद्वानों का कोई हित निहित हो। यह अन्य स्थानों में से एक वाराणसी की परियोजना थी जो .....   

? प्रताप भानु मेहता (लेखक सेन्टर फॉर पॉलिसी रिसर्च, दिल्ली के अध्यक्ष है और इंडियन एक्सप्रेस के सहायक संपादक है।)


शक्ति मिल बलात्कार काण्ड में आया फैसला

असमाजिक युवा तैयार करता समाज

     मुंबई के शक्ति मिल की बन्द पड़े परिसर में हुए दो बलात्कार काण्ड में आरोपियों को सज़ा सुनाई जा चुकी है। एक मामला महिला टेलीफोन आपरेटर तथा दूसरा महिला फोटो पत्रकार का है। इनमें तीन दोनों मामलों में आरोपी हैं तथा दो आरोपी नाबालिग हैं। बालिग आरोपियों को मरते दम तक की उम्र कैद की सज़ा सुनाई गई है। फास्ट ट्रैक कोर्ट में 8 महीने के भीतर मामले को निपटाया गया और सज़ा सुनायी गयी। जैसा कि सभी जानते हैं कि निर्भया काण्ड के बाद यह भी एक मामला था जिसे लेकर तमाम जगहों पर जबरदस्त प्रदर्शन हुए थे और पुलिस को भी फुर्ती दिखानी पड़ी थी।

? अंजलि सिन्हा


मानव तस्करी एवं मानवीय मूल्य

        खिरकार, कल शाहिना शेल्टर होम से वापस अपने घर बांग्लादेश 3 साल बाद पहुंच ही गई। इतने सालों बाद अपने घर जाने की चमक जहां उसके चेहरे पर थी, वहीं एक घबराहट भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। शाहिना को म.प्र पुलिस ने बिना पासपोर्ट के भारत सीमा में प्रवेश करने के जुर्म में पकड़ा था, तब उसे हिंदी भाषा भी नहीं आती थी। वह भारत कैसे पहुंची ? इसकी भी विचित्र कहानी है, उसके अनुसार वह नवविवाहित थी और पति के साथ घूमने निकली थी। पर उसे यह नहीं पता था कि घूमते घूमते वह भारत की सीमा में प्रवेश कर गई है।

? राखी रघुवंशी


गुमनाम ही रही जिन्दगी

      1952 में आई जग्गू फिल्म से बतौर बाल कलाकार अपने सिने सफर की शुरुआत करने वाली नंदा का मंगलवार दोपहर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 75 साल की थीं। नंदा का नाम 70 के दशक की बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में शुमार किया जाता है। अपने चाचा वी. शांताराम की 1956 में प्रदर्शित हुई फिल्म तूफान और दीया के जरिए उन्होंने मुख्य धारा की फिल्मों में पदार्पण किया करीब 67 फिल्मों में विविधातापूर्ण अभिनय कला के प्रदर्शन के बाद 1995 में आई दीया और तूफान उनकी अंतिम फिल्म थी जिसमें उनके चाहने वाले ने उन्हें देखा।       

? सिध्दार्थ शंकर गौतम


क्रांतिकारी हैं- आवास और,

सबको पेंशन का वादा!

        राम राज्य की परिकल्पना में यही तो है कि भूखे को रोटी,प्यासे को मिल पानी और बेघर को मिल जाए एक घर!और आज के आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा भी इन्हीं बिदुओं पर आधारित है। राजनीतिशास्त्र के अनुसार एक लोकल्याणकारी राज्य कहता है कि एक लोकल्याणकारी राज्य में कोई भूखा नहीं सोता है, कोई बेघर नहीं है, सबको काम मिल रहा है और और बीमार को दवा मिल रही है, बुजुर्गों को भी सम्मान मिल रहा है।

? डॉ. सुनील शर्मा


7 अप्रैल : विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

भारत में गहराता स्वास्थ्य संकट

      भारतीय स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि जीवन शैली में आए बदलाव के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही है जिसका भारी मूल्य देश को चुकाना पड़ सकता है। हृदयरोग, मधुमेह, लकवा, कैंसर और श्वास संबंधी असंक्रामक किन्तु सर्वाधिक घातक रोग आधुनिक जीवन शैली की ही देन हैं। हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा किए गए अध्ययन के निष्कर्षानुसार, ऐसे रोगों के कारण भारत पर वर्ष 2012 से 2030 की अवधि में 6.2 खरब डॉलर का बोझ बढ़ेगा।       

? डॉ. गीता गुप्त


  31 मार्च-2014

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