संस्करण: 30 सितम्बर-2013

भाजपा तथा सपा के बीच कल्चरल एक्सचेंज

? मोकर्रम खान

         स समय कुछ ऐसा वातावरण बन रहा है मानों भाजपा तथा सपा के बीच कल्चरल एक्सचेंज हो रहा है। गुजरात दंगों के बाद हिंदू हृदय सम्राट की पदवी से विभूषित भाई नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी घोषित हुये हैं, वे अपनी खूंखार छवि को बदलने के लिये निरंतर प्रयासरत हैं। दंगों के दाग मिटाने के लिये बार बार फेशियल करा रहे हैं किंतु कभी सीबीआई, कभी अदालत, कभी वंजारा उनका सदभावना का फेस पैक हटा देते हैं। फिर भी मोदी हार नहीं मान रहे हैं, अपनी इमेज सुधारने तथा स्वीकार्यता बढ़ाने में लगे हुये हैं। आरएसएस-भाजपा भी जानते हैं कि भारत की जनता खूंखार चेहरे को सहन नहीं कर सकती इसलिये मोदी के चेहरे मोहरे को साफ्ट बनाया जा रहा है। देश से मुसलमानों के उन्मूलन का बरसों से स्वप्न देख रहे हिंदू कट्टरपंथियों की एक मात्र आशा रहे नरेंद्र मोदी इस समय मुसलमानों में अपनी पैठ बनाने में लगे हुये हैं।  पहले गुजरात में सद्भावना कार्यक्रम चलाया फिर उपवास रखा।  अपने सद्भावना कार्यक्रमों में दाढ़ी टोपी वाले मुसलमानों को खूब तरजीह दी, इससे बहुत से हिंदू कट्टरपंथी उनसे नाराज भी हुये परंतु मोदी ने परवाह नहीं की, अपने मिशन में लगे रहे।  अभी कुछ दिनों पूर्व समाचार आया कि मोदी ने ईद से पहले पवित्र रमजान के अंतिम सप्तान में गांधाी नगर में मुस्लिम धार्मगुरुओं के साथ एक गुप्त बैठक की। इस बैठक में मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्यों ने भी भाग लिया।  इस बैठक में मोदी ने सभी को आश्वस्त किया कि 2014 के लोक सभा चुनावों में अयोधया  भाजपा के एजेंडे में नहीं होगा अर्थात देश में पुन: सांप्रदायिक तनाव निर्मित नहीं किया जायगा। मोदी के इस तथाकथित मुस्लिम प्रेम का अतिरेक देखिये आतंकवाद के प्रायोजक पाकिस्तान को भी ललकारने के बजाय उसे  विकास का मंत्र दे रहे हैं। स्मरणीय है कि 2002 के गुजरात दंगों के तत्काल बाद हुये गुजरात विधान सभा चुनावों के दौरान मोदी अपने चुनावी भाषणों में यही बात दोहराते रहे कि यदि वह चुनाव हार गये तो सबसे ज्यादा खुशी मियां मुशर्रफ (तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति) को होगी मानों उनका मुकाबला भारतीय राजनीतिक पार्टियों से नहीं बल्कि पाकिस्तानी राष्ट्र पति से हो रहा था। भाजपा के दिग्गज नेता तथा मुख्यमंत्री मोदी की मुसलमानों के बीच स्वीकार्यता बढ़ाने के विशेष प्रयास कर रहे हैं इसके लिये मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मोदी की जनसभायें आयोजित की जा रही हैं।

               जब मुलायम सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो समाचार पत्रों में उनके गांव तथा पुरानी शैली का  मकान जिसमें ऊपर जाने के लिये एक संकरा जीना था, की तस्वीरे छपती थी। अब मुलायम पर आय से अधिक संपत्ति के आरोप लग रहे हैं। खबर है कि सीबीआई ने इस मामले की जांच बंद कर दी है यानि जांच का जिन्न बोतल में बंद कर दिया गया है किंतु इस बोतल का ढक्कन कब खुल जायगा या खोल दिया जायगा और जिन्न सर पर सवार हो जायगा, कहना मुश्किल है।  खैर इस समय मुलायम की संपत्तिा मुद्दा नहीं है, मुद्दा है उनकी भूतपूर्व सादगी और वर्तमान अभूतपूर्व राजनीतिक तिकड़मबाजी।  मुलायम ने जब राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी तब वह सीधो सादे, स्पष्ट वादी तथा कठोर धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में जाने जाते थे।  उन्होंने अपने मुख्यमंत्री रहते हुये बाबरी मस्जिद नहीं गिरने दी। बाबरी विध्वंस रोकने के लिये उन्होंने गोली चालन जैसा कठोर कदम भी उठा लिया।  बाबरी मस्जिद टूटने से बच गई।  केंद्र की वीपी सिंह सरकार भले ही गिर गई किंतु मुलायम की राजनीति चल निकली। न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश भर के मुसलमानों ने उन्हें  मसीहा मान लिया, उनकी पार्टी का विस्तार अन्य राज्यों में भी हो गया। हिंदू कट्टरपंथियों ने उन्हें  मुल्ला मुलायम कहना शुरू कर दिया।  मुलायम ने मुल्ला मुलायम की पदवी सहर्ष तथा सगर्व धारण की और मुसलमानों के विकास के लिये बगैर कोई ठोस कार्य किये, मुस्लिम वोटों के स्वामी बन बैठे।  कुछ समय बाद लोगों को समझ में आ गया कि मुलायम का मुस्लिम-प्रेम वास्तीव में केवल सत्ताा प्रेम है।  यहीं से मुसलमानों पर से मुलायम की पकड़ ढीली होने लगी  और सत्ताा भी सरकने लगी।  कुर्सी के लिये कुछ भी करेगा की तर्ज पर मुल्ला मुलायम ने टोपी उतार फेंकी और हिंदू कट्टरपंथियों से दोस्ती  बढ़ानी शुरू कर दी।  हद तो तब हो गई जब मुलायम ने बाबरी विध्वंस के महानायक कल्याण सिंह जिन्हों ने खुले आम 1 के बदले 4 मारो का नारा दिया था, से दोस्ती कर ली।  जब राजनीतिक नुकसान हुआ तो कल्याण से दोस्ती  तोड़ दी और मुसलमानों से माफी मांग ली।  हालांकि मुसलमान इस माफी के नाटक से झांसे में आने वाले नहीं थे किंतु मायावती के दंभपूर्ण आचरण, कांग्रेस का मुसलमानों को आरक्षण का चुग्गा और भाजपा द्वारा इस आरक्षण के प्रबल विरोध के कारण मुसलमानों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति बन गई।  मायावती पहले ही यह प्रदर्शित कर चुकी थीं कि उन्हें मुस्लिम वोटों की परवाह नहीं है।  बाबरी विध्वंस के समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी इसलिये मुसलमानों का कांग्रेस से विश्वास उठ चुका था। भाजपा के मुस्लिम आरक्षण विरोधा ने मुसलमान वोटों का धृवीकरण कर दिया और मुसलमानों ने विकल्प  के अभाव में सपा को थोक के भाव में वोट दे दिये।  मुलायम दोनों हाथों में लड़्ड़ू लेने लगे। प्रशासनिक अनुभव विहीन पुत्र को मुख्यमंत्री बनवा दिया तथा स्वयं प्रधान मंत्री बनने का स्वप्न देखने लगे।  पुत्र के मुख्यमंत्रित्व  में एक साल में ही दंगों की सेंचुरी बन गई। जिस प्रकार तथा जिस गति से दंगे हो रहे हैं उससे दूसरा शतक बनने में भी अधिक समय नहीं लगेगा।  हाल में संपन्न मुजफ्फरनगर दंगों के बारे में कहा जा रहा है कि इन दंगों की भयावहता ने 2002 के गुजरात दंगों को भी पीछे छोड़ दिया है। उत्तर प्रदेश के कई मुस्लिम संगठनों ने मुलायम को यूपी का मोदी घोषित कर दिया है।  लोग पूछ रहे हैं कि बाबरी मस्जिद बचाने के लिये गोली तक चलवा देने वाले मुलायम के रहते इतने भीषण दंगे और इतने लंबे समय तक कैसे चलते रहे।  मुलायम के पास इन प्रश्नों  के उत्तर नहीं हैं।  गुजरात दंगों के बाद मोदी तो हिंदू हृदय सम्राट की पदवी प्राप्त कर प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी  घोषित हो गये किंतु पिछले लगभग 25 वर्षों से प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न  देख रहे मुलायम हीरो से जीरो बनने जा रहे हैं क्यों कि उनका राजनीतिक आधार ही मुस्लिम वोट बैंक है।

? मोकर्रम खान