संस्करण: 30 जून-2014

जल से मरते जीव

? डॉ. सुनील शर्मा

        र्मियों के समय नदी और तालाबों में अक्सर अचानक मछलियों के मरने की खबरें मिलती है। ये मछलियॉ लाखों की संख्या में एक साथ अचानक मर जाती हैं, कारण होता है- जल में घुलित आक्सीजन की मात्रा में कमी और जिसकी वजह से जीवनदायी जल मृत्युदाता बन जाता है। जल में घुलित आक्सीजन की मात्रा में कमी से न केवल मछलियॉ मर रही हैं बल्कि कई अन्य जलीय जीवों के अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया है।  चूॅकि गर्मियों जल की मात्रा घट जाती है जिससे इसमें लवणों की मात्रा बढ़ जाती है इस कारण जल में घुलित आक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। जल में आक्सीजन की कमी होने का एक मात्र कारण है बढ़ता जल प्रदूषण।

                वास्तव में जल में आक्सीजन की मॉग से ही प्रदूषण के स्तर का भी पता चलता है, वस्तुत: जल में आक्सीजन लेने वाले जीवाणुओं से विघटित होने वाले जैविक अपशिष्ट प्रदूषकों के रूप में उपस्थित रहते है। इन्हें विघटित करने वाले जीवाणु बढ़ी मात्रा में जल से आक्सीजन ग्रहण करते हैं फलत:पानी में आक्सीजन कम होने लगती है और जल की गुणवत्ता का हृास होता है और आक्सीजन की कमी से जलचर मरने लगते है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जैसे जैसे जल में प्रदूष्रण की मात्रा बढ़ती है वैसे वैसे जैविक आक्सीजन की खपत बढ़ने लगती है। जल मे आक्सीजन की कमी से अनाक्सी श्वसन के चलते द्वितीयक प्रदूषक जैसे मीथेन,अमोनिया तथा हाइड्रोजन सल्फाइड आदि बनने लगते है। जिससे जल दुर्गंधित होता है और जहरीला होकर  सजीव और मनुष्यों के लिए अहितकारी हो जाता है। जल को जहरीला बनाने वाले कारकों में प्रमुख है औद्योगिक अवशिष्ट। औद्योगिक इकाईयों से निकलने वाले अवशिष्ट में क्लोराइड, सल्फाइड, नाइट्राइट्स, अमोनिया और नाइट्रोजन जैसे रासायनिक प्रदूष्रक और पारा, सीसा, एस्बेसट्स तथा जिंक जैसे धात्विक पदार्थ पाए जाते है, जो शुद्व जल में मिल कर उसे दूषित कर देते है और इसके विनाशकारी प्रभाव के चलते जलीय जीवों की मौत होने लगती है। जब यह जल पीने के लिए प्रयुक्त होता है तो हैजा,पेचिस,टायफाइड व पीलिया जैसे रोगों का कारण बनता है। खेतों में पहुॅचकर पहुॅचकर खेतों को बंजर बना कर देता है।इसकी वजह से जलाशयों की तलहटी में हाइड्रोजन सल्फाइड एकत्र होती है जो कि सल्फयुरिक अम्ल में परिवर्तित होकर जीवों और वनस्पतियों को नष्ट करता है।

      शहरों के वाहित मल ने जल को घातक बनाता है वाहित मल में मानव और पशु दोनों का मलमुत्र होता हैं इसमें इच्श्रेरिचिया कोली और स्ट्रेप्टोकोक्सफीसलिज जैसे कोली फार्म जीवाणु प्रचुर मात्रा में होते है, जो बेहद घातक होते है। इसके चलते देश की राजधानी नईदिल्ली से होकर बहने वाली सीवेज केनाल यानि यमुना इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि इसका पानी पीना तो दूर अंजुली में लेने से ही खुजली पैदा कर देता है। घरेलू अवशिष्ट में फास्फोरस की अधिकता पाई जाती है जो कि अति जल प्रदूषक प्रकृति का तत्व है, साथ ही यह जलीय पौधों के लिए पोषक का काम भी करता है जिससे  जल में  हरित शैवालों की वृद्वि होती है फलस्वरूप अन्य जलीय जीव और पौधों  नष्ट हो जाते है। क्योंकि शैवालों के सड़ने से पानी में रोगकारक जीवों की वृद्वि होती है।

               जहरीले होते जल का कहर का हमारे देश पर सर्वाधिक पड़ने वाला है क्योंकि हमारी मानसिकता में नदियॉ एवं जलस्त्रोत प्राकृतिक गटर का स्वरूप  बन चुके हैं जिनमें आसानी से सारी गंदगी प्रवाहित की जा सकती है।संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी वाटर फार पीपुल ,वाटर फार लाइफ नामक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियॉ एशियॉ में है, इन नदियों में जीवाणुओं की सॅख्या सर्वाधिक है। रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों में लगभग 50 फीसदी जनसॅख्या प्रदूषित पानी का इस्तेमाल करती है। वर्ल्ड वाटर फोरम के सर्वेक्षण के अनुसार नागरिकों को अशुद्व और असुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने में भारत तीसरे स्थान पर है।

              सारी दुनिया में  गंगा को पवित्र नदी माना जाता है तथा देश की लगभग 20 करोड़ आबादी नदी  इसके जल पर आलंबित है मगर यह भी जहर से भर चुकी है, भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर मुम्बई के वैज्ञानिकों के के शोधा के मुताबिक गंगा स्नान से कैंसर हो सकता है। वर्ष 2013 में आयोजित कुंभ मेले के दौरान वैज्ञानिकों द्वारा एकत्र गंगाजल के सेंपल में क्रोमियम-6 नामक तत्व की मात्रा सामान्य से 50 गुनी अधिक पाई गई है। क्रोमियम-6से अनेक गंभीर हो सकती हैं जिनमें कैंसर भी शामिल है। गंगा के अमृत जल को जहर में बदलने का कार्य किया इसके किनारों बसे औद्योगिक शहरों से उत्सर्जित अवशिष्ठ ने,जो दशकों से बेरोकटोक गंगा नदी में प्रवाहित किया जा रहा है।

            गंगा जल के जहरीले होने से न केवल मनुष्यों को खतरा पैदा हुआ है बल्कि गंगा में पाए जाने वाले जलचरों पर भी घातक रसायनों का प्रभाव पड़ रहा है और गंगा में पाई जाने वाली मीठे पानी की डाल्फिन का अस्तित्व भी संकट में है। केवल गंगा ही नहीं यमुना जो कि पवित्र नदी है,अब सीवेज केनाल यानि वाहित मल की नहर बन चुकी है इसके पानी के लगातार उपयोग से कैंसर हो सकता है। नर्मदा म.प्र. की जीवन रेखा है मगर बड़े के आसपास इसके पानी से हैजा और गिल्टी रोग हो सकते है। बड़ी नदियों के साथ-साथ उनकी सहायक हजारों नदियॉ अब सिर्फ गटर की भुमिका में हैं जो शहरों का गंदा पानी अपने में समेट कर बड़ी नदियों में ले जा रही हैं।नदियों के दुषित होने से अब जल जीवन के लिए अमृत नहीं बल्कि जहर बनता जा रहा है।

? डॉ. सुनील शर्मा