संस्करण: 30 जून-2014

सामाजिक न्याय बनाम हिन्दुत्व की राजनीति

? अनिल यादव

         सोलहवीं लोकसभा का चुनाव भाजपा की जीत के साथ कई और संदेश लेकर आया है। खास करके सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए। कोई भी विचारधारा सिर्फ एक संगठन में बंधाकर नहीं रहती है, बल्कि वह अपने आसपास परत-दर-परत पैठ बना लेती है और दक्षिणपंथी विचारधारा ने इस चुनाव में यही किया। सामाजिक न्याय के नाम पर उभरी उत्तर प्रदेश और बिहार की पार्टियों को करारा झटका लगा है।

                 वस्तुत: इस चुनाव को आकड़ों से कम, बल्कि सामाजिक नजरिये से समझा जाना बेहद जरूरी है। आज जो राजनैतिक विश्लेषण यह गीत गाते फिर रहे हैं कि 'विकास' की राजनीति ने यूपी और बिहार को रौंद डाला, उन्हें यह अवश्य बताना चाहिए कि भाजपा और संघ ने किस मौके का लाभ उठाया और किस तरह की रणनीति का सहारा लिया। वस्तुत: जब सामाजिक न्याय की आकांक्षा किसी विशेष दल या समुदाय के लिए सत्ता को प्राप्त करने की सीढ़ी बन जाती है तो वह अपने लक्ष्य से भटक जाती है। बात यह है कि इस आन्दोलन के न्यायपक्ष को लगातार कमजोर किया गया और सत्ता को प्राप्त करने के पक्ष को महत्वपूर्ण बनाया गया। हांलाकि सामाजिक न्याय के नेताओं ने पहले ही ऐसी संभावनाओं की भविष्यवाणी की थी। बाबा भीमराव अम्बेडकर और डॉ राम मनोहर लोहिया दोनों ने कहा था कि सत्ता की लालच में दलित और पिछड़े भी अगड़ों की तरह व्यवहार करेंगे। आज तमाम लोग अम्बेडकर पर भले ही यह आरोप लगाते हों कि वह सिर्फ सत्ता में भागीदारी की बात करते थे लेकिन सच यह है कि अम्बेडकर राजनीतिक सुधार की अपेक्षा सामाजिक सुधार पर अधिक बल देते थे। जैसा कि उन्होंने 'एनाइहिलेशन ऑफ कास्ट' में लिखा है कि एक समय था जब हर कोई स्वीकार करता था कि सामाजिक निपुणता के बिना किसी क्षेत्र में स्थाई उन्नति सम्भव नहीं है। परन्तु उन्हीं के अनुयायियों ने इसे अनदेखा कर दिया। 'जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है' का नारा बुलंद करने वाली बसपा सत्ता प्राप्ति के लिए भाजपा के गोद में जाकर बैठ गयी। वहीं दूसरी तरफ खुद को लोहिया के वारिस बताने वाले मुलायम सिंह के लिए भी जाति और सत्ता ही सामाजवादी आदर्श लगने लगा। सामाजिक न्याय का लक्ष्य जाति भेद की समाप्ति तो न जाने कब इन लोगों ने अपने ऐजेंडे में से निकाल दिया।

               यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि डॉ राम मनोहर लोहिया और डॉ अम्बेडकर सामाजिक न्याय के मूल्य को मिलकर स्थापित करना चाहते थे और इसके लिए दोनों लोगों के बीच 1955 तक पत्र-व्यवहार चला। तब तक लोहिया ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से अलगाव कर लिया था और नया दल गठित कर रहे थे। प्रस्ताव था कि दानों की एक पार्टी बने। बाबा साहब के निधन से बात अधूरी रही। लेकिन आज डॉ लोहिया और अम्बेडकर के नाम पर राजनीति करने वाली सपा-बसपा मात्र राजनैतिक सत्ता प्राप्ति के लिए एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हुए हैं। सामाजिक न्याय की राजनीति दलित-पिछड़ा गठजोड़ न होकर बल्कि दलित-पिछड़ा संघर्ष बन गया है। इसका नमूना हम सपा और बसपा के शासनकाल से लगा सकते हैं कि सपा के शासन में किस तरह से दलित उत्पीड़न बढ़ जाता है और बसपा के शासनकाल में इन उत्पीड़नों के चलते यादव जाति के लोग जेल जाते हैं। सामाजिक न्याय के उद्देश्य से परे दोनों पार्टियाँ जाति को मजबूत करके 'हिन्दुत्व' की राजनीति के लिए जगह बनाने में व्यस्त रही है। इन सारी खामियों का लाभ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोगों ने इस चुनाव में खूब उठाया। कभी यादवों का इतिहास छुपाने के लिए महाभारत को 'झगडे क़ी जड़' बताकर पढ़ने से रोकने वाली मनुवादी राजनीति बड़ी आसानी से 'अहीर बनाम ढ़ढोर' के नाम पर पूर्वांचल में राजनीति के नयी दिशा देने में करीब सफल रही है।

               दूसरी तरफ जिस हिन्दूत्व की राजनीति ने दलितों को मंत्र पढ़ने पर जीभ काटने और वेदपाठ सुनने पर कान में सीसा डालने को तर्कसंगत बताती रही है, वह आज मोदी को 'अछूत' मानकर वोट दे दिया। तथ्य तो यह भी है कि मोदी के 'राष्ट्रवाद' के सबसे अच्छे संवाहक भी दलित और पिछड़े ही बने जबकि 1931 में, जब पहली बार अम्बेडकर गांधी से मिलने गये तो गांधी ने उनसे कांग्रेस की आलोचना का कारण पूंछा (जो शायद गांधी ने यह मानकर पूंछा था कि कांग्रेस की आलोचना मातृभूमि की लड़ाई की आलोचना है)तो अम्बेडकर ने जबाव दिया था कि मेरी कोई मातृभूमि नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि,''किसी भी अछूत को ऐसी मातृभूमि पर गर्व का एहसास कैसे हो सकता है। यह सवाल आज भी उतना ही जिंदा और ज्वलंत है एक तरफ 'राष्ट्रवाद' है तो दूसरी तरफ मिर्चपुर और भगाना। जहाँ एक तरफ दुनिया के किसी कोने में पीडित हिन्दुओं के लिए भारत एक सुरक्षित स्थान है, वहीं दिल्ली में जन्तरमंतर पर धरने पर बैठी दलित बलात्कार पीड़ितों को भगाया जा रहा है,विरोध करने पर सामंतवादी मानसिकता का प्रशासन बड़ी बेशर्मी से कहा है कि 'भाग जाओं नहीं तो लाठी घुसा दूंगा'। सरेआम जंतर-मंतर पर विरोध कर रही दलित महिलाओं के साथ बदतमीजी किया जाता है। इतना होने के बाद भी दलित-पिछड़े हिन्दुत्व की राजनीति के शिकार हो रहे हैं।

             चूँकि जाति विचार नहीं है बल्कि एक टूल है जिसका प्रयोग अन्तत: हिन्दूत्व की राजनीति ही करेगी। इस हिन्दुत्व के मकड़जाल से सामाजिक न्याय को छूटना ही होगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो वर्ण व्यवस्था के इस चक्रव्यूह में जाति राजनीति सत्ता को प्राप्त करने के लिए 'संस्कृतिकरण'की सीढ़ी चढ़ती रहेगी और हिन्दूत्व का अमरबेल यूँ ही फलता फूलता रहेगा।


? अनिल यादव