संस्करण: 30 जून-2014

पॉलिसी सिस्टम को

नियंत्रित कर रहा है काला धन

? हरे राम मिश्र

           'टैक्स हेवेन' के रूप में कुख्यात स्विस बैंकों में अमीर भारतीयों द्वारा अवैध रूप से जमा किए गए धन की असलियत का पता लगाने के लिए मोदी सरकार द्वारा हाल ही में 'एसआईटी' के गठन की घोशणा की गई। इस घोशणा के बाद उद्योग संगठन 'एसोचैम' द्वारा काली कमाई को देश में वापस लाने के लिए केन्द्र सरकार को छह महीने तक 'माफी स्कीम' लागू करने का सुझाव हाल ही में दिया गया। सुझाव के मुताबिक इस दौरान घोशषित की जाने वाली राशि पर चालीस फीसदी कर लगाया जाए और उस धन का दस प्रतिशत बुनियादी विकास में खर्च किया जाए। 'एसौचैम' के मुताबिक 'माफी स्कीम' अमेरिका, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे दुनिया के बीस देशों में शुरू की गई थी और उसका परिणाम भी उत्साहजनक रहा था। केवल अमेरिका में ही इस योजना का लाभ चौदह हजार से अधिक करदाताओं ने उठाया। जर्मनी में बीस हजार करदाताओं ने इस तरह की योजना का लाभ उठाते हुए सरकार को चार अरब डॉलर का अतिरिक्त राजस्व दिया था।

                     गौरतलब है कि विदेषी बैंकों में जमा कालाधन देश की राजनीति में लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रहा है। बाबा रामदेव समेत कई लोगों ने कालेधन की वापसी को लेकर आंदोलन भले ही चलाया, लेकिन आज तक कोई सार्थक नतीजा नहीं निकल सका। ऐसा लगता है कि कालाधन वापसी का यह सारा शोर ही प्रायोजित है। बेशक काले धन को देश में वापस आना ही चाहिए लेकिन उसकी वापसी के इस प्रायोजित शोर के बीच सबसे अहम सवाल यह है कि क्या विदेशी बैंकों में जमा यह धन देश की सभी समस्याओं को हल करने की एकमात्र चाबी है? आखिर हर तरह के कालेधन पर रोक लगाने के लिए एक ठोस पॉलिसी बनाने की बात क्यों नही की जा रही है? आखिर काले धन के इकट्ठा होने की परिस्थितियों का खात्मा करने की बात क्यों नही होती? क्या माफी स्कीम काले धन की जमाखोरी पर अंकुश लगा देगी? आखिर कालाधन इकट्ठा होने की असल वजहें क्या हैं और इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

                   दरअसल, काला धन दो तरह का होता है। एक ऐसा जो देश के बाहर जमा है और देश की नीति निर्माण पॉलिसी को कतई प्रभावित नहीं करता है। दूसरा वह जो हमारे नीति निर्माण तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करता है और आम चुनाव सहित सरकार के पॉलिसी गत निर्णयों को बदलने में भारी मात्रा में इस्तेमाल होता है। आखिर कालेधन की वापसी के इस शोर में राजनैतिक दल दूसरे किस्म के काले धन पर बहस से बच क्यों रहे हैं? क्या यह सच नहीं है कि काला धन वापस लाने के इस प्रायोजित शोर में दूसरे किस्म के काले धन, जिसका उपयोग चुनाव के वक्त लगभग सभी दल करते हैं, पर साजिशन पर्दा डालने की सम्लित कोशिश की जा रही है? आखिर काले धन के इस दूसरे रूप, जो कि हमारे नीति निर्माण तंत्र को ही पूरी तरह प्रभावित करता है, खुली बहस क्यों नही हो रही है?

                    काले धन की वापसी के इस शोर के बीच एक यहां एक पुस्तक का जिक्र करना बहुत जरूरी होगा। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी में काम करने वाले जॉन पार्किन्स द्वारा लिखी गई 'कॅनफेशन ऑफ ऐन इकोनामिक हिट मैन' एक ऐसी जरूरी पुस्तक है जो दुनिया के अमीर और संपन्न पूंजीवादी देशों द्वारा बड़े पैमाने पर कालेधन का इस्तेमाल गरीब देशों की 'पॉलिसी' अपनी मुनाफाखोर कंपनियों के हित में बनवाने और फिर उस देश के अंतहीन शोषण की करुण दास्तान को बेबाकी से उजागर करती है। अमेरिका की एक प्राइवेट अंर्तराष्ट्रीय फर्म 'चॉस टी मैन' में छद्म नियुक्ति पर लंबे समय तक काम करने वाले पार्किंन्स ने बताया है कि किस तरह से विकासशील देशों की सरकारों को भ्रष्ट बनाने और उनकी आर्थिक नीतियों को प्रभावित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे पूंजीवादी देशों द्वारा अपनाए जाते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक में ऐसे कई देशों का जिक्र किया है जहां पर राजनैतिक दलों को बाकायदा बड़ी मात्रा में चुनाव लड़ने का पैसा हवाला के जरिए दिया जाता था ताकि उनकी सरकार बनने पर मन मुताबिक नीतियों का निर्माण करवाया जा सके। यही नहीं, अमरीका द्वारा किसी देश के खिलाफ अपने पक्ष में लॉबिंग कराने के लिए गरीब देशों को बेहिसाब धन दिया जाता था। उन्होंने इंडोनेषिया, पनामा, कतर, सऊदी अरब समेत कई विकासशील देशों का जिक्र किया है जहां विकसित देश कालेधन धन का उपयोग करके उस देश के आधारभूत ढांचे जैसे शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, सड़क, आवास, सेना, उद्योग आदि पर लिए जाने वाले निर्णय को पूरी तरह प्रभावित करते थे। एक उदाहरण देते हुए वो लिखते हैं कि सन् अस्सी के दशक में अमेरिकी सहायता और विश्वबैंक का कर्ज बेहद गरीब देशों को भारी मात्रा में यह जानते हुए भी दिया जाता था कि यह कर्ज संबंधित देश कभी नहीं चुका पाएंगे। इसके पीछे विश्व बिरादरी में भले ही गरीब देशों की मदद की बात कही जाती थी लेकिन इसके पीछे का असल खेल यह था कि कुछ समय बाद कर्जदार देश पर अपने यहां के स्वास्थ्य, शिक्षा, विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में प्राइवेट सेक्टर को घुसने की इजाजत देने के लिए दबाव बनाया जा सके। यहीं नहीं, कई देशों में तो बाकायदा सरकारों को कम्यूनिस्ट विचारधारा त्यागने और उसके फैलाव को रोकने के लिए अकूत धन दिया गया। यह एक तरह का काला धन था, जो किसी विकासशील देश की आर्थिक और सामाजिक पॉलिसी को पूरी तरह प्रभावित करता था क्योंकि इन देशों में ही अमरीकी कंपनियां अपने बेहिसाब मुनाफे का बाजार देख रही थीं।

               अपने देश का राजनैतिक तंत्र भी इससे अछूता नहीं है। ऐसा अनुमान है कि इस चुनाव में लगभग अठारह हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं और इसके लिए बड़ी मात्रा में विदेशों से काला धन भी लिया गया है। अभी कुछ दिन पहले की बात है सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को आदेष दिया था कि वह भाजपा और कांग्रेस पर विदेश से चुनावी चंदा लेने के लिए कठोर कारवाई करे। देश के कानून के मुताबिक कोई भी पार्टी विदेश से चुनावी चंदा नहीं ले सकती। यह गैर कानूनी और दंडनीय अपराधा है। लेकिन अफसोस यह है कि आज तक इस मामले पर केन्द्र सरकार ने कोई कारवाई नहीं की। जाहिर सी बात है कि राजनैतिक दलों द्वारा चुनाव में काले धन का बेहिसाब इस्तेमाल किया गया और पॉलिसी गत निर्णयों को प्रभावित करने वाले इस धन पर कोई बहस ही नहीं हो रही है। काले धन के इस स्वरूप पर  बहस से राजनैतिक दल बच क्यों रहे हैं? आखिर इस पर चुप्पी क्यों है? बेहतर होता कि कालेधन की समस्या पर समग्रता में बहस होती।

               और फिर, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार की गंगोत्री हमेशा ऊपर से नीचे बहती है। जब देश की राजनीति ही भ्रष्ट होगी तो काले धन पर कोई कठोर एक्शन कैसे हो सकता है? मौजूदा व्यवस्था काले धन के उत्पादन की फैक्ट्री है। बिना बुनियादी परिवर्तन के इस पर अंकुश नही लगाया जा सकता। सिर्फ माफी योजना से कुछ नहीं होगा। बेहतर यही होगा कि चुनाव में उपयोग किए गए काले धन पर सरकार एक श्वेतपत्र लाए और इसे हतोत्साहित करने के लिए कठोर पॉलिसीगत निर्णय ले ताकि देश की पॉलिसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफे के लिए नहीं बल्कि इस मुल्क की आवाम के लिए बन सके। लेकिन सवाल यह है कि विदेशी पूंजी निवेश में ही अपना हित देख रही मोदी सरकार क्या ऐसी हिम्मत दिखा सकेगी?

? हरे राम मिश्र