संस्करण: 30 जून-2014

मोदी ने कहा था देश को लूटूंगा नहीं, फिर भी लूट प्रारंभ

? एल.एस.हरदेनिया

              पने चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने जिन मुख्य मुद्दों को लेकर कांग्रेस के खिलाफ प्रचार किया था उनमें बढ़ती हुई मंहगाई और भ्रष्टाचार प्रमुख थे। परंतु पिछले कुछ दिनों में जो निर्णय नरेन्द्र मोदी की सरकार ने किए हैं उनसे लगता है कि मंहगाई आसमान छू लेगी। नरेन्द्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा था कि मैं देश को लूटने के लिए प्रधानमंत्री नहीं बन रहा हूँ, मैं बदला लेने के लिए भी प्रधानमंत्री नहीं बन रहा हूं, मैं बदलाव करने के लिए प्रधानमंत्री बन रहा हूं। उन्होंने बार-बार यह आश्वासन दिया था कि जिस ढंग से कांग्रेस सरकार ने दस वर्षों में इस देश की जनता को लूटा है वह मैं नहीं होने दूंगा। लगता है कि मोदी जी अपने इन वायदों को भूल गए हैं और ठीक उनके विपरीत काम करना प्रारंभ कर दिया है। रेल भाड़े में जो वृध्दि की गई है उतनी वृध्दि एक साथ पिछले कई वर्षों में नहीं की गई थी। न सिर्फ यात्रियों के किराये में बढ़ोतरी की गई है बल्कि माल ढोने के किराये में भी वृध्दि की गई है। आम आदमी की दैनिक जीवन की सभी आवश्यकताएं जिन चीजों से होती हैं उन्हें ढोने का काम रेलवे के माधयम से ही होता है। जो चीजें रेलवे से यहां से वहां भेजी जाती हैं उन्हें भेजने में सड़क मार्ग की तुलना में कम खर्च लगता है। ऐसी कई चीजें हैं जो सिर्फ रेल से ही भेजी जाती हैं। जैसे डीजल, पेट्रोल, गैस सिलेंडर, कोयला और बड़ी तादात में अनाज। इसमें कोई संदेह नहीं कि समय-समय पर रेल भाड़े में वृध्दि करने की आवश्यकता होती है परंतु वह वृध्दि इस ढंग से की जानी चाहिए कि जिससे आम आदमियों पर कम से कम भार पड़े। यह दु:ख की बात है कि रेल का किराया बढ़ाते समय इस बुनियादी मुद्दे को ध्यान में नहीं रखा गया है। सबसे चौंका देने वाली बात यह है कि रेल भाड़े में बढ़ोतरी के लिए यूपीए सरकार को दोषी माना जा रहा है। मोदी के बाद केन्द्रीय मंत्री परिषद के सर्वाधिक ज्ञाता और वरिष्ठ सदस्य अरूण जेटली ने भी कहा कि हमने जो किराया बढ़ाया है वह तो वही है जिसका प्रस्ताव यूपीए सरकार ने तय कर लिया था। परंतु उन्होंने बढ़ोतरी लागू करने का साहस नहीं दिखाया था। यदि यूपीए सरकार की ही नकल करना है तो भाजपा को चुनाव लड़ने की जरूरत ही नहीं थी। उसे सिर्फ यूपीए के उम्मीदवारों को वोट देकर उन्हें ही विजय बनाना चाहिए था। मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार कहा है कि मैं बदला नहीं लूंगा बल्कि बदलाव करूंगा। यदि बदलाव करने की यही शुरूआत है तो उससे आम आदमी का निराश होना स्वाभाविक है।

               आम उपभोक्ताओं के लिए जो चीज सबसे ज्यादा आवश्यक होती है उनमें शक्कर शामिल है। इस बात के स्पष्ट संकेत दे दिए गए हैं कि शीघ्र ही शक्कर के भाव में काफी बड़ी बढ़ोतरी होने वाली है। बढ़े हुए भाव का संकेत देने के साथ-साथ यह भी घोषणा की गई है कि महाराष्ट्र की शक्कर मिलों को हजारों करोड़ रूपयों का ब्याज रहित ऋण दिया गया है। महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर शक्कर का उत्पादन होता है। कुछ दिनों में वहां की असेम्बली के चुनाव होने वाले हैं। महाराष्ट्र में चुनावों में शक्कर मिल मालिकों की लॉबी की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसलिए चुनाव के पहले उन्हें प्रसन्न करने के लिए भारी भरकम कर्ज दिया गया है। इसके साथ ही साथ आयात होने वाली शक्कर पर लागू कस्टम की दर कम कर दी गई है। यह किस उद्देश्य से किया गया है, यह समझना मुश्किल है परंतु एक बात साफ है कि वे विदेशी उद्योग जो भारत को शक्कर भेजते हैं उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से इसका लाभ मिलेगा।

               शक्कर के साथ ही खाना पकाने वाली गैस भी कम से कम मध्यम वर्ग के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। लगभग सभी मध्यमवर्गीय  परिवारों में गैस सिलेण्डर से ही खाना पकता है। यह इशारा किया गया है कि गैस सिलेण्डर के भाव में लगभग प्रतिमाह बढ़ोतरी होगी। वह बढ़ोतरी प्रतिमाह 10 रूपए के आसपास हो सकती है। इस बात की भी जोरदार अफवाह है कि गैस को मिलने वाली सब्सिडी या तो खत्म की जा सकती है या कम की जा सकती है। दोनों में से जो भी होता है उसका परिणाम गैस सिलेण्डर की कीमत में बढ़ोतरी होगी। यह भी बताया जा रहा है कि मिट्टी के तेल की कीमत में भी वृध्दि होगी। जहां मध्यम वर्ग के लोग गैस सिलेण्डर से खाना पकाते हैं वहीं गरीब, मिट्टी के तेल के चूल्हे से खाना पकाते हैं। शहरी गरीबों के लिए तो मिट्टी का तेल ही एकमात्र सहारा है। ग्रामीण आबादी का भी अच्छा खासा प्रतिशत मिट्टी के तेल का उपयोग करता है। जैसा कि ज्ञात है कि जलाऊ लकड़ी का अभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इस कारण मिट्टी के तेल पर निर्भरता ओर बढ़ रही है। यदि गैस और मिट्टी के तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो उससे मध्यम वर्ग और गरीबों की कमर टूट जायेगी।

               मोदी जी ने अपने भाषणों में कहा था कि पिछले दस वर्षों में केन्द्र की यूपीए सरकार की निष्क्रियता के कारण जहां देश में मंहगाई बड़ी है वहीं भ्रष्टाचार में भी बढ़ोतरी हुई। अब प्रश्न यह है कि मोदी जी के पास कौनसा फार्मूला है जिससे वे यह साबित कर सकें कि उनके शासन में मंहगाई नहीं बढ़ेगी। शायद मोदी इस बात को भूल गए कि भारत में पूंजीवादी व्यवस्था है और पूंजीवाद का पूरा सिध्दांत लाभ पर निर्भर है। और लाभ के बिना उद्योगपति अपने उद्योग चला भी नहीं सकते हैं। इसलिए पूंजीवादी व्यवस्था में कीमतें कम करना लगभग दिवास्वप्न हैं। इस बुनियादी बात को जानते हुए मोदी ने मंहगाई को एक मुद्दा बनाया और लोगों में यह आशा जगाई कि मैं सत्ता में आ जाऊंगा तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। भारत आज नरक है, मेरे आने के बाद पलक झपकते ही वह स्वर्ग हो जाएगा। सोनिया गांधी ने भी मोदी के इन आश्वासनों के प्रति लोगों को सचेत किया था। उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था कि मोदी को जादूगर की तरह पेश किया जा रहा है। मोदी के हाथ में जादू की लकड़ी है और उस लकड़ी के सहारे मोदी देश की हर समस्या का हल कर देंगे।

             एक और मुद्दा है जिस पर देश में शीघ्र निराशा फैलेगी। यह एक वास्तविकता है कि जिन लोगों को पहली बार मतदान करने का अधिकार मिला था उनमें से बहुसंख्यकों ने मोदी के पक्ष में मतदान किया है। वह इसलिए क्योंकि मोदी ने बार-बार यह आश्वासन दिया है कि वे देश में रोजगार के अवसर बढ़ाएंगे और इस बात का प्रयास होगा कि बड़ी संख्या में युवकों को काम मिले। पुन: यह कहना उचित होगा कि मोदी इस बात को भूल गए थे कि पूंजीवादी व्यवस्था में 100 प्रतिशत रोजगार के अवसर बनाना एक कठिन काम है। दुनिया का सबसे बड़ा पूंजीवादी देश अमरीका है। अमरीका में भी 15 से 20 प्रतिशत लोग आज भी बेकार हैं, जो सिर्फ सरकार द्वारा दी गई सहायता से जीवनयापन करते हैं। मोदी कैसे इस पूंजीवादी व्यवस्था के बावजूद 100 प्रतिशत रोजगार के अवसरों का निर्माण कर सकेंगे, यह सोचने की बात है।

             जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है, अभी तक मोदी ने इस संबंध में अपनी योजनाएं उजागर नहीं की हैं। परंतु मोदी शायद इस बात को जान गए होंगे कि भाजपा के राज में भी भ्रष्टाचार आसमान की ऊँचाइयां छू लेता है। मध्यप्रदेश में जो कुछ हो रहा है वह मोदी जी से छुपा नहीं होगा। कौनसा ऐसा क्षेत्र है जिसमें पैसे लेकर अयोग्य लोगों को मेडिकल कॉलेज, दाँतों के कालेज में प्रवेश नहीं मिला हो। पुलिस, शिक्षक, डाक्टर, परिवहन ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिसमें भ्रष्टाचार नहीं हो रहा हो। पिछले 10-11 सालों में भोपाल में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। इससे संबंधित तथ्य एक के बाद एक उभरकर आ रहे हैं। अब चूंकि मोदी देश के सबसे बड़े कर्ताधार्ता हैं, क्या वे मध्यप्रदेश में हुए भ्रष्टाचार के प्रति सशक्त कदम उठाएंगे? यह प्रश्न न सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि देश के मतदाता भी पूछ रहे होंगे।

? एल.एस.हरदेनिया