संस्करण: 30 जून-2014

मसीहा ने मार डाला

? विवेकानंद

      केंद्र की सत्ता में जनता ने बदलाव क्यों किया? इसे लेकर अनेकों जवाब लोगों के पास हैं। कांग्रेस नेताओं ने भी इसे स्वीकार किया है कि महंगाई पराजय का एक बहुत बड़ा कारण रही। सरकार के दौरान हुई वित्तीय गड़बड़ियां भी इसके लिए जिम्मेदार रहीं। बीजेपी ने इन मुद्दों को चुनाव में जोर-शोर से उठाया और सच कहें तो भुनाया। कैग की रिपोर्टों में आए नुकसान को घोटाले का नाम देकर यूपीए सरकार को कठघरे में खड़ा किया। हालांकि इन तमाम गड़बड़ियों में अभी यह साबित होना शेष है कि सरकार को जो नुकसान हुआ है, उसके बदले में संबंधित मंत्री को कोई लाभ हुआ या नहीं। या फिर सिर्फ नीतियां ही गलत थीं। बावजूद इसके हम मान लेते हैं कि मंत्रियों ने गड़बड़ियां की और इसके कारण कारण सरकार को नुकसान हुआ और मंत्रियों की तिजोरी भरी। महंगाई को लेकर भी यूपीए सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी। लगातार अंतर्राष्ट्रीय कारणों का हवाला देकर सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाती रही। आर्थिक मोर्चे पर भी कोई कठोर निर्णय नहीं ले सकी जिससे देश की वित्तीय हालत गिरती चली गई। बीजेपी ने चुनाव के दौरान इसके लिए सरकार को नाकारा करार दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कमजोर कहा गया। अब सवाल उठता है कि बीजेपी सरकार में आकर क्या कर रही है? क्या नरेंद्र मोदी जिन्हें एक झटके में देश का कायाकल्प करने वाला जादूगर बनाकर पेश किया गया था, वे क्या कर रहे हैं?

                 जनता ने मनमोहन सरकार को इसलिए खारिज किया क्योंकि उसे मोदी में मसीहा की छवि दिखाई गई। जाहिर तौर पर इसके लिए बीजेपी ने तो जी-तोड़ मेहनत की ही थी, मीडिया के एक वर्ग ने भी उन्हें महापुरुष बनाया। इस महापुरुष से जनता को सबसे पहली उम्मीद थी कि महंगाई कम होगी। दूसरी उम्मीद थी कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और तीसरी उम्मीद थी अपराधों पर अंकुश की। लेकिन जनता का यह मसीहा मौन साधे हुए है तीनों मामलों में। महंगाई को लेकर वित्त मंत्री से लेकर तेल मंत्री और रेल मंत्री तक कह रहे हैं कि देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए कड़े निर्णय जरूरी हैं। इन कड़े निर्णयों के तहत मोदी सरकार ने अपने पहले बजट के पेश होने से पहले रेल किराए में भारी भरकम बढ़ोत्तरी करके देश की जनता को और महंगाई के भंवर में और बुरी तरह धकेल दिया। अब बजट में एलपीजी सिलेंडर की कीमतें बढ़ाने की घोषणा कर सकती है। जो डीजल की तरह महीने के महीने 5 रुपए के हिसाब से बढ़ेगा। पांच-पांच रुपए करके साल भर में आसानी से बिना किसी विरोध के सिलेंडर 60 रुपए महीना बढ़ जाएगा। मोदी ने रेल किराया बढ़ाकर जनता को ऐसा झटका दिया है जिसका उसे अंदाजा तक नहीं है। सही मायनों में कहें तो जनता ने जिस शिद्दत से मोदी को वोट दिया उसके बदले में मोदी ने उतनी ही कठोरता से जनता को झटका दिया। रेल किराया और भाड़ा बढ़ने से दिखता तो केवल सफर ही महंगा है, लेकिन आम आदमी की जिंदगी दूभर हो जाएगी। इसमें खेत से लेकर रसोई तक आग लगाने का पूरा इंतजाम है। रेल माल भाड़े में भारी बढ़ोत्तरी की वजह से खाद सब्सिडी बिल में भी 200 करोड़ रुपए सालाना की वृध्दि होगी। हर साल करीब 4.4 करोड़ टन खाद के परिवहन में 80 फीसद रेल के माध्यम से ही भेजा जाता है। माल भाड़ा बढ़ने से खाद की कीमतें भी बढ़ेंगी। यानि किसान की खेती की लागत बढ़ जाएगी। किसान वैसे ही आत्महत्या के लिए मजबूर है, अब आगे क्या होगा भगवान जाने।

                इसके बाद रेल माल भाड़ा बढ़ने से महंगाई के इस दौर में अपना घर बनाने का सपना देख रहे लोगों के दिल को चोट पहुंची है। क्योंकि भाड़ा बढ़ने से लोहा महंगा हो जाएगा। बाजार के जानकार मानते हैं कि बाजार में लोहे के दाम 600 रुपए प्रति टन बढ़ सकते हैं। क्योंकि उन्हें कच्चे उत्पाद के परिवहन पर अब यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। सीधा सा मतलब है कि अपना घर बनाने के लिए अपना पेट काट काटकर पाई-पाई जोड़ रहे आम आदमी के लिए अब घर बनाना और मुश्किल हो गया।

                खाना-पीना मुश्किल, घर बनाना मुश्किल और इसके आगे उजाले में रहना मुश्किल। जानकारों की मानें तो माल भाड़ा बढ़ने से कोयले के प्रति किलो मीटर प्रति टन भाड़ा 1.34 रुपए हो जाएगा, जबकि पहले यह 1.25 रुपए था। यानि बिजली कंपनियों की लागत में बढ़ोत्तरी होगी और पहले से ही घाटे में चल रही बिजली कंपनियां दाम बढ़ाएंगीं। आसान शब्दों में कहें तो मोदी सरकार ने महंगाई के दैत्य को अब खुलकर अत्याचार करने का मौका दे दिया। आम आदमी ने एक छोटी सी चीज मांगी थी, थोड़ी सी राहत। इस थोड़ी सी राहत के लिए बीजेपी को अब तक का सबसे बड़ा बहुमत दिया था। लेकिन बदले में मोदी सरकार ने उसे महंगाई में डुबो दिया।

               अपराधों और भ्रष्टाचार पर लगाम आम लोगों की दूसरी प्राथमिकता थी। हम भी उम्मीद करते हैं कि मोदी सरकार इन पर लगाम लगाएगी, उसे थोड़ा वक्त मिलना चाहिए। लेकिन यह उम्मीद वहां आकर टूटने लगती है, जब यह पता चलता है कि मोदी सरकार और उनकी रायों की सरकारों में भ्रष्टाचार करने वाले बड़े-बड़े नेता पुलिस की गिरफ्त में हैं। मोदी इन पर कार्रवाई कैसे करेंगे, जबकि वे अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अपने ही दो मंत्रियों का संरक्षण करते रहे हैं। और आज भी मध्यप्रदेश सरकार को एक घोटाले में बचाने की जुगत पूरी पार्टी भिड़ा रही है। मध्यप्रदेश में इन दिनों शिक्षा जगत का सबसे बड़ा घोटाला चल रहा है। इसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के परिवार पर भी आरोप लगाए जा रहे हैं। सरकार की ओर से आरोप लगाने वालों के खिलाफ मानहानि का दावा भी कर दिया है। मान लेते हैं कि मुख्यमंत्री और उनका परिवार एकदम पाक साफ है, लेकिन क्या सरकार भी पाक साफ है? और यदि सरकार पाक साफ है तो शिवराज सरकार के पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा गिरफ्तार क्यों है? उनको बचाने के लिए सरकार की ओर से कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया? क्या उनकी गिरफ्तारी के बाद हुई सरकार की किरकिरी नहीं हुई है। दूसरी बात मुख्यमंत्री और सरकार को तभी गुस्सा क्यों आया जब बात उन पर और उनके परिवार पर आई। पिछले कई सालों से हजारों वे बच्चे अन्याय का शिकार हो रहे थे जो दिन-रात मेहनत करके पढ़ते हैं, तब मुख्यमंत्री को और उनकी सरकार को गुस्सा क्यों नहीं आया? वे बच्चे जिन्हें बिना किसी गवाह और सबूत के सिर्फ परिस्थितिजन्य कारणों को देखते हुए बिना किसी लिखा-पढ़ी के सलाखों में रखा गया तब मुख्यमंत्री को गुस्सा क्यों नहीं आया? हजारों बच्चों के जीवन से खिलवाड़ होता रहा और व्यवस्था के मुखिया आंख मूंदे चुपचाप देखते रहे। लेकिन जैसे ही अपने परिवार पर बात आई तो उबल पड़े। बात तो तब होती, आपकी मिसाल तो तब दी जाती जब पहली बार यह पता चलने पर कि मेहनतकश बच्चों के साथ अन्याय हो रहा है और इसमें आपकी सरकार के मंत्री और अफसरों की संलिप्तता है, आप ऐसा ही आक्रोश भरा कदम उठाते और उन्हें तत्काल निकाल बाहर करते। लेकिन तब मुख्यमंत्री ने ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की। इससे साफ हो जाता है कि महंगाई हो, भ्रष्टाचार हो या फिर बेलगाम अपराध। जनता को बरगलाने के लिए भावपूर्ण भाषणों में इनका जिक्र होता है। हकीकत में सरकार का इनसे कोई वास्ता नहीं।

? विवेकानंद