संस्करण: 30 जून-2014

खतरनाक है रक्षा क्षेत्र में एफडीआई

? रीना मिश्रा

         चुनाव प्रचार के दौरान देश की आवाम के बीच 'अच्छे' दिन लाने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने, सत्ता संभालते ही अर्थव्यवस्था को 'पटरी' पर लाने तथा रक्षा उपकरणों के निर्माण में तेजी के नाम पर, रक्षा क्षेत्र में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफडीआई) की मंजूरी जैसे ही दी, कर्मचारी संगठनों में हड़कंप मच गया। सरकार के इस फैसले के बाद, देश में रक्षा उपकरण बनाने वाली कई घरेलू सरकारी एवं निजी कंपनियों के सामने न केवल अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया, बल्कि उसके लाखों कर्मचारियों की रोजी रोटी पर भी गंभीर खतरा मंडराने लगा। आधुनिक राज्य का उदय और उसके विकास के इतिहास में शायद यह पहली बार है जब विदेशी कंपनियां किसी देश की सुरक्षा व्यवस्था में पूरी तरह से सीधे सम्लित होंगी। किसी संप्रभुता संपन्न स्वतंत्र देश के इतिहास में शायद यह पहला मौका है जब उसकी सुरक्षा जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की छूट दी गई है। इस फैसले के बाद उभरे जबरजस्त विरोध को जहां सरकार द्वारा रक्षा उपकरणों के तेज निर्माण की दलील के साथ ठंडा करने की कोशिश की जा रही है वहीं, देश के बड़े कर्मचारी संगठनों द्वारा इस फैसले का जबरजस्त विरोध किया जा रहा है। उनकी चिंता इस क्षेत्र में काम कर रहे कर्मचारियों की नौकरियों पर आने वाले संभावित संकट को लेकर है।

                  गौरतलब है कि पिछली यूपीए सरकार ने अरविन्द मायाराम समिति की रिपोर्ट के आधार पर देश के रक्षा क्षेत्र में छब्बीस प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश का फैसला किया था, जो किसी विषेश परिस्थिति में भी उनन्चास प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता था। यहां यह तथ्य ध्यान देने लायक है कि दक्षिण एशिया में चीन के बाद भारत का रक्षा बजट सबसे बड़ा है। यहीं नहीं, भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश भी है और रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा हर वर्ष उपकरणों को खरीदने में खर्च किया जाता है। अमेरिका आज भी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश है। इस तथ्य के आलोक में यह सहज ही समझा जा सकता है कि यह फैसला इतनी जल्दी क्यों हुआ और इसका सहज लाभ किस देश की हथियार निर्माता कंपनियों को मिलने जा रहा है। अब तक जो हथियार अमरीका से आते थे, अब इसी देश में अमरीकी कंपनियों द्वारा बनाए जाएंगे।

                बहरहाल, मोदी सरकार द्वारा आनन-फानन में लिए गए इस फैसले के बाद कई गंभीर सवाल पैदा हो जाते हैं। आखिर मोदी सरकार को इस निर्णय के लिए इतनी जल्दी क्यों थी, और उनके ऊपर इसे इतनी जल्दी करने का दबाव किसने बनाया था? फिर क्या भाजपा ने सत्ता में आने के पहले ही रक्षा क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेष से संबंधित कोई अधययन करवा रखा था? क्या देश के रक्षा क्षेत्र को पूरी तरह से विदेशी हथियार निर्माता कंपनियों के हाथ सौंपने का फैसला सही है? आखिर इस फैसले का फायदा किसे मिलेगा? क्या देश की घरेलू और सरकारी हथियार निर्माता कंपनियां विदेशी कंपनियों की कड़ी प्रतिस्पर्धा में कहीं खड़ी हो पाएंगी? आखिर घरेलू कंपनियों को और आधुनिक तथा क्षमतावान बनाने में दिक्कत कहां थी? क्या यह काम चरणबध्द तरीके से नहीं किया जा सकता था?

          दरअसल, जब हम सरकार के किसी फैसले पर इस नजरिए से विचार कर रहे होते हैं कि इससे देश को क्या फायदा होगा तब इसका आशय ही यही होता है कि संबंधित देष की जनता पर इस फैसले का क्या असर पड़ेगा। यह शीशे की तरह साफ है कि जब किसी मुल्क का रक्षा बजट बढ़ता है, देश में रोजी-रोटी, षिक्षा, आवास, चिकित्सा जैसी चीजें न केवल मंहगी हो जाती हैं बल्कि इसका खामियाजा देश के समूचे आर्थिक तंत्र तथा गरीब जनता को उठाना पड़ता है। देश में हर साल रक्षा क्षेत्र के बजट में अपार वृध्दि की जाती है, जिससे अनावश्यक कर बढ़ते हैं तथा बुनियादी सुविधाएं भी मंहगी हो जाती हैं। वैसे भी देश की आवाम को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा जैसी बुनियादी जीचें चाहिए या फिर असलहों और बाश्दों का ढेर? और फिर, जब पूंजी देश की सीमाएं तोड़ कर अंतर्राष्ट्रीय रूप में आ सामने आ चुकी हो, तो फिर अब फिर देश की सुरक्षा का हौव्वा बनाने का क्या औचित्य? फिर इन हथियारों का क्या उपयोग होगा। वैश्विक पूंजीवाद तो युध्द लड़ने की हैसियत ही खो चुका है, फिर इनका उपयोग केवल घरेलू असंतोश और सवालों के दमन के अलावा कहां किया जाएगा?

          और फिर, सवाल यह है कि क्या मौजूदा हालात में इस देश की रक्षा प्रणाली का सुदृढीकरण बिना विदेशी सहायता के नहीं हो सकता था। आखिर मोदी सरकार की इस फैसले के पीछे की असल मंशा क्या है? क्या यह कदम देश की समूची रक्षा व्यवस्था को विदेशियों के हाथों गिरवी रखने जैसा नहीं है। सवाल केवल रक्षा जैसे संवेदनशील मसले के 'प्राइवेटाइजेशन' का नहीं है। यह समूची आर्थिक नीति का प्रश्न है। आज मोदी सरकार जिन उदारवादी आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ा रही है उसमें आम आदमी के लिए कोई जगह ही नहीं है। ऐसी नीतियां जो एक बड़े तबके को हाशिए पर डालती हों कैसे स्वीकार्य हो सकती हैं? रक्षा क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को आमंत्रण देना बेहिसाब मुनाफे, घोटाले तथा भ्रष्टाचार का सम्लित एवं खतरनाक खेल है, जिसे मोदी सरकार खेल रही है।, जिसके गंभीर परिणाम इस देश को भुगतने पड़ सकते हैं।

              बहरहाल, मोदी सरकार के इस फैसले ने भाजपा की मातृ संस्था संघ के सामने भी एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वह किस किस्म के रा्ट्रवाद का समर्थन करता है? क्या उसका रा्ट्र अपनी सुरक्षा के लिए विदेी कंपनियों पर आश्रित होगा? क्या वह अपनी सुरक्षा अब खुद नहीं कर सकता? क्या कोई दे अपनी सुरक्षा के लिए खुद रक्षा उपकरण नहीं बना सकता? आखिर संघ के रा्ट्रवाद की तस्वीर क्या है? इसे संघ को सप्ट करना चाहिए। कुल मिलाकर मोदी के इस फैसले के बाद संघ द्वारा जिस तरह से चुप्पी साधी गई वह साबित करती है कि उसका रा्ट्रवाद भी विदेी कंपनियों के हित में ही अपने को सुरक्षित महसूस करता है। आखिर संघ चुप क्यों है?

? रीना मिश्रा