संस्करण: 30 जून-2014

इतिहास का मोदीकाल

? सुभाष गाताड़े

             'जापान ने अमेरिका पर नाभिकीय बम गिराए थे', 'महात्मा गांधी की हत्या 30 अक्तूबर 1948 में हुई', 'मुल्क के बंटवारे के बाद एक नया देश अस्तित्व में आया जिसे इस्लामिक इस्लामाबाद कहते है',  'दक्षिण के लोगों को मदरासी कहते है' 'पूर्वी भारत के अधिकांश लोग बम्बू एवं लकड़ी के बने घरों में रहते है'। किसी स्कूली बच्चे की नोटबुक में लिखे प्रतीत होने वाले उपरोक्त उध्दरण उन पाठयपुस्तकों से हैं जिन्हें कई सालों से गुजरात के स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है। गौरतलब है कि गुजरात कौन्सिल आफ एजुकेशनल रिसर्च एण्ड टरेनिंग और गुजरात स्टेट बोर्ड फॉर स्कूल टेक्स्टबुक्स के विशेषज्ञों की तरफ से इन पाठयपुस्तकों को तैयार किया गया है। इन पाठयपुस्तकों का एकांगीपन इस मामले में भी उजागर होता है कि सातवीं की किताब में जहां मध्ययुग पर एक अधयाय शामिल किया गया है, जिसमें महज एक अनुच्छेद मुगलशासन पर है, वहीं बाकी अधयाय इस बात का वर्णन करता है कि किस तरह महमूद गज़नी ने गुजरात एवं सौराष्टर को लूटा था। /भास्कर, 21 जून 2014/

              इधर बीच यह ख़बर भी आयी है कि 'गुजरात के स्कूलों में संघ की किताबों को शामिल किया गया है' /इण्डियन एक्स्प्रेस 19 जून 2014/वडोदरा म्युनिसिपल कार्पोरेशन द्वारा संचालित 105 प्रायमरी स्कूलों में प्रस्तुत एकेडेमिक सत्र में ही कक्षा एक से लेकर आठवीं कक्षा तक उन्हें शामिल किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 'यह पाठयपुस्तकें कहीं भी इस बात को छिपाती नहीं कि वह संघ विचारधारा के अनुरूप हिन्दू राष्ट्रवाद को बढ़ावा देती हैं.... इनमें विशेष फोकस संघ के संस्थापकों हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर जिन्हें पूजनीय गुरूजी कहा जाता है, पर है।

                       जनाब नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद पाठयपुस्तकों की अन्तर्वस्तु का सवाल और स्वयं गुजरात के अन्दर - जहां मोदी ने तेरह साल से मुख्यमंत्री पद सम्भाला था - शिक्षा की दुर्दशा का सवाल जिस तरह सूर्खियां बना है उसकी यह चन्द मिसालें हैं। अभी वैसे ताजा समाचार यहभी आया है कि प्रायमरी के स्तर पर शिक्षा को सुगम बनाने के मामले में गुजरात 35 राज्यों की सूची में 33 वें नम्बर पर है। पिछले साल वह 34 वे नम्बर पर था तो उसके पिछले साल 33 वे नम्बर पर था। ध्यान रहे कि मानव संसाधान विकास मंत्रालय द्वारा तैयार प्रस्तुत रिपोर्ट को खुद भाजपा की नेत्री और फिलवक्त मानव संसाधान विकास मंत्री स्मृति इरानी ने जारी किया। (Read more at: http:\\www.livemint.com\Politics\jE0zeJuH4Om8iyQGQ61l3L\Gujarat-languishes-at-bottom-of-primaryleveleducation-rank.html?utSa_source=copy)

            यह सही है कि इससे अधिक सूर्खियां 'शिक्षा बचाओ आन्दोलन' के दीनानाथ बात्रा की मुहिम द्वारा बटोरी जा रही हैं जिसके अन्तर्गत देश के अग्रणी प्रकाशकों द्वारा अपनी चर्चित किताबें 'लुगदी' बनाने या उनकी समीक्षा करने के मसले सामने आ रहे हैं। वेण्डी डोनिगर जैसी जानीमानी विदुषी द्वारा लिखित 'हिन्दुइजम : एन अल्टरनेट हिस्टरी' को लेकर पेग्विन प्रकाशन द्वारा जिस तरह बात्रा की अगुआई में संचालित इस संस्था द्वारा अदालत में दायर मुकदमे का फैसला आने के पहले ही 'लुगदी' बनाने का निर्णय लिया गया उसके बाद गोया ऐसे प्रसंगों की बाढ़ सी आयी है। 'अलेफ' प्रकाशन द्वारा जहां इसी के बाद वेण्डी डोनिगर की एक अन्य किताब वापस लेने का निण्र्य लिया गया वहीं 'ओरिएन्ट ब्लैकस्वान' जैसे प्रकाशन द्वारा एक दशक से भी अधिक समय से पाठयपुस्तक के तौर पर चर्चित किताब 'प्लासी टू पार्टिशन : ए हिस्टरी आफ माडर्न इंडिया' - जिसका लेखन शेखर बंधोपाध्याय ने किया है - उसे लेकर जनाब बात्रा द्वारा उठाए गए आक्षेपों को लेकर उसकी समीक्षा करने की बात कही है। इसी किस्म की नौबत आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापनरत युवा विदुषी मेघा कुमार द्वारा लिखित एक किताब 'कम्युनालिजम एण्ड सेक्सुअल वायोलेन्स : अहमदाबाद सिन्स 1969' पर आयी है। यह किताब कुछ माह पहले मुद्रित होकर प्रकाशित की गयी, जिसे लेकर ओरिएन्ट ब्लैकस्वान की तरफ से अप्रैल माह से प्रचार भी किया जाने लगा, मगर जब किताब में राष्टीय स्वयंसेवक संघ के 'खराब चित्रण' को लेकर 'शिक्षा बचाओ आन्दोलन' की तरफ से आक्षेप उठाए गए, तब उसी प्रकाशन ने अचानक अपनी भाषा बदली है, इतनाही नहीं उसकी तरफ से अपने अन्य प्रकाशनों की भी इस रौशनी में 'समीक्षा' करने की बात मान ली गयी है।

                    अदालती कार्रवाईयों का डर और हिन्दुत्व के अतिवादी तत्वों द्वारा उठाए जा सकनेवाले हुडदंग से आतंकित प्रकाशकों की यह स्थिति और राज्य का ऐसी घटनाओं को लेकर मौन की चर्चा करते हुए अपने आलेख ' द आनसेट आफ फीयर' /द टेलिग्राफ, 17 जून 2014/ में चर्चित माक्र्सवादी विचारक प्रभात पटनाइक लिखते हैं कि 'जहां ब्रिटिश बुर्जुआ राज्य ने सलमान रश्दी को मिल रही धमकियों को लेकर खुद अपने पैसे से उन्हें सुरक्षा प्रदान की थी, जबकि इसके पहले स्वयं रश्दी ब्रिटिश सरकार के 'मजबूत वामपंथी आलोचकों' में शुमार किए जाते थे, जबकि यहां भारत में हम इस बात की भी गारंटी नहीं कर सकते कि राज्य किसी चर्चित प्रकाशक को सत्ता में बैठे लोगों के समर्थक हुडदंगियों की दहशत से बचाएगा।' उनका यह भी कहना है कि हम भले ही आधुनिक राष्ट्र के तौर पर अपने उदभव के बारे में अपनी पीठ थपथपा लें, मगर हकीकत में यह खयाली पुलाव प्रतीत होगा, अगर राज्य हुडदंगियों से अपने लोगों को बचाने में असफल हो जाता है तो।

                    जनाब दीनानाथ बात्रा की अगुआई में इतिहास पुनर्लेखन की चल रही यह कोशिशें बरबस भाजपा की अगुआई वाली पहली राजग सरकार के दिनों की याद ताजा करती है जब उसी तरह तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी की अगुआई में ऐसी ही कोशिशें चली थीं। हम याद कर सकते हैं कि किस तरह आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस ने फरवरी 11, 2000 को सुमित सरकार एवं के एन पन्नीकर की अगुआई में सम्पादित 'टूवर्डस फरीडम' शीर्षक खण्ड को वापस लिया था। प्रस्तुत खण्ड में आजादी के आन्दोलन में हिन्दुत्ववादी संगठनों की नकारात्मक भूमिका पर रौशनी डाली गयी थी, यह सप्रमाण स्पष्ट किया गया था कि किस तरह इन संगठनों ने आज़ादी के आन्दोलन से दूरी बनाए रखी थी। चूंकि यह बातें संघ परिवारजनों के लिए बेचैनी का सबब बनी थी, तो उन्हें किताब को ही वापस करवाने का फरमान सुनाया था।

                     वैसे यह कोशिशें किस तरह संघ परिवार के व्यापक एजेण्डा का हिस्सा हैं, यह संकेत हमें वजीरे आजम नरेन्द्र मोदी द्वारा संसद के पटल पर राष्ट्रपति के अभिभाषण को लेकर धन्यवाद ज्ञापन के नाम पर जो वक्तव्य दिया गया, उससे भी मिलता है जिसमें उन्होंने 'बारह सौ साल की गुलाम मानसिकता' की बात कही। उनका कहना था 'बारह सौ साल की गुलामी की मानसिकता हमें परेशान कर रही है। बहुत बार हमसे थोड़ा उंचा व्यक्ति मिले, तो सर उंचा करने की हमारी ताकत नहीं होती है।'

                 आम भारतीय बचपन से यही सुनता आया है कि भारत दो सौ साल की गुलामी में जिया है जिससे दो सौ साल की ब्रिटिश हुकूमत का काल सन्दर्भित होता है। अब उस कालखण्ड को 1200 साल तक फैला कर जनाब मोदी इतिहास को देखने के अपने समूचे नज़रिये को प्रभावित करते दिखते हैं। यह तथ्य है कि इस दौरान आए आक्रमणकारी राजाओं में तमाम मुस्लिम शासक थे। 200 साल के बजाय गुलामी को 1200 साल तक विस्तारित करता मोदी का यह वक्तव्य इस हकीकत को पूरी तरह नजरअन्दाज करता है कि जहां ब्रिटिशों ने भारत को अपना घर नहीं बनाया जबकि इसके पहले बाहर से आए तमाम आकरान्ताओं ने इसे अपना मुल्क बनाया, देश की संस्कति के विकास में अपना योगदान दिया, जिसने देश में गंगा जमनी तहज़ीब को जन्म दिया।

? सुभाष गाताड़े