संस्करण: 30 जून-2014

बहुत कठिन है डगर राष्ट्र-भाषा की

? डॉ. गीता गुप्त

        सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में भारतीय राजनीतिक धरातल पर हिन्दी की स्वीकार्यता स्पष्ट रूप से दिखाई दी। पी. चिदम्बरम जैसे राजनेता हिन्दी ज्ञान के अभाववश हिन्दी प्रदेश से चुनाव मैदान में खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाये। नयी सरकार के गठन के बाद भव्य शपथ-ग्रहण समारोह में जब अधिकतर सांसदों ने हिन्दी में शपथ ली, विदेशी अतिथियों से प्रधानमंत्री ने हिन्दी में संवाद किया तो मुझ जैसे तमाम हिन्दी सेवियों के मन में यह उम्मीद जागी कि शायद अब हिन्दी के दिन बहुरेंगे। मगर 27मई को जब गृह मंत्रालय ने अपने सभी विभागों को निर्देश दिया कि कामकाज में अधिकाधिक हिन्दी का उपयोग किया जाए, सोशल मीडिया और इण्टरनेट पर हिन्दी अनिवार्य हो। अधिकारीगण फेसबुक, गूगल, ब्लॉग्स में भी हिन्दी का उपयोग करें और अपने कमेण्ट अंग्रेजी के अलावा हिन्दी में भी पोस्ट करें। तो सरकारी कामकाज में हिन्दी को प्राथमिकता देने की इस पहल का विरोध तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के साथ-साथ डीएमके प्रमुख करुणा निधि, पीएमके प्रमुख एस.रामदास और एमडीएम के प्रमुख वाइकों ने भी एक सुर में किया।

               अहो दुर्भाग्य ! कि जिस दक्षिण भारत के विरोध ने पहले भी हिन्दी को स्वाधीन भारत की राष्ट्र भाषा बनने से वंचित कर दिया था, दुबारा भी उसी ने हिन्दी का विरोध कर जतला दिया कि उसके लिए राष्ट्र नहीं राज्य का हित सर्वोपरि है। संकीर्ण क्षेत्रीयता से ऊपर उठने की मानसिकता और राष्ट्रवादी चिंतन से वह कोसो दूर है। संयोगात् यह दु:खद सत्य भी इसी समय उजागर हुआ कि उड़ीसा विधानसभा में हिन्दी बोलना मना है। हाल ही में विधानसभा अधयक्ष निरंजन पुजारी ने विधायक एस.आर. प्रजापति को हिन्दी में सवाल पूछने से रोक दिया। गजपति से कहा गया कि 'वे उड़िया या फिर अंग्रेजी में सवाल पूछें अन्यथा चुपचाप बैठ जाएं। क्या यह राजभाषा हिन्दी का अपमान नहीं ? दक्षिण भारत और उड़ीसा के राजनेताओं को मालूम होना चाहिए कि किसी स्वतंत्र देश का गौरव उसके अपने धवज, अपने राष्ट्रगान और अपनी राष्ट्रभाषा से व्यक्त होता है। हम कोई भी भाषा-भाषी हों, किसी भी क्षेत्र या प्रांत के हों, भारत से बाहर प्रवास में सिर्फ भारतीय होते हैं और भारतीयता ही हमारी पहचान का आधार होती है।

             गृह मंत्रालय के निर्देश पर आपत्ति जतलाते हुए जय ललिता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है और राजभाषा कानून 1963 की दुहाई दी है। करुणानिधि ने कहा-'यह गैर हिन्दी भाषियों को दोयम दरजे की तरह समझने जैसा है। इतिहास भाषा की लड़ाई और हिन्दी विरोधी आन्दोलन का गवाह है।'लेकिन ये दोनों नेता भूल रहे हैं कि 14 सितम्बर 1949 को भाषा संबंधी प्रावधानों को स्वीकृत करते समय ही संविधान सभा ने तय किया था कि 15 वर्ष के भीतर हिन्दी को व्यावहारिक धरातल पर उसका संवैधानिक अधिकार दिलवाने हेतु आवश्यक उपाय किये जाएंगे। ये दीगर बात है कि राजनेताओं की उदासीनता के कारण ही 15 वर्ष बाद हिन्दी के साथ अंग्रेजी को भी सह राजभाषा बना दिया गया और हिन्दी का विरोध करने वाले राज्यों की सहमति की अनिवार्यता के कारण हिन्दी व्यावहारिक रूप से भारत संघ की राजभाषा बनने से वंचित हो गई। मगर 1964 से लेकर आज तक,पचास वर्षों में भी दक्षिण भारतीय एवं अन्य क्षेत्रीय कट्टरता से ग्रस्त राजनीतिक दलों की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है। इसका ख़ामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है।

              कुछ माह पूर्व समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने हिन्दी को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था कि 'संसद में सांसदों के अंग्रेज़ी में' संबोधित करने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। जो देश अपनी मातृभाषा का उपयोग करते हैं, वे ज्यादा विकसित है। मगर भारत में अंग्रेजी बोलने वाले लोग गर्व अनुभव करते हैं और अपने आपको दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं।' तो जैसी कि संभावना थी, अंग्रेजी समाचार पत्रों ने यादव के इस सुझाव की घोर निन्दा की और भारत में आयी समस्त सूचना-तकनीक क्रान्ति का सारा श्रेय अंग्रेजी को देते हुए उस भाषा को ज्ञान-प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम निरूपित किया। जबकि यह सर्वविदित है कि चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस,रूस, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी भाषा में ही उन्नति के सारे सोपान तय किये हैं और केवल अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अंग्रेजी भाषा को माध्यम के रूप में अपनाया है। जो अंग्रेजीदां सफलता के लिए अंग्रेजी में दक्षता को ही अनिवार्य मानते हैं, उन्हें बहुत बड़ा भ्रम है जोकि निराधार है।

             पूरी दुनिया में लोग अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं। मगर भारत में भाषा के आधार पर भेदभाव होता है। अंग्रेजी में निष्णात लोग अन्य भारतीयों को हेय समझते हैं। जबकि हमारे संविधान में सभी भारतीय भाषाओं को सम्मान प्राप्त है और बिना प्रतिबंधा के चयन का अधिकार दिया जाए तो अखिल भारतीय स्तर पर भारतीय भाषाओं का ही वर्चस्व दिखाई देगा। क्षेत्रीय कट्टरता के कारण हिन्दी अपनी ही धरती पर उपेक्षित है मगर समूची दुनिया में उसकी स्वीकार्यता निरन्तर बढ़ रही है। 73 देशों में यह भाषा लिखी, समझी और बोली जा रही है। विश्व के 150 विश्वविद्यालयों में इसका अध्ययन अध्यापन जारी है। भारत दुनिया की सर्वाधिक जनसंख्या वाला दूसरा देश और संभावनाओं से परिपूर्ण बाजार है। माइक्रोसॉफ्ट के मुखिया बिल गेट्स, अमेरिकी राष्ट्रपति बराम ओबामा और ब्रिटिश प्रधानमंत्री सहित तमाम देश भारत को अघोषित सुपर पॉवर मानते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून 'नमस्ते, क्या हालचाल है,' कहकर अपना वक्तव्य आरम्भ करते हैं। विश्व भर की 500 से अधिक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और अलग-अलग देशों की हज़ारों महत्वपूर्ण कम्पनियों ने अपने ओवरसीज़ स्टॉफ के लिए हिन्दी का ज्ञान अनिवार्य घोषित कर दिया है। तो हमें अपनी शक्ति का अहसास क्यों नहीं ? क्यों हमारे राजनेता अपने ही देश में हिन्दी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में नहीं स्वीकारना चाहते ?

            फिलहाल जरूरत इस बात की है कि भारतीय संसद में भारतीय भाषाओं का उपयोग हो। अंग्रेजी पर प्रतिबंधा की आवश्यकता नहीं। जब अधिकतर राजनेता अपनी भाषा का व्यवहार करेंगे तो संसद और विधानसभाओं में कितने अंग्रेजीदां बचेंगे ? कभी न कभी उनमें भी अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम जागेगा। गुलामी की भाषा के प्रति उनका मोहभंग होगा और राष्ट्रभाषा का महत्व उनकी समझ में आएगा। यदि भारत महाशक्ति बनना चाहता है तो उसके पास एक समर्थ भाषा होनी ही चाहिए, जिसे विश्व भाषा का दर्जा प्राप्त हो। जिसमें देश की जनता को रोजगार, शिक्षा, न्याय और सारी वांछनीय सुविधाएं मिल सकें। हिन्दी ऐसी समर्थ भाषा है। लेकिन उसे अपने ही घर में चुनौतियां मिल रही हैं। जयललिता और एम. करुणानिधि को शायद ज्ञात नहीं कि भारत के सर्वश्रेष्ठ दो समाचार पत्र (हिन्दी डेली मिलाप और 'स्वतंत्र वार्ता') दक्षिण भारत (हैदराबाद) से ही प्रकाशित हो रहे हैं। विश्व हिन्दी सम्मान पाने वाली दो विदुषियां प्रोफेसर तंकमणि अम्मा और शेषारत्नम जी दक्षिण की हैं जिनकी पुस्तकें हिन्दी साहित्य जगत को समृध्द कर रही हैं। दक्षिण भारत में विद्यमान हिन्दी के विद्वानों की सूची लम्बी हो सकती है। वहां जितना काम हिन्दी के क्षेत्र में हो रहा है, अन्यत्र देखने में नहीं आता।

             निस्संदेह, यह समय हिन्दी की ताकत को पहचानने का है। भारत बहुत समय गंवा चुका है। विश्व भाषा के रूप में हिन्दी को स्थापित करने के लिए अब केन्द्र के साथ राज्य-सरकारों को प्रतिबध्दता दर्शानी होगी और पहले अपनी धारती पर उसे प्रतिष्ठित करना होगा। ईमानदारीपूर्वक विचार करना होगा कि आखिर कब तक यह स्वाधीन देश गुलामी की भाषा में शासन करता रहेगा ? कब तक हमारे राजनेता क्षेत्रीयता की संकुचित परिधि में घिरे रहेंगे ? और कब तक हिन्दी अपने अधिकारों के लिए राजनेताओं की स्वीकृति की मोहताज बनी रहेगी ?

? डॉ. गीता गुप्त