संस्करण: 30 जून-2014

बरसात के पानी को सहेजना होगा 

? नरेन्द्र देवांगन

     पूरे देश को सामने रखकर देखें तो हमारे यहां पानी की कोई कमी नहीं है। कहीं कम और कहीं ज्यादा मानसून खूब पानी बरसाता है पर हमारी सरकारें उसे सहेज कर नहीं रख पातीं। न बांधों में जमा रख पाती हैं और ना ही धरती के भीतर डालकर जलस्तर को बढ़ाने का काम कर पाती हैं। वे तो पानी को बहने का आसान रास्ता देने के लिए नालियां बनाती हैं। इसका नतीजा देश में डार्कजोन बढ़ते जाते हैं। गांव तो गांव शहर तक पीने के पानी को तरसते हैं। मजबूरी में लोगों को दस से पंद्रह रूपए लीटर का पानी पीना पड़ता है। आखिर कब तक चलेगा यह सिलसिला?

                हमारे देश में दुर्भाग्य से पानी की 90 फीसदी मांग वर्षा से ही पूरी हो पाती है। 10 फीसद से भी कम पानी हमें बर्फ पिघलने से मिलता है। यूरोप, अमरीका जैसे देशों में बर्फ पिघलने से काफी मात्रा में पानी मिल जाता है। भारत में पानी की उपलब्धता को लेकर बहुत असमानता है। राजस्थान जैसे रेतीले इलाके में वर्षा जल पर ही निर्भर रहना पड़ता है और पानी की उपलब्धता कम रहती है। वहीं पूर्वांचल में, जहां ज्यादा वर्षा होती है, वहां बाढ़ भी आ जाती है। अब इस विषमता के कारण पानी का सही इस्तेमाल करना हमारे लिए एक चुनौती है। इसलिए हमारे पास जो उपलब्धा पानी है, उसी में हमें तारतम्य बैठाना पड़ेगा। पानी का गैस और तेल की तरह आयात नहीं किया जा सकता है। हम भोजन की समस्या को तो सम्भाल सकते हैं लेकिन पानी जितना है, उसी का अधिकतम सदुपयोग करना होगा।

                पिछले कुछ वर्षों से मानसून का ढांचा बदलता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन इसका बड़ा कारण है। आज वैज्ञानिक समझते हैं कि जलवायु परिवर्तन का बड़ा संकेत यह है कि हमारा मानसून 'एक्सट्रीम' होगा। यानी जब वर्षा होगी तो बहुत ज्यादा होगी और सूखा पड़ेगा तो वह भी बहुत होगा। यह भी देखने को मिल रहा है कि वर्षा बेमौसम हो रही है। यह बड़ा बदलाव मानसून में आ रहा है। वैज्ञानिक भी नहीं जानते कि कब ज्यादा सूखा होगा और कब वर्षा आएगा। पानी न मिलने की समस्या हमारे शहरों में आज हकीकत है, जो लगातार बढ़ती ही जा रही है। आज न उद्योगों को पर्याप्त पानी है, न शहर में पानी है। काफी शहरों में तो हते में एक दिन पानी सप्लाई होता है। कुछ में 15-15 दिन में एक बार पानी नसीब होता है। किसान से लेकर शहरी जीवन तक पानी की उपलब्धता को लेकर दिक्कतें बढ़ रही हैं। इससे निबटने के लिए हमें बहुत कुछ करना है।

                देशभर में वॉटर रिचार्जिंग के लिए सबसे पहले हमें मौजूदा तालाबों और जोहड़ों की जमीनों का सीमांकन, चिन्हिकरण और पंजीकरण करना चाहिए। उन पर बहुत अतिक्रमण हो रहा है। इनका फिर से निर्माण शुरू होना चाहिए, जिससे ये कारगर बन सकें। धरती पर जहां जल भंडारों का पुनर्भरण सम्भव है, वहां नए तालाब-जोहड़ बनाने चाहिए। इस वक्त भारत में वर्षा का बहुत सारा जल वाष्पीकरण से उड़ जाता है। राजस्थान जैसे इलाकों में तो वाष्पीकरण रोकना बेहद जरूरी है। ऐसे प्रदेशों में भूजल का भण्डारण खुले रूप से हो ताकि भूजल का पुनर्भरण हो सके। इसके अलावा यह सुनिश्चित करना होगा कि वर्षा जल में गंदा जल न मिले। आजकल तालाबों में वर्षा जल भी आता है और सारे गंदे नाले उन तालाबों के साथ जोड़ दिए जाते हैं। यदि वर्षा जल गंदे जल में मिलेगा तो धारती के पेट को प्रदूषित करेगा, जो फिर ठीक करना संभव नहीं है।

                   गांवं में जीआईएस और रिमोट सेंसिंग से सही मायने में मापना होगा कि कहां-कहां पानी मौजूद है। हरेक गांव को उनकी पानी की जरूरतों के हिसाब बांटना होगा। हमारे देश में पानी के लिए इतनी योजनाएं हैं, जिनके तहत भरपूर धन गांवों को भेजा जाता है लेकिन फायदा नहीं होता है। इसलिए पानी के लिए सबसे पहली प्राथमिकता देहात को बनाना चाहिए। 20-25 गांवों को एक यूनिट समझकर वहां पानी और स्थानीय स्तर पर बिजली का वितरण करना चाहिए। देश में पानी और बिजली की योजना हमें निचले स्तर से ही शुरू करनी होगी। इस दिशा में क्रियान्वयन से ही हर गांव में पानी-बिजली की समस्या पूरी तरह दूर कर सकते हैं। इस तरह जो खर्चा आएगा, वह भी बहुत कम होगा।

                   आने वाले वक्त में वर्षा जल का भरपूर उपयोग हो, भूजल रिचार्ज हो, उसके लिए अभी से काम करना होगा। आज जो तालाब हैं, उन पर काम शुरू कीजिए। जितनी भी वर्षा हो, उस पानी को रोकिए। जिस प्रकार चेन्नई में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को हर घर के लिए जरूरी बनाया गया है, वैसी योजना सभी शहरों के लिए हो। शहरों के जो तालाब हैं उन्हें बचाने के लिए कोई कानून नहीं है। कोई भी लैंड उपयोग बदलकर तालाब हथिया सकते हैं। शहर की प्लानिंग केवल वहां की जमीन को देखकर की जाती है, इसके चलते सारे तालाब खो गए हैं। इसलिए सरकारें शहर के संसाधन बचाने के लिए पहल करें।

                जल संग्रहण और रिचार्ज को लेकर हमें संयुक्त प्रयास करने की जरूरत है। आम आदमी अपने स्तर पर ही घर में टांके बनाकर घर की जरूरतों का पानी एकत्र कर सकता है। हमें प्राकृतिक जल का ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग करना चाहिए। किसान अपनी जमीन पर तालाब बनाए, खेत तलाई बनाए, खेत तालाब बनाए। खेत का पानी खेत में और घर का पानी घर में इस्तेमाल हो। इस दिशा में सरकार को भी आम जन का सहयोग करना चाहिए। अभी आम जनता सरकारी जमीन पर तालाब और जोहड़ बनाकर वॉटर रिचार्ज नहीं कर सकती है। सिंचाई विभाग के इरिगेशन ड्रेनेज एक्ट 1954 के तहत किसी को भी पानी का संरक्षण नहीं करने दिया जाता। सरकारें वॉटर रिचार्ज और भूजल स्तर बढ़ाने की सिर्फ बातें करती हैं लेकिन जो व्यावहारिक कदम हैं, वे नहीं उठाए जाते हैं। नागरिकों को भी अपने परिवारों में पानी के अधिकतम सदुपयोग के संस्कार डालने होंगे। भविष्य में जल संकट से रूबरू न होना पड़े, इसके लिए नई पीढ़ी को पानी की महत्ता समझाना जरूरी है।

? नरेन्द्र देवांगन