संस्करण: 30 जून-2014

व्यापमं घोटाला-

एक तार्किक अंत की प्रतीक्षा

? दिग्विजय सिंह

           मैं मध्य प्रदेश में हुये व्यापम घोटाले का मुद्दा काफी समय से उठाता आ रहा हूँ किन्तु मध्य प्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग ने उसे दबाने के लिये भारी धानराशि खर्च की और लगभग एक सप्ताह पूर्व तक इस विषयक समाचार को सफलतापूर्वक दबाये रखा।

           किन्तु भाजपा के पूर्व मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा के गिरफ्तार होने से यह घोटाला अन्तत: मीडिया के सामने आ गया। उमा भारती इसे बिहार के चारा घोटाले से भी बड़ा घोटाला कह चुकी है और सीबीआई जांच की मांग करती आ रही है। किन्तु मध्य प्रदेश सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने से इंकार कर दिया।

           इस मामले को लेकर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में सितंबर 2013 में दायर सभी 45 जनहित याचिकाओं में न्यायालय द्वारा अप्रैल 2014 तक कोई भी दृश्य कार्यवाही नही की गई। अब उन सभी जनहित याचिकाओं को माननीय उच्च न्यायालय ने निपटा दिया है और न्यायालय द्वारा स्वयं ही एक जनहित याचिका पंजीकृत की गई है जिसमें माननीय मुख्य न्यायाधीश एस.टी.एफ. द्वारा की जा रही जांच की व्यक्तिगत रूप से निगरानी कर रहे है।

           यद्यपि एस.टी.एफ. के प्रमुख एक बहुत ही सक्षम पुलिस अधिकारी है किन्तु अन्तत: वे  मुख्यमंत्री के ही प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहे है। जबकि मुख्यमंत्री स्वयं या फिर उनके परिवार के सदस्य व्यापम घोटाले की जांच में आरोपी हो सकते है। एस.टी.एफ. ने दो बार लक्ष्मीकांत शर्मा से पूछताछ कर ली थी और उन्हे स्पष्ट रूप से दबाव के कारण छोड़ दिया था।  सिर्फ अब उन्हे गिरफ्तार किया गया है।

            दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद मुख्यमंत्री ने व्यापम घोटाले की जांच की समीक्षा के लिये एक बैठक ली, जिसमें एस.टी.एफ. के अधिकारी, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक भी मौजूद थे। यह जानकारी मिली है कि उन्होने बैठक में एस.टी.एफ. के प्रति अपनी नाराजी जाहिर की है।

            इतने बड़े घोटाले की जांच में क्या यह एक खुला हस्तक्षेप नहीं है, जिसमें कि प्रभावशाली राजनेताओं, नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के विरूध्द जांच की जा रही है? क्या मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश इस पर ध्यान देंगे?

            मुझे ज्ञात हुआ है कि इस मामले की सुनवाई कैमरे के सामने की जा रही है। ऐसे संवेदनशील मामले में सार्वजनिक सुनवाई होनी चाहिये। मैं इस मामले की सार्वजनिक सुनवाई के लिये माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय से पुरजोर मांग करता हूँ।

            प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता एक बड़ा व्यापार बन गया है और अब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ राजस्थान, गुजरात,दिल्ली, हरियाणा और बिहार इसके सबूत है, जिनसे इस मामले की जांच सी.बी.आई. को सौंपा जाना औचित्यपूर्ण साबित होता है। लेकिन मुझे दृढ़ विश्वास है कि म.प्र. सरकार ऐसा नही करेगी।

            मुझे मालूम पड़ा है कि बाजार में अब ऐसी कमीज मिलती है जो ब्लूटूथ,के साथ सिली होती है छोटे ईयरफोन, और सिम कार्ड के साथ बाजार में उपलब्ध हैं! परीक्षार्थी इन्हे परीक्षा हॉल में ले जा सकता है एवं परीक्षक को पता चलने दिये बगैर वह बाहर के लोगों से बात कर सकता है।

           ऐसी जानकारी मिली है कि कुछ टीमें प्रवेश परीक्षाओं में पास कराने में विशेषज्ञता प्राप्त है, यहाँ तक कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में भी! जब शक की सुई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, उनके परिवार और अन्य प्रभावशाली लोगों की ओर इशारा कर रही है तो एस.टी.एफ. को निरूत्साहित करने के समस्त प्रयास मीडिया के माध्यम से किये जा रहे है। रणनीति सरल है। जनसम्पर्क विभाग के माध्यम से एसटीएफ की पूर्ण मनमानी की कहानियां गढ़ना।

            मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक ने क्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षकों को उन छात्रों और उनके माता-पिता को गिरफ्तार करने के आदेश दिये है जो अनजाने में इन घोटालेबाजों के शिकार हुये है। यहाँ तक कि व्यापम परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण हो गये छात्रों को भी पुलिस द्वारा पकड़ा जा रहा है। एक लड़की जो परीक्षा में बैठी भी नही थी उसे भी गिरफ्तार किया गया है।

            सारे छात्र जो अप्रत्याशित रूप से घोटालेबाजों के शिकार बन गये है उन्हे सरकारी गवाह बनाना चाहिये न कि आरोपी। चूँकि उन्होने यह सोचा था कि यह सब व्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा है। जिन छात्रों को गिरफ्तार किया जा चुका है और जो अभी फरार है उन्हे निडर होकर उन लोगों के नाम बताने चाहिये जिन्होने उनके साथ धोखा किया। घोटाले को रचने वाले अपराधी है, न कि छात्र और उनके परिवार के सदस्य। मध्यप्रदेश पुलिस जो एस.टी.एफ. का हिस्सा नही है, के द्वारा छात्रों को बेतरतीब ढंग से इसलिये गिरफ्तार किया जा रहा है जिससे कि जांच में गड़बड़ी की जा सके और एस.टी.एफ. द्वारा की जा रही जांच की विश्वसनीयता को समाप्त किया जा सके।

           यह लक्ष्मीकांत शर्मा से की जा रही पूछताछ से एस.टी.एफ. का ध्यान हटाने के लिए भी किया गया है जो इस मामले में अनेक भेद खोल सकते है। सुधीर शर्मा जो पूरे घोटाले के मास्टर माइण्ड है, वह फरार है। घोटाले के मुख्य संचालकों में से एक दीपक यादव फरार है।

           इन्दौर मेडीकल कालेज में एम.बी.बी.एस. के तृतीय वर्ष का जीनियस छात्र मोहित चौधरी जिसने परीक्षा हॉल में प्रश्नपत्र को स्केन करने के लिये ब्लूटूथ वाले स्केनर का इस्तेमाल किया था और उसे बाहर भेजकर वहाँ से सभी सही जवाब प्राप्त कर लिये थे, वह भी फरार है। भरत मिश्रा जिसके इन घोटाले से गहरे तार जुड़े हुये है वह भी अब तक फरार है।

          बस, अभी के लिये इतना ही काफी है। आगे और भी है । अब सभी की निगाहें मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय और एस.टी.एफ. पर है कि क्या वे इस मामले को तार्किक अंजाम तक पंहुचा सकेंगे?

          ओमप्रकाश चौटाला अवैध रूप से 300 शिक्षकों की भर्ती के लिए जेल में है। रशीद मसूद गलत तरीके से मेडिकल कॉलेज में एक छात्र के दाखिले की सिफारिश करने के लिए जेल में है। अब इस बहुत ही विशाल और व्यापक घोटाले के मास्टर माइंड की गति क्या होगी, यह समूचा राष्ट्र देख रहा है।

? दिग्विजय सिंह