संस्करण: 30  जुलाई-2012

चीन ने फिर से भारत को पीछे छोड़ा.......

किन्तु इस बार भ्रष्टाचार में।

? स्वामीनाथन एस.अंकलेसरिया अय्यर

                 सुहृद पूंजीवाद से आशय एक ऐसी अर्थव्यवस्था से है जिसमें व्यवसाय की सफलता सरकारी तंत्र में बड़े पदों पर बैठे लोगों  के साथ व्यवसाई के रिश्तों पर निर्भर करती है। भारत में सुहृद पूॅजीवाद (Crony Capitalism) और पश्चिमी देशों में मात्र एक प्रतिशत बड़े लोगों के पास सत्ता/ताकत होने से नाराज,कुछ विश्लेषक तथाकथित बीजिंग सर्वसम्मति या चाइना मॉडल का पक्ष लेते हुये उसकी तारीफ करते हैं। किन्तु मुझे यह कहते हुये खेद है कि चीन में अन्य देशों की तुलना में अधिक सुहृद पूॅजीवाद है।

                फाइनेंशियल टाइम्स के द्वारा हाल ही में किया गया अध्ययन दर्शाता है कि बड़ी संख्या में चीनी राजनेताओं के परिजन अरबपति बन गये है। प्रमुख बड़े चीनी राजनेताओं के बच्चे जो प्रिंसलिंग कहलाते है इतने अधिक धनी हो गये है कि भारतीय राजनेताओं के प्रिंसलिंग उनके समक्ष बोने दिखाई देते है।

                वेन युनसांग, जिसका उपनाम विंस्टन है, प्रधानमंत्री वेन जियाबाओं का पुत्र है। उसकी कंपनी ''चाइना सेटेलाइट कम्यूनिकेशन्स''का लक्ष्य 2015 तक 15 सेटेलाइट और 2.5 बिलियन डॉलर की वार्षिक कमाई के साथ एशिया की सबसे बड़ी सेटेलाइट ऑपरेटर कंपनी बनने का है। अधिकतर प्रिंसलिंग्स की तरह अमेरिका में शिक्षित इस युवक ने अपनी प्रथम कंपनी ''न्यू होराइजन केपीटल''को कैमन आइलेण्ड में स्थापित किया जो कि एक टैक्स हेवन है।  उसने डच बैंक, जे.पी. मोर्गन, चेस और यू.बी.एस. जैसे बड़े व्यवसायियों से 2.5 बिलियन डॉलर की राशि जुटाई। क्या यह चीन के किसी ऐसे युवा व्यवसाई के लिये संभव था जो किसी राजनेता से न जुड़ा हो? कदापि नही।

                  एक प्रमुख विदेशी निवेशक का कहना है --''विंस्टन व्यवसाय प्राप्त करने के लिये अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि का निरंकुश तरीके से उपयोग करता है। यदि विंस्टन किसी सौदे के लिये बोली लगा रहा है,तो हम उसमें हाथ डालने की कोशिश भी नही करते--हम बड़े प्रिंसलिंग के साथ मुकाबला करने से बचने की कोशिश करते है।''

                 प्रधानमंत्री की पत्नी झांगबेली ज्वेलरी और प्रापर्टी के व्यापक व्यवसायं पर नियंत्रण रखती है। फाइनेशियल टाइम्स ने विकीलीक्स के एक दस्तावेज के हवाले से लिखा है जिसमें एक महिला अपने बच्चों को कह रही है --''सही कीमत पाने के लिये ही काम करो।''

               चीनी राष्ट्रपति हू जिन्ताओ के रिश्तेदार भी ताकतवर है। उनका बेटा हू हैफेंग पूर्व में सरकारी कंपनी ''न्यूटेक'' का अधयक्ष था जो सिक्योरिटी स्केनर बनाती है। जैसे ही उसने कंपनी का काम संभाला तो कंपनी को बाजार में वास्तविक एकाधिकार दे दिया गया। 2008में वह ''त्सिंगुआ होल्डिंग्स''कंपनी में चला गया जो न्यूटेक सहित 20 कंपनियों पर अपना नियंत्रण रखती है।

                 उसकी बहन का विवाह डेनियल माओ से हुआ है। यह युवक एक बार सिना डाट कॉम का प्रमुख भी रह चुका है  जो चीन के सबसे बड़े वेब पोर्टलों में से एक है। 2003 की स्थिति में उसकी अनुमानित व्यक्तिगत संपत्ति 35-60 मिलियन डॉलर थी।

               एक पूर्व चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन ने भी कई करोड़पतियों को जन्म दिया है। वर्ष 2000 में उनका बेटा जियांग मेनहेंग ने ''ग्रेस सेमीकंटक्टर''नामक कंपनी की स्थापना की जो चीन की पहली माइक्रोचिप कंपनियों में से एक है। इस कंपनी में ताइवान के प्रमुख शक्तिशाली उद्योगपति के बेटे की भी हिस्सेदारी थी। आज वह ''शंघाई अलायंस इन्वेस्टमेंट'' का मालिक है जिसकी कई बड़ी चीनी कंपनियों में हिस्सेदारी है। जियांग जेमिन का पोता जियांग झीचेंग 2010 में ''गोल्डमेन सेच्स'' के लिये काम कर चुका है। वह अब ''बोयू केपीटल एडवाइजरी'' नामक कंपनी में काम करता है।

                 अधिकतर राजनेताओं की संतानों के पास पश्चिमी विश्वविद्यालयों से प्राप्त आकर्षक डिग्रियाँ है। इनमें से बहुत सारे प्रतिभाशाली हो सकते है, किन्तु किसी को यह भरोसा नही है कि अकेली प्रतिभा के दम पर उन्होने इतनी तेजी से विकास किया हो। इसमें उनके पारिवारिक संबन्धों का बहुत बड़ा योगदान है।

                प्रमुख राजनेता दावा करते है कि उनका अपने संबन्धियों के व्यवसायों से कोई संबन्ध नही है। किन्तु एक प्रसिध्द राजनयिक का कहना है -''प्रत्येक चीज को कुछ सौ ताकतवर परिवारों द्वारा नियंत्रित की जाती है..... अधिकांश विदेशी कंपनियाँ चीनी अधिकारियों के लड़के और लड़कियों को भर्ती कर रही है जिससे कि वे उन्हे माधयम बनाकर शासन में बैठे लोगों तक पंहुचकर अपना व्यवसाय कर सकें।''

                 बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अक्सर राजनेताओं की संतानों के साथ मिलकर संयुक्त कारोबार शुरू करती है, जो होल्डिंग कंपनियों के माधयम से हांगकांग या केरिबियन टैक्स हेवन्स में जाकर अपना हित साधते है। इन टैक्स हेवन्स द्वारा उन्हे व्यवसाय के रहस्यों को छिपाने में मदद की जाती है।

                परामर्श शुल्क अक्सर दुबई या हांगकांग में भुगतान की जाती है। अनुबंधों को बारंबार लाल कागजों श्पर लिखा जाता है, क्योंकि लाल पन्नों से की गई फोटोकॉपी या स्केन काला हो जाता है और वह पड़ने योग्य नही रहता। इससे उनके काले कारनामों का भंडाफोड़ होने की संभावनाएं बहुत कम हो जाती है।

                 राजनेताओं के उत्तराधिकारी या प्रिंसलिंग्स मोटी परामर्श फीस से लंबे समय तक संतुष्ट नही रहते है --''बड़े परिवार निजी हिस्सेदारी में पड़ना चाहते है अथवा स्वयं व्यवसाय करना चाहते है क्योंकि यहीं से उन्हे वास्तविक धन मिलता है।''

                जब डेंग जियोपिंग ने चीन में व्यापारिक सुधारों की शुरूआत की, तब उन्होने कहा था -''धनवान होना सुखद और शानदार है।'' उसका तात्पर्य यह था कि निर्माणकारी व्यवसायों को शानदार तरीके से समृध्द होना चाहिये। किन्तु उनकी पार्टी के सहयोगी पारिवारिक धनाढयता में अतुल्य शान पा चुके है। एक बड़े तथा जिम्मेदार अधिकारी का कहना है -''1990 में जब चीन का निजी क्षेत्र आकाश में ऊॅंची उड़ान भर रहा था तो कुछ प्रमुख राजनेताओं ने अपने प्रिंसलिंग्स पर लगाम लगाने की कोशिश की थी किन्तु अब उनके लिये कोई अवरोध नही है।''

               स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राजनेताओं के समस्त कार्यों का लक्ष्य आदर्श स्थापित करना होता था, धन कमाना नही। किन्तु एक समय में उनके रिश्तेदार भी उनके कार्यालय में प्रभावकारी बन गये। आज लोग राजनीति में सिर्फ पैसे बनाने के लिये ही प्रवेश करते है। राजनीतिक वंशों के उदय से किसी को आश्चर्य नही होना चाहिये : वे एक दूसरे नाम से व्यावसायिक घराने ही है।

                भारत में भी राजनेताओं के बेटे और रिश्तेदार अक्सर विदेशी डिग्रियों की डींग हाँकते है और उच्च तकनीकी कौशल से युक्त होने का दावा करते है। यहाँ भी बड़े व्यावसायिक घराने इन नेताओं के परिजनों को राजनीतिक समर्थन और प्रभाव प्राप्त करने के लिये अपनी कंपनियों में काम पर रखते है। किन्तु हमारे यहाँ प्रिंसलिंग्स या नेताओं के बेटों के बड़े व्यवसायी बनने के कुछ ही मामले है।

               किन्तु चीन में भ्रष्ट प्रिंसलिंग्स के होने जैसे मामूली तथ्य से भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार कम नही हो जाता है। यह भारत में भ्रष्टार के विरोध में किये जा रहे प्रयासों को कम करने का कोई बहाना नही है। हाँ, मुझे संदेह है कि अधिकतर पाठक प्रिंसलिंग्स अथवा राजनेताओं के पुत्रों की कलाई खुलने पर मेरी तरह प्रसन्न होंगे। जर्मन लोग ऐसी प्रसन्नता को शेडेनफ्रूड कहते है जिसमें दूसरे के कष्टों को देखकर प्रसन्नता का अनुभव होता है। चीन के द्वारा भारत को एक के बाद दूसरे मामले में लगातार पीछे छोड़ना शर्मनाक है, किन्तु भ्रष्टाचार के मामले में चीन के हमसे आगे निकल जाने पर हम जरूर खुशियाँ मना सकते है।


? स्वामीनाथन एस.अंकलेसरिया अय्यर