संस्करण: 30  जुलाई-2012

सोने का अण्डा देने वाली

मुर्गी का पेट मत काटो (पशु वध रोको)

? डॉ. राजश्री रावत 'राज'

                 नुष्य और पशु एक दूसरे पर आश्रित और एक दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य यदि एक पशु को पालता है तो वह पशु मनुष्य के पूरे परिवार को पालता है अनेकों सेवाऐं करता है।

                राजस्थान के गड़रियों के बारे में लोकोक्ति है कि वहां के लोग भेड़े पालते हैं। क्योंकि उनसे प्राप्त घी, दूध, ऊन आदि के व्यापार से ही इनका काम चलता है। भेड़ के दूध को तो विशेषज्ञों ने फेफड़े के वंशानुगत रोगियों तक के लिए लाभ प्राप्त है। अर्थात वास्तविकता यह है कि उनकी भेड़े ही इनको पालती हैं।

                 एक तांगेवाला एक घोड़े के सहारे अपने परिवार का पालन पोषण करता था। अनेक लोग जानवरों के सहारे अपनी रोजी रोटी कमाते हैं। अपनी पूरी उम्र इन पशुओं के सहारे व्यतीत कर लेते हैं। बैलों के सहारे किसान आज भी खेती करते हैं। बैलगाड़ियों से अपना अनाज लाने ले जाते हैं।

                भारत के अधिकृत बूचड़खानों में 30 लाख पशु प्रति वर्ष काटे जाते हैं। अन्य अनधिकृत बूचड़खानों में इसके अतिरिक्त संख्या में पशु काटे जाते हैं। इतने पशुओं को प्रतिवर्ष काटने का अर्थ प्रति वर्ष एक करोड़ टन गोबर और मूत्र अर्थात करीब 2करोड़ टन उस प्राकृतिक खाद को खोना है जिसके उत्पादन में कोई पैसा नहीं लगता जो मुफ्त प्राप्त हो जाती है।

                 अनाज की कीमतों में लगातार वृध्दि का एक कारण रासायनिक खाद का महंगा होना भी है। यदि रासायनिक खाद की जगह गोबर की मुफ्त प्राप्त होने वाली खाद प्रयोग में लाई जाये तो अनाज के दाम काफी कम हो सकते हैं। और राष्ट्र को खाद्य उद्योग को प्रति वर्ष जो भारी अनुदान देना पड़ता है वह भी बचेगा।

               एक गाय कितने मनुष्यों को आहार देती है इसका अनुमान लगाया जाये तो पता चलता है एक गाय 10 किलो दूध प्रतिदिन के हिसाब से औसत 10 महीने तक दूध देती है तो वह एक वर्ष में 3000 किलोग्राम दूध देकर करीब 6000 व्यक्तियों को एक बार तृप्त कर सकती है। किन्तु यदि उसकी हत्या कर उसका मांस का आहार किया जाये तो 1000 व्यक्तियों को भी एक बार तृप्त नहीं कर सकती है। यही बात बकरी आदि के साथ भी है।

                 इसी प्रकार एक बैल अपने जीवन काल में कम से कम 4000 कि.ग्रा. अन्न उत्पन्न कर करीब साठ हजार व्यक्तियों को एक बार तृप्त कर सकता है। इसके अलावा गाड़ी, सवारी, भार ढोने आदि की सेवा अलग से करता है। इन पशुओं की गोबर से इंधन, खाद, गैस,ऊर्जा आदि की जो अतिरिक्त प्राप्ति होती है उन सबका यदि हिसाब लगाया जाये तो यह प्रकट होता है कि ऐसे पशुओं का वध कितना नुकसानदेह हैं। या दूसरे शब्दों में उनसे जो लाभ प्राप्त होता है वह ऐसा है जैसे कोई चाय बनाने के लिए नोट जलाकर लाभ प्राप्त करे या नित्य सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट काटना कितनी बड़ी समझदारी हो सकती है।

             जल को साफ रखने में मछलियों की भूमिका से अधिकांश लोग परिचित हैं। मलेरिया उन्मूलन प्रोग्राम में मच्छरों को नष्ट करने के लिए पोखरों व गंदे पानी के संग्रहित जगहों पर मछली पालन इसलिए ही किया जाता है। ये मछलियां मच्छरों को प्रारंभिक अवस्था में अर्थात लाखा की अवस्था में ही नष्ट कर देती हैं व पर्यावरण को दूषित करने से रोकती हैं।

             उल्लू फसल की रक्षा करने में कीटनाशकों की तुलना में अधिक सक्षम हैं। ढाका विश्वविद्यालय के प्रो. सरकार के अधययन के अनुसार एक उल्लू प्रतिदिन कम से कम दो चूहे और फसल नष्ट करने वाले कीड़े मकोड़े खा जाता है। इस प्रकार उल्लू एक खेत में तीन हजार डालर मूल्य के चावल की सुरक्षा करता है।

              एक रिसर्च के अध्ययन के अनुसार पशु जगत हमारी राष्ट्रीय संपदा में 25000 करोड़ रु. दूध, खाद, ऊर्जा व भार उठाने की सेवा से अपना पसीना बहाकर हमारे राष्ट्र को देते हैं। इसके अतिरिक्त इनके मरने के उपरांत इनका चमड़ा, हड्डियां, अलग उपयोग में आती हैं। हमें तो इन पशुओं का कृतज्ञ होना चाहिए जो हमें इतनी संपदा देते हैं और हमारी सेवा करते हैं। इनके उपकार के बदले यदि इन्हें पशुवध गृह भेजा जाये तो यह कृतघ्नता नहीं तो और क्या है ?

             पशुवध रोकने उपरोक्त प्रत्यक्ष लाभ के अतिरिक्त जो अप्रत्यक्ष लाभ हैं वे भी कम नहीं हैं। सस्ती खाद मिलने पर सस्ता अनाज होने से गरीब को भी भरपेट भोजन मिलेगा,जिससे कुपोषण से होने वाले रोग घटेंगें व उनकी दवाइयों पर होने वाला खर्च बचेगा। अनाज सस्ता होने से महंगाई सूचकांक गिरेगा। मजदूर आंदोलन,हड़तालें कम होंगी। जिससे उत्पादन बढ़ेगा व कीमतें कम होंगी। उत्पादन बढ़ने से राष्ट्रीय आय में वृध्दि होगी और राष्ट्र को विदेशी कर्जों के लिए हाथ नहीं फैलाना होगा।

              अत: पशुवध रोकना केवल एक धार्मिक, नैतिक या दया की बात नहीं है, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक उन्नति व स्वास्थ्य रक्षा हेतु परम आवश्यक भी है। केवल पशुवध रोककर ही हम हमारी सभी समस्याओं को हल कर देशवासियों का जीवन स्तर सुधार सकते हैं।

                यदि हम अपनी सुरक्षा और प्रसन्नता चाहते हैं तो हमें दूसरों की सुरक्षा और प्रसन्नता का भी ध्यान रखना होगा अन्यथा प्रकृति का दण्ड देने का अपना ही नियम है। जिस प्रकार पेड़-पौधों को काटकर जंगल नष्टकर मनुष्य ने पर्यावरण संतुलन पूरी तरह बिगाड़ दिया है और अब हम पर्यावरण बचाने हेतु वन रक्षा और पेड़-लगाओ आंदोलन पर अपनी पूरी शक्ति लगा रहे हैं उसी प्रकार हमें अपने अस्तित्व और पर्यावरण और पारिस्थितिक संतुलन को कायम रखने के लिए एक दिन ऐसा आयेगा कि हमें पशु-पक्षी बचाओ आंदोलन करना पड़ेगा। इस कार्य में जितनी देर होगी उतनी ही अधिक हानि होगी।

               
? डॉ. राजश्री रावत 'राज'