संस्करण: 30 जनवरी- 2012

भाजपा : नेता हैं या पोरस के हाथी ?

? सुनील अमर

                 उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक आते ही भारतीय जनता पार्टी के अंतर्विरोध एक-एक कर यूँ सामने आने लगे हैं जैसे राजे-रजवाड़ों के समय में उनके अंत:पुर के षडयंत्र उद्धाटित हुआ करते थे। दिल्ली से लेकर राज्यों तक भाजपा की पिछले कुछ समय की गतिविधियों को देखने-समझने पर ऐसा लगता है जैसे इसका हर बड़ा नेता अपना मनोरथ पूरा करने के लिए बेहद जल्दबाजी में हो। इस पार्टी के प्रथम पंक्ति के तमाम नेता अगर प्रधानमंत्री बनने को उतावले हैं और रोज बयानबाजी करते फिर रहे हैं तो इसके प्रदेश स्तर के बड़े नेता मुख्यमंत्री बनने के लिए। उत्तर प्रदेश जैसा राज्य जो इसकी राजनीतिक उड़ानों के लिए कभी हवाई अड्डा सरीखा महत्त्व रखता था आज ऐसी धमाचौकड़ी का शिकार हो गया है कि इस पार्टी के वे नेता जो जमीन से जुड़े हैं तथा देश-प्रदेश की राजनीतिक नब्ज की जिन्हें समझ है, अब मीडिया वालों से बचकर रहने लगे हैं। इस पार्टी के एक पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ऐन चुनावों के दौरान प्रदेश के कई वरिष्ठ नेताओं को धकियाते हुए अपने पुत्र को प्रदेश महासचिव ही घोषित करवा दिया। टिकट कटने, दागियों-बाहरी नेताओं को लेने तथा मनपसंद स्थान का टिकट न पाने के कारण पहले से ही दु:खी पार्टीजनों में इससे बेहद असंतोष फैल गया है और यह आलेख लिखे जाने तक पार्टी के तीन वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था।

                सभी जानते हैं कि वर्ष 1991 के बाद से उत्तर प्रदेश भाजपा की स्थिति में लगातार गिरावट आ रही है। कभी जिन मुद्दों के सहारे यह हिन्दू जनमानस को उद्वेलित किया करती थी उन मुद्दों से एक-एक कर इसने किनारा कर लिया। और तो और, जिन कारणों से यह खुद को अन्य राजनीतिक दलों से अलग और पवित्र बताया करती थी उन कारणों को भी खो दिया। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दौड़ में आज यह एक पिछड़ी हुई पार्टी बनकर रह गई है। ताजा हालात यह हैं कि राष्ट्रीय स्तर के इसके तमाम नेता एक लम्बे अरसे से खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बता रहे हैं तो प्रदेश के बड़े नेता किसी भी तरह पार्टी को सत्ता के करीब लाकर मुख्यमंत्री बनने का जुगाड़ लगा रहे हैं। यही कारण है कि न सिर्फ अन्य दलों के बर्खास्त और निष्कासित नेताओं को भाजपा ने गले लगा लिया है बल्कि तमाम दागी और कुख्यात अपराधी भी पार्टी में समाहित हो गये हैं। छोटे नेताओं की बात छोड़ दीजिए, इसके बड़े नेता ही इस पार्टी की जड़ में मठ्ठा डालने के काम में लगे हुए हैं।

                पुत्रों को चुनावी टिकट या संगठन में बड़ा पद दिलाने से काफी पहले से ही भाजपा के बड़े नेताओं का रवैया बहुत स्वैच्छाचारिता का रहा है। वयोवॄध्द श्री आडवाणी ने हमेशा की तरह अपनी मर्जी से रथयात्रा की घोषणा कर दी तो कुछ दिनों बाद संघ ने जबरन न सिर्फ उसका दायरा सीमित कर दिया बल्कि श्री आडवाणी को नागपुर बुलाकर चेता भी दिया कि आप प्रधानमंत्री पद के दावेदार अब नहीं हैं। मजबूरन आडवाणी ने अपने यात्रा मार्ग में से अयोधया और सोमनाथ को निकाल दिया। यह गौर तलब है कि लगभग इसी के बाद भाजपा के कई राज्य स्तरीय नेताओं के बयान आये कि वे भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हैं। प्रधानमंत्री पद को पाने की नौबत शायद 2014 में आये लेकिन लठ्ठम-लठ्ठा अभी से मचा है और राज्यों में, जहॉ मजबूत होने पर ही केन्द्र की दावेदारी बन सकती है, पार्टी को मजबूत करने की रुचि किसी को नहीं है।

                जिन पॉच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं उनमें सबसे विकट स्थिति में भाजपा उत्तर प्रदेश में ही है। समाजवादी पार्टी के शासनकाल से त्रस्त होकर मतदाताओं ने वर्ष 2007 में बसपा को जिता दिया था लेकिन पॉच साल बीतते न बीतते बसपा, सपा से भी गई-गुजरी साबित हुई और इसने लूट-खसोट के कई नये और भारी आख्यान लिख दिये। भाजपा उत्तर प्रदेश में तीसरे नम्बर की पार्टी थी। स्वाभाविक ही था कि इस बार यह सत्ता की दावेदार बनती। समाजसेवी अन्ना हजारे और योगी रामदेव के प्रकरणों से ऐसा लगा भी कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कॉग्रेस को घेर रही यह पार्टी उत्तर प्रदेश में भी बसपा को घेरेगी और इस चुनाव में एक विकल्प बनकर उभरेगी लेकिन इसके नेताओं का कमाल देखिए कि आज यह पार्टी भ्रष्टाचारियों को गले लगाने के मुद्दे पर जवाब तक नहीं दे पा रही है। संगठन के स्तर पर हालात यह हैं कि लगता ही नहीं कि कोई एक शीर्ष पदाधिकारी यहॉ ऐसा है जिसके नियंत्रण में पार्टी संगठन हो। कब किस नेता को कहॉ से लाकर सबके उपर थोप दिया जाय, कहा नहीं जा सकता।

                प्रदेश में इस बार का चुनाव पिछड़ा और मुस्लिम के संयुग्मन पर लड़ा जा रहा है और सभी राजनीतिक दलों में इस संयुग्मन को प्रभावित करने की होड़ लगी हुई है। पिछड़ा वर्ग, विशेषकर कुर्मी या पटेल मतदाता एक लम्बे अरसे या यों कहें कि अयोधया आंदोलन के दौर से ही भाजपा के साथ रहे हैं और यही कारण है कि भाजपा में कई नेता इस वर्ग से निकल कर राष्ट्रीय फलक तक आये हैं। यह अच्छा होता कि प्रदेश के ऐसे नेताओं में से ही किसी को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जाता लेकिन कल्याण सिंह फैक्टर से निपटने के फेर में उमा भारती को वापस लाकर पहले तो सभी नेताओं के उपर थोपा गया और फिर उन्हें भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर दिया गया जबकि पिछड़े वर्ग के नेता के तौर पर विनय कटियार और ओमप्रकाश सिंह जैसे नेता पहले से ही मौजूद हैं। ओमप्रकाश सिंह को तो पिछले पॉच वर्षों से पार्टी का भावी मुख्यमंत्री बताया जा रहा था! अनुमान लगाया जा सकता है कि भाजपा का पिछड़ा वर्ग समीकरण कैसे हल होगा! भाजपा के तमाम बड़े नेता मसलन राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, केसरीनाथ त्रिपाठी, सूर्य प्रताप शाही व डॉ. रमापतिराम त्रिपाठी जैसे दिग्गज पूर्वी उत्तर प्रदेश से आते हैं यद्यपि पार्टी का सबसे बुरा हाल इसी क्षेत्र में है। काफी समय से राजनाथ सिंह,कलराज मिश्र और सूर्यप्रताप शाही को भी भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जा रहा था। यह समझा जा सकता है कि अब इन नेताओं की मन:स्थिति कैसी होगी। टिकट बॅटवारे को लेकर भाजपा सबसे पिछड़ी हुई पार्टी साबित हुई क्योंकि कई बड़े नेता अपने पुत्रों को अच्छी सीटों से टिकट दिलाने की कोशिश में अड़ंगेबाजी कर रहे थे। ऐसा हुआ भी है। जहॉ नहीं हो पाया वहॉ नेता पुत्रों को खुश करने के अन्य उपाय भी तलाशे गये हैं। राजनाथसिंह के पुत्र पंकज सिंह को प्रदेश मंत्री से महामंत्री बनाया जाना इसी क्रम में है। आत्ममुग्ध भाजपाइयों को अगर छोड़ दीजिए तो शायद ही कोई यह कहने वाला हो कि भाजपा सत्ता में वापस आ रही है उल्टे तमाम प्रेक्षक तो यह कयास भी लगा रहे हैं कि इस बार भी अगर भाजपा 2007 जैसी हालत में रही तो शायद विखंडित होकर सत्ता बनाने वालों के काम आ जाय! फिर भी देखिए कि कैसे सब प्रधानमंत्री बनना चाह रहे हैं, मुख्यमंत्री बनना चाह रहे हैं, सबको बढ़िया सीट का टिकट चाहिए नहीं तो पार्टी का बड़े से बड़ा पद चाहिए! लगता नहीं कि ये सब पोरस के हाथी हो गये हैं?

 
? सुनील अमर