संस्करण: 30 जनवरी- 2012

यह है मध्यप्रदेश की बड़बोली सरकार का हाल

पिछली माली साल के बजट के 27सौ करोड़ रु खर्च नहीं हुए

? राजेन्द्र जोशी

               विकास और जनकल्याण के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का अपनी ही मुखारबिन्द से ढिंढोरा पीटने वाली मध्यप्रदेश सरकार की हकीकत यह है कि वह अपने निर्धारित वार्षिक बजट की शत-प्रतिशत राशि भी खर्च नहीं कर पाती है। बात तो इतनी बड़ी-बड़ी की जाती है कि सुन-सुनकर आश्चर्य भी होने लगता है। जिस अनुपात में मंत्रियों के दौरों में,आम सभाओं में और विभिन्न समारोहों में विकास और निर्माण कार्यों की घोषणाएं निरंतर होती जा रही है उस अनुपात में वे जमीन पर नहीं उतर पा रही हैं। यदि इन सभी घोषणाओं के आधार पर विभिन्न कार्यों पर अनुमानित खर्च का जोड़ लगाया जाय तो वह प्रदेश के वार्षिक बजट के प्रावधान से बहुत ही ज्यादा हो सकता है। लगता है आम सभाओं की भीड़ को देखकर माननीय मंत्रीगणों को घोषणाएं करने का जोश आ जाता है। अनेक घोषणाओं का ऐसा कुछ हश्र हो जाता है कि आम जनता जिन घोषणाओं पर अपने जिन दोनों हाथों से तालियां बजाती है,घोषणाओं को जमीन पर नहीं देखकर उन दोनों हाथों से बेचारे आम लोग अपना सिर पकड़कर बैठे देखे जाते हैं।

                 घोषणाओं में यह जुमला बड़े जोश-खरोश के साथ और तालियों की गड़गड़ाहट और जिन्दाबाद के नारों के बीच बोला जाता है कि 'विकास के काम में धन की कोई कमी नहीं आने दी जायगी।किसी भी विभाग से संबंधित घोषणाऐं नहीं हो, कहां यही जाता है कि बजट की कमी हैं। हाल ही में राज्य योजना मंडल की एक समीक्षा बैठक में यह पाया गया कि राज्य सरकार के अनेक विभागों में वर्ष 2010-11 के लिए आवंटित बजट की राशि पूरी-पूरी खर्च ही नहीं हो पाई। समीक्षा बैठक में यह बात उजागर हो पाई। समीक्षा बैठक  में यह बात उजागर हुई कि कतिपय विभागों  की कुल 27सौ करोड़ रु. की राशि सरकार खर्च ही नहीं कर पाई। एक तरह से इसमें विरोधाभास ही लगता है कि एक तरफ तो कहा जाता है कि विकास कार्यों में पैसों की कमी नहीं आने दी जायगी। दूसरी तरफ बजट की निर्ारित राशि भी खर्च नहीं हो पा रही है। इससे एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि जिस अनुपात में वार्षिक बजट में बढ़-चढ़कर राशि का प्रावधान तो रख दिया जाता है किंतु उस अनुपात में  सरकार अपनी ही घोषणाओं के मुताबिक कार्यों को अंजाम नहीं दे पा रही है।

               अब जनता काफी जागरूक हो गई है। वह सब समझने लगी है कि उसे कब, कहां और कैसे-कैसे प्रलोभनों से बरगलाया जा रहा है। जनता की नज़र जहां घोषणाओं पर टिकी है, वहीं वह सरकार के प्रत्येक बड़बोलेपन का भी अर्थ लगाने लगी है। आम जनता अक्सर राज्य सरकार के भाग्य विधाताओं के मुख से अक्सर सुनती है कि बिजली, सड़क, खाद, बीज या शिक्षा स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार इसलिए पिछड़ी हुई है क्योंकि केन्द्र सरकार उन्हें असहयोग करती है और उनके विकास के पथ में अडंग़े डाल रही है। वह केन्द्र सरकार से विकास और जनकल्याण में प्रत्येक कामों के लिए पैसा ही मांगती रहती है। प्रदेश की आम जनरता भी समझ चुकी है कि सरकार का बड़बोलापन केवल प्रचार तक ही सीमित हो गया है। अपनी हर असफलताओं के लिए केन्द्र को कोसकर उसके सिर पर ठीकरा फोड़ना एक तरह से शगल का रूप ले चुका है।एक देहाती के मुंह से जब यह सुना कि हमने तो अपनी भलाई के लिए प्रदेश सरकार के प्रतिनिधियों को चुना है,अब उनका दायित्व है कि वे हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति कहीं से भी और कैसे भी करे। जनता का कहना है कि हमें इससे क्या मतलब कि आप बिजली, सड़क और खाद-बीज की व्यवस्था कैसे और कहां से कर रहे हैं। माना कि केन्द्र सरकार आपके साथ राजनीतिक द्वेषवश आपके मार्ग में रूकावट पैदा कर रही है, करती होगी, आम जनता तो सिर्फ यह चाहती है कि प्रदेश सरकार उसकी चिंता करें। यह सरकार का हेडेक है कि वह किसको रोढ़ा मान रही है और क्यों मान रही है। राजनीति भी एक तरह से खेल हैं। यदि कोई टीम रन नहीं बना पा रही है तो सामने वाली टीम उसके लिए कैसे गुनहगार हो सकती है ? आम जनता इन दिनों इसी तरह के सवाल उठाने लगी है। 

               राज्य योजना मंडल द्वारा की गई समीक्षा में यह बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आ गई है कि समय पर बजट खर्च करने के निर्देशों के बावजूद और लगातार विभागों की समीक्षा बैठकों में बजट समय पर खर्च करने का मुद्दा उठाये जाने के बाद भी बहुत सारे ऐसे विभाग हैं जो अपने पुराने ही ढर्रें पर चल रहे हैं। वर्ष 2010-11 के बजट में से 2700करोड़ रुपये खर्च न हो पाना इसी बात का नतीजा है। यह किसी एक वर्ष के वार्षिक बजट का हाल नहीं है बल्कि इसके पूर्व के वर्ष 2009-10 के दौरान विभिन्न विभाग लगभग 22.33 सौ करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाये थे।

                 एक समाचार के मुताबिक जो विभाग निर्धारित बजट विगत वर्ष खर्च नहीं कर पाये हैं उनमें अधिाकांश विभाग वे हैं जो माननीय मुख्यमंत्री जी की प्राथमिकता में हैं। एक अखबार में छपी बजट की इस हकीकत के समाचार के मुताबिक खनिज संसाधन, श्रम कल्याण, मछली पालन, उद्योग, राहत आयुक्त, सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विभागों में तो विगत वर्ष के बजट की 60 प्रतिशत से भी कम राशि खर्च हो पाई है। 15 से 30 प्रतिशत राशि खर्च न कर पाने वाले विभागों में पंचायत, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण, लोकनिर्माण, माधयमिक शिक्षा, लोक स्वास्थ्य, आयुष, सामाजिक-न्याय और परिवहन जैसे विभाग शामिल हैं। कुछ विभाग ऐसे हैं जिनमें 60 से 95 प्रतिशत राशि का उपयोग हुआ है। ऐसे विभाग हैं-कृषि, वन,सहकारिता, ऊर्जा, पर्यटन, राज्य शिक्षा केन्द्र, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग महिला एवं बाल विकास, संस्कृति, खेल और युवक कल्याण।

  ? राजेन्द्र जोशी