संस्करण: 30 जनवरी- 2012

बीहड़ों से कैसे बचेगा मध्यप्रदेश ?

? महेश बाग़ी

                मधयप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खेती को लाभ का धंधा बनाने के वादे करते हैं और उन्हीं की सरकार खेती की ज़मीन उद्योगों को दे रही है। एक ओर आबादी लगातार बढ़ रही है,वहीं दूसरी ओर खेती का रकबा लगातार कम होता जा रहा हैं, भू-संरक्षण के मामले में यह सरकार कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि चंबल क्षेत्र की उपजाऊ भूमि तेज़ी से बीहड़ों में तब्दील होती जा रही है। इस दिशा में सरकार ने अभी तक कोई विचार नहीं किया है। यदि यही लापरवाही आगे भी जारी रही तो समूचा चंबल क्षेत्र बीहड़ों में बदल जाएगा। वैसे भी यह क्षेत्र दस्युओं की शरणस्थली रही है,जहां पुलिस का पहुंच पाना मुश्किल होता है। यदि चंबल में बीहड़ों का विकास इसी तरह होता रहा, तो खेती की उपजाऊ भूमि तो बर्बाद होगी ही, साथ ही दस्युओं को भी सिर उठाने का मौका मिल जाएगा। वैसे भी क्षेत्र के दस्युओं ने अब डकैती की बजाय अपहरण को उद्योग बना लिया है। पिछले दिनों ऐसी कई वारदातें सामने आने के बाद राज्य सरकार ने दस्यु विरोधी अभियान में तो तेज़ी लाई, लेकिन भू संरक्षण की दिशा में कुछ नहीं किया।

                 मधयप्रदेश में 6.30 लाख हेक्टेयर भूमि बीहड़ों में बदल चुकी है, जिसका अधिाकांश भाग उत्तरी अंचल में बसे भिंड, मुरैना और श्योपुर में आता है। इन तीनों ज़िलों के बाहरी क्षेत्रों में हर साल 800 हेक्टेयर भूमि बीहड़ में तब्दील हो रही है। यही बीहड़ दस्युओं के नए ठिकानों में बदल रहे हैं। हालांकि सर्वोदय कार्यकर्ताओं की पहल पर कई दस्युओं ने बंदूकें छोड़ दी है और वे समाज की मुख्यधारा में आ गए हैं। इसके बावजूद नए दस्यु गिरोहों के थमने का सिलसिला भी जारी है। दरअसल इस क्षेत्र के बारे में यह आम धारणा है कि यहां का पानी व्यक्ति को उत्तेजित करता है। ऐसे में ज़रा-ज़रा सी बात पर ख़ून खराबा होना यहां आम बात हो गई है। सामूहिक हत्याएं करने वाले ऐसे लोग अथवा पीड़ित परिवार के सदस्य बंदूकें उठा लेते हैं, जिनके लिए बीहड़ सबसे सुरक्षित जगह होती है। इस स्थिति के लिए भी सरकार ही जिम्मेदार है, जो राजनीतिक दबाव में लोगों को हथियारों के थोकबंद लायसेंस जारी कर देती है। बीहड़ क्षेत्रों को कृषि योग्य या वन भूमि बनाने की दिशा में कोई पहल न होना भी दस्यु समस्या का एक प्रमुख कारण है।

               चंबल संभाग के भिंड, मुरैना और श्योपुर जिलों के चंबल, सिंध, क्वारी, बेसली, सोप, सोन, कूनो और इनकी सहायक नदियों द्वारा हर साल बारिश के दिनों में उपजाऊ भूमि को बीहड़ों में बदला जाता है। चंबल संभाग के 16.14 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में से 3.10लाख हेक्टेयर भूमि बीहड़ों में बदल चुकी है,जो संभाग के संपूर्ण क्षेत्रफल का 20 प्रतिशत है। मृदा विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में हर साल 800 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि बीहड़ों की भेंट चढ़ रही है। यदि इस दिशा में अब भी गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले कुछ सालों में यह समूचा क्षेत्र बीहड़ों में बदल जाएगा और दतिया ज़िला भी इससे अछूता नहीं रहेगा। कल्पना कीजिए कि जब किसानों के पास खेती योग्य जमीन ही नहीं होगी, तो वे क्या करेंगे ? या तो वे पलायन को मज़बूर होंगे या हथियार उठा लेंगे। ऐसे में यह क्षेत्र वीरानी और अराजकता का केन्द्र बन जाएगा।

                इस क्षेत्र की भूमि हल्के किस्म की है, जिसमें पत्थर, कंकड़, की मात्रा अधिक है। इसके बावजूद स्थानीय किसान ऐसी भूमि पर भी कड़ा परिश्रम कर फ़सल उपजाते हैं, लेकिन प्रकृति की मार के आगे वे बेबस हैं। कंबरीली-पथरीली ज़मीन होने के कारण बारिश का पानी मिट्टी में समा नहीं पाता और छोटी-छोटी नालियां बना कर नीचे की ओर बहने लगता है। धीरे-धीरे यही नालियां खाई और फिर बीहड़ में बदल जाती हैं। ग्वालियर स्टेट के बंदोबस्त विभाग के रिकार्ड के अनुसार तब कुल भूमि का 21 फीसदी भाग बीहड़ था, जो अब बढ़-चढ़कर 42 फीसदी हो गया है, एक अधययन के अनुसार चंबल के 213गांवों में से 14गांवों में बीहड़ तेज़ी से फैलते जा रहे हैं। यदि अब भी कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले समय में यह पूरा इलाका बीहड़ों में बदल जाएगा। चंबल घाटी में बीहड़ों की बढ़ती संख्या के कारण 50 अन्य गांवों का अस्तित्व भी संकट में है। उपजाऊ भूमि का संरक्षण कर बीहड़ों का बढ़ना कैसे रोका जाए, इस पर भूगर्भ विज्ञानी तो चिंतित हैं, किंतु सरकार इस मामले में कानों में तेल डाले बैठी है। भूमि के लगातार कटाव से किसानों की रोज़ी-रोटी पर भी ख़तरे के बादल मंडराने लगे हैं। हालांकि बीहड़ों में वृक्ष लगाने संबंधी अभियान समय-समय पर होते रहते हैं, लेकिन पौधारोपण करने के बाद कोई वहां झांकने तक नहीं जाता है। एक तरह से पौधारोपण अभियान स्थानीय राजनेताओं का शग़ल बन गया है,जिससे लाखों रुपयों के पौधे तो लगाए जाते हैं, किंतु उनका संरक्षण-संधारण नहीं किया जाता। पिछले साल राज्य सरकार ने पौधारोपण अभियान में स्कूली बच्चों का भी सहयोग लिया, लेकिन यह अभियान भी परवान नहीं चढ़ सका। लाखों पौधे लगाने के बाद इक्का-दुक्का वही पौधे बचे, जिन्हें मवेशी नहीं खाते, हालांकि पर्यावरणविद् नीम, बबूल, करंज, जैसे पौधे लगाने की सलाह देते हैं, किंतु वन विभाग इस पर विशेष रूप से धयान नहीं देता। यही वजह है कि चंबल क्षेत्र में चलाए गए तमाम पौधारोपण अभियान दिखावटी ही साबित हुए। अर्जुन शासनकाल में इस दिशा में गंभीर पहल तब हुई थी,जब हेलिकॉप्टर से बीज बरसा कर वृक्षारोपण की उम्मीद की गई थी,मगर वन विभाग की निष्क्रियता से यह पहल भी कारगर साबित नहीं हुई। आज यहां पौधो तो हैं, लेकिन बेशरम के है, जो ज़मीन की उर्वरा क्षमता नष्ट करते हैं, और अन्य पौधों को पनपने भी नहीं देते हैं। बेहतर होगा कि राज्य सरकार अब भी चेत जाए और चंबल घाटी को बचाने के लिए आगे आए। इसके लिए व्यापक कार्ययोजना बनाई जाना चाहिए,जिसके क्रियान्वयन में वन विभाग के साथ-साथ स्वयंसेवी संगठनों की भी मदद ली जाए। इसी के साथ-साथ इस कार्य पर निगरानी के लिए मॉनीटरिंग कमेटी भी बनाई जाना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि पौधारोपण वास्तव में फल-फूल रहा है। यदि सरकार अब भी नहीं जागी, और संपूर्ण चंबल बीहड़ों में बदल गया, तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करेगी।


? महेश बाग़ी