संस्करण: 30 जनवरी- 2012

पाकिस्तान में लोकतंत्र की मजबूती से इस इलाके में शान्ति कायम होगी

? शेष नारायण सिंह

                पाकिस्तानी अखबार डान के पहले पेज पर आज खबर छपी है कि पाकिस्तानी फौज के मुखिया, जनरल अशफाक परवेज कयानी और आई एस आई के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल शुजा पाशा ने मंगलवार को प्रधान मंत्री युसूफ रजा गीलानी के दफ्तर जाकर उनसे मुलाकात की । इस बैठक में राजकाज के बहुत सारी बातों के अलावा यह भी तय किया गया कि अफगानिस्तान में सरकार की नीतियों को लागू करने की दिशा में क्या कदम उठाये जाने हैं। प्रधानमंत्री ने विदेशमंत्री,हिना रब्बानी खार को अफगानिस्तान की यात्रा करने का निर्देश दिया। इस यात्रा का उद्देश्य अमरीका-पाकिस्तान-अफगानिस्तान की शीर्ष बैठक के पहले माहौल ठीक करना भी बताया गया है।

               इस खबर का जिक्र करने का मतलब यह है कि जहाँ पाकिस्तानी फौज और आई एस आई देश की सबसे ताकतवर संस्थाएं मानी जाती थीं और अगर किसी नवाज शरीफ या किसी जुल्फिकार अली भुट्टो ने उसका हुक्म नहीं माना तो उसे सत्ता से बेदखल कर दिया जाता था, उसी पाकिस्तान में प्रधानमंत्री युसूफ रजा गीलानी के सख्त तेवर के बाद आई एस आई और फौज का मुखिया राजकाज के मामलों की चर्चा में शामिल होने के लिए प्रधान मंत्री के यहाँ  हाजिरी लगा रहा है । पाकिस्तान के पिछले साठ साल के इतिहास को जानने वाले जानते हैं कि फौज का मुखिया  डांट खाने के बाद कभी किसी भी सिविलियन सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए ही उसके दफ्तर जाता है। लेकिन पाकिस्तान में भी हालात बदल रहे हैं । चारों तरफ से लोकतंत्र की मजबूती की खबरें आ रही हैं जो पाकिस्तान के लिए तो बहुत अच्छा है ही, भारत और अफगानिस्तान के लिए बहुत अच्छा है, बाकी दुनिया के लिए बहुत अच्छा है ।

               पाकिस्तान के बारे में पिछले कुछ महीनों से अजीब खबरें आ रही थीं । पाकिस्तानी मामलों के भारत में मौजूद लाल बुझक्कड़ अक्सर बताते रहते हैं कि बहुत जल्द पाकिस्तान में फौजी हुकूमत कायम होने वाली है। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। जब से सिविलियन हुकूमत ने फौज को अपनी हद में रहने की हिदायत दी है,उसी वक्त से बार बार यह चर्चा जोर पकड़ लेती है कि फौज अब फौरन राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री की छुट्टी कर देगी और खुद सरकार बन जायेगी। सारी दुनिया में पाकिस्तानी मामलों के जानकार अपनी इस तर्ज पर की गयी भविष्यवाणियों के पूरा होने का इंतजार करते रहे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पाकिस्तानी मीडिया में भी इस तरह की खबरें रोज ही आ रही थीं कि पता नहीं कब क्या हो जाए लेकिन लगता है कि वहां लोकशाही की जड़ें मजबूत होना शुरू हो गयी हैं। पाकिस्तानी बुध्दिजीवियों को विश्वास होने लगा है कि अब उनके देश में लोकतंत्र के लिए अब पहले से ज्यादा अवसर मौजूद हैं । हालांकि यह भी हो सकता है कि आने वाले कुछ हफ्तों  में मौजूदा सरकार हटा दी जाए लेकिन सिविलियन हुकूमत के पिछले कुछ  हफ्तों  के तेवर ऐसे हैं जो पक्की तरह से लोक शाही की ताकत का सन्देश देते हैं। अगर मौजूदा सरकार चुनाव के पहले नहीं हटाई जायेगी गयी तो पाकिस्तान के इतिहास में पहली सिविलियन सरकार बन जायेगी जिसने अपने पूरा कार्यकाल पूरा किया हो। पाकिस्तान में सारा विवाद तब शुरू हुआ जब उनकी फौज की नाक के नीचे ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी साबित हो गयी जबकि जनरल परवेश मुशर्रफ से लेकर जनरल कयानी तक सभी फौजी कहते रहे थे कि उन्हें नहीं मालूम कि ओसामा कहाँ है। उसके बाद जब सरकार ने फौज को आइना दिखाने की कोशिश की तो सेना मुख्यालय से तख्तापलट के संकेत आने लगे थे। बाद में उसी चक्कर में मेमो काण्ड वाला लफडा भी हुआ। लगने लगा कि  सिविलियन हुकूमत के आदेश न मानने के लिए बदनाम पाकिस्तानी फौज अब सरकार की छुट्टी कर देगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान में फौज ने चार बार सिविलियन सत्ता को हटाकर खुद गद्दी पर कब्जा किया है। चारों बार सडकों पर टैंक उतार दिए जाते थे,रेडियो और टेलीविजन पर कब्जा कर लिया जाता था और सिविलियन शासक को पकड़ लिया जाता था। इस बार ऐसा संभव नहीं है। आज न्यायपालिका एक मजबूत सत्ता केंद्र के रूपमें विकसित हो चुकी है,पाकिस्तानी मीडिया भी अपनी भूमिका बहुत ही खूबी से निभा रहा है और आज मीडिया ब्लैक और का सपना देखना किसी ही शासक के लिए संभव नहीं है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को पूरा भरोसा है कि आज फौज की हिम्मत नहीं है कि वह सीधे हस्तक्षेप कर सके।

               ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद फौज की जो बदनामी हुई उसके बाद से ही जरदारी-गीलानी सरकार ने अपनी अथारिटी को स्थापित करना शुरू कर दिया था। उसी जद्दो-जहद में देश में प्रगतिशीलता की दिशा में जितने बदलाव हुए हैं ,उतने पाकिस्तान के इतिहास में कभी नहीं हुए। पाकिस्तान की संसद में पिछले चार महीनों में कुछ ऐसे कानून पास किये गए हैं जिनको देख कर लगता है कि पाकिस्तान में बदलाव ही हवा बह रही है। पाकिस्तान में मानवाधिकारों के संघर्ष के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति ,बी एम कुट्टी दिसंबर में मुंबई आये थे। उन्होंने बहुत सारे उदाहरणों के साथ यह बात समझाया कि  बहुत दिन बाद पाकिस्तान में लोकशाही की जड़ें जमती दिख रही है। बी एम कुट्टी ने कहा कि यह बहुत संतोष की बात है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गीलानी आम पाकिस्तानी की उस भावना को आवाज दे रहे हैं जिसमें वह चाहता है कि पाकिस्तानी फौज को काबू में रखा जाए ।

               पाकिस्तान में अब आम तौर पर माना जाने लगा है कि फौज की मनमानी पर लगाम लगाई जा सकेगी। पाकिस्तान के चर्चित मेमोगेट काण्ड के बाद जिस तरह से फौज ने सिविलियन सरकार को अर्दब में लेने की कोशिश की थी उसके बाद पाकिस्तान में एक बार फिर फौजी हुकूमत की आशंका बन गयी थी। उसी दौर में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को इलाज के लिए दुबई जाना पड़ गया था। जिसके बाद यह अफवाहें बहुत ही गर्म हो गयी थीं कि पाकिस्तान एक बार फिर  फौज के  हवाले होने वाला है। लेकिन प्रधाान मंत्री युसफ रजा गीलानी ने कमान संभाली और  सिविलियन सरकार की हैसियत को स्थापित करने की कोशिश की। अब फौज रक्षात्मक मुद्रा में है। जब मेमोगेट वाले कांड में फौज के जनरलों की मिली भगत की बात सामने आई तो प्रधानमंत्री ने फौरन जांच का आदेश दिया। पाकिस्तानी जनरलों की मर्जी के खिलाफ यह जांच चल रही है और इमकान है कि सिविलियन सरकार का इकबाल भारी पडेगा और पाकिस्तान में एक बार लोकशाही की जड़ें  जम सकेगीं ।

 

? शेष नारायण सिंह