संस्करण: 30 जनवरी- 2012

टीम अन्ना का आंदोलन

 किसके विरुध्द ?

? मोकर्रम खान

                 इलेक्ट्रानिक मीडिया के सौजन्य से कई महीनों तक भारतीय राजनीति के आकाश में उड़ते रहे अन्ना हजारे तथा उनकी टीम का अघोषित कांट्रेक्ट पिछले माह समाप्त हो गया। महीनों की कड़ी मेहनत के बाद अन्ना हजारे को आराम की आवश्यकता थी इसलिये वे पहले संचेती हास्पिटल फिर अपने गृह रालेगण सिध्दी चले गये। अब आराम हो गया, अघोषित कांट्रेक्ट का दूसरा चरण संभाला जाय, तो एक महीने तक टी0वी0 स्क्रीन से गायब रहने के बाद अब फिर अन्ना और उनकी टीम के फोटो टी0वी0और समाचार पत्रों में दिखने लगे हैं। ऐसा लगता है कि यह तस्वीरें किसी राजनेता के कलर लैब में बनाई गई हैं क्योंकि अन्ना के अलावा टीम के अन्य सदस्य के माथे पर एक छोटा काला टीका भी लगा दिया गया है किसी पर स्टाम्प डयूटी चोरी करने के आरोप के रूप में,किसी पर सरकारी पैसों के दुरुपयोग का आरोप, किसी पर डयूटी से नदारद रह कर नेतागिरी करने का आरोप तो किसी पर एन0जी0ओ0 के पैसों पर ऐश करने का आरोप। वैसे आम धारणा यह है कि मातायें अपने गोरे खूबसूरत बच्चों  को बुरी नजरों से बचाने के लिये उनके गोरे माथे पर छोटा सा काला टीका लगा देती हैं लेकिन यहां काला टीका राजनेताओं ने लगाया है इसलिये इसका उद्देश्य दूसरा है। अगर बच्चामां-पिता की गोद से बाहर कूद कर ज्यादा उधम मचाने का प्रयास करेगा तो नजर का यह टीका खींच कर पूरे चेहरे पर फैला दिया जायगा। गोरा रंग जिस पर बच्चा इतरा रहा था,गायब हो जायगा, चेहरा काला दिखने लगेगा। संभव है इतना काला दिखने लग जाय कि चेहरा छिपाने की नौबत आ जाय। अब बच्चे खुद ही सतर्क रहें कि उनके माथे पर लगा छोटा सा टीका उनके गोरे चेहरे पर तिल की तरह खूबसूरती बढ़ाने का कार्य करता रहे या फिर ज्या दा गर्मी से फैल कर पूरे चेहरे को ही बदरंग कर दे। टीम के सभी सदस्य हाइली क्वालीफाइड सोसाइटी से हैं, कोई प्रख्यात वकील है, कोई अखिल भारतीय सेवा का भूतपूर्व अथवा वर्तमान सदस्य तो कोई शिक्षाविद। इसलिये सभी को उक्तल सत्या का भली भांति ज्ञान है। तो साहब अन्ना और उनकी टीम के सदस्य फिर एक्टिव हो गये हैं,ताकि जनता यह न सोचने लग जाय कि यह लोग राजनेताओं से मिल गये हैं। टीम अन्ना पहुंच गई उत्तानराखंड। वहां एक व्यक्ति ने टीम पर जूता उछाल दिया,कहा कि अन्ना ने शरद पवार को थप्पड़ मारे जाने पर कहा था कि बस एक ही थप्पड़, इसलिये मैं ने जूता फेंका। किंतु उस व्यक्ति ने जूता किस पर फेंका, अन्ना हजारे तो उस जगह थे ही नहीं और टीम के अन्य सदस्यों को पवार से कुछ लेना देना नहीं था। शरद पवार की महाराष्ट्र में अच्छी खासी पकड़ है,लाखों कार्यकर्ताओं की फौज है,वहां किसी ने अन्ना या उनकी टीम पर जूता नहीं उछाला। उत्तराखंड जहां पवार की पार्टी की उपस्थिति लगभग नगण्य है,वहां इतना बड़ा सूरमा कहां से आ गया। महाराष्ट्र के बजाय उत्तराखंड में पवार के प्रति इतना अनुराग प्रदर्शन के क्या कारण हैं।

                 टीम अन्ना  ने हरियाणा के हिसार उपचुनाव में कांग्रेस का विरोध किया था इससे कांग्रेस विरोधियों में यह आशा जाग उठी थी कि टीम अन्नां कांग्रेस का राष्ट्रव्यापी विरोध करेगी,बीच में अन्ना हजारे ने कुछ ऐसे संकेत भी दिये थे किंतु उत्तराखंड दौरे में टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य अरविंद केजरीवाल ने उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा दिये इससे भाजपा में खलबली मचना स्वाभाविक है। अब ताजा समाचार यह आया है कि अन्ना तथा उनकी टीम ने प्रधान मंत्री तथा राहुल गांधी को पत्र लिख कर सशक्त लोकपाल न बनाने के कारण पूछे हैं। यह समाचार टी0वी0 तथा समाचार पत्रों में हेड लाइंस में रहा। कुछ लोगों ने सोचा कि शायद अन्ना ने फिर सरकार तथा कांग्रेस पार्टी पर हमला बोल दिया है किंतु उनकी खुशी कुछ ही क्षणों में गायब हो गई जब यह पता चला कि टीम अन्ना ने इसी तरह के पत्र तथा प्रश्न भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी,सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव तथा बसपा सुप्रीमो मायावती को भी भेजे हैं, यानि किसी को भी नहीं छोड़ा है। वास्तविकता यह है कि इस पत्र द्वारा न तो कांग्रेस पर हमला किया गया है न ही कांग्रेस,भाजपा या सपा पर। असल बात यह है कि यू0पी0 के चुनावी महा समर में मुख्य रूप से यही 4 पार्टियां मैदान में हैं, बाकी सभी पार्टियां या तो औपचारिकता निभा रही हैं या फिर एक्सेपीरियंस गेन करने के लिये अखाड़े में उतरी हैं। केवल इन्हीं 4पार्टियों को पत्र लिखने तथा उस पत्र को मीडिया द्वारा प्रचारित करने के पीछे उद्देश्यक यह है कि आम जनता वोट देने के पहले यह अच्छी तरह समझ ले कि भ्रष्टाचार के मामले में सभी पार्टियों का एक ही रवैया है, कोई नहीं चाहता कि भ्रष्टाचार पर रोक लगे इसीलिये सभी दलों के नेताओं ने अभूतपूर्व एकजुटता का परिचय देते हुये एम0टी0पी0(मैनुअल टर्मिनेशन आफ प्रेगनेंसी)द्वारा लोकपाल की भृण हत्या कर दी। ऐसा करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि मतदाता भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर अपने मतदान का निर्णय न करे, राजनेता अपने इस उद्देश्य में सफल रहे।  कल तक भ्रष्टाचार के विरुध्द पूरे देश को गोलबंद कर रही टीम अन्ना भी अब भ्रष्टाचार का नाम ही नहीं ले रही, केवल लोकपाल न बनाने के कारण पूछ रही है। वर्तमान स्थिति यह है कि भ्रष्टाचार का मुद्दा भारत के राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो चुका है। काला धन का मुद्दा बाबा रामदेव के रामलीला मैदान से पलायन के साथ पहले ही हवा में उड़ गया था। ये दोनों मुद्दे राजनेताओं के लिये सरदर्द बन सकते थे किंतु अभी दोनों ही मुद्दों पर कहीं कोई सरगर्मी नहीं है इसलिये राजनेता भी न तो काला धान वापस लाने की बात कर रहे हैं और न ही भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की। तीसरा मुद्दा जो सरकार बदलने की क्षमता रखता था,वह है खाद्य पदार्थों की मंहगाई। यह मुद्दा भी गायब हो गया है क्यों कि पिछले दो महीनों में खाद्य पदार्थों की कीमतों में काफी गिरावट आई है। अब बचता है केवल एक मुद्दा, वह है सांप्रदायिकता, किंतु इसे इतनी बार प्रयोग किया जा चुका है कि कभी अमोघ अस्त्र के रूप में प्रयुक्त होने वाला यह मुद्दा अब कारतूस के खाली खोल वाली स्थिति में आ चुका है, जनता इससे ऊब चुकी है। फिर भी राजनेताओं को इस खाली कारतूस से अभी भी काफी उम्मीदें हैं इसीलिये सभी इसे अपनी अपनी तरह से इस्तेमाल करने की फिराक में हैं। भाजपा ने उमा भारती को वनवास से निकाल कर सीधे मुख्य मंत्री प्रोजेक्ट कर दिया है। जिन नरेंद्र मोदी को उनकी कट्टरवादी छवि के कारण भाजपा गुजरात से बाहर कहीं भी प्रचार हेतु भेजने से कतराती थी, उन्हें  भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी ने, धार्मिक कट्टरवाद को राष्ट्रव्यापी स्वरूप देने वाले आडवाणी जी के रहते हुये, भावी प्रधान मंत्री बताना शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने भी मुसलमानों को आरक्षण का चुग्गी दिया है। भाजपा इसका विरोध कर मुद्दे को और गरमा रही है। भगवा वस्त्राधारी उमा भारती को मैदान में उतार कर तथा मुस्लिम आरक्षण का विरोध कर भाजपा हिंदू मतों के धृवीकरण का प्रयास कर रही है्। कांग्रेस भी चाह रही है कि भाजपा अपना मुस्लिम विरोधा और उग्र रूप से करे ताकि मुस्लिम मतदाताओं का भी भाजपा के विरुध्द धाृवीकरण हो जिसका लाभ कांग्रेस को मिले क्योंमकि मुसलमान मतदाता ही असुरक्षा की आशंका से थोक के भाव किसी एक दल की झोली में जा कर उसका पलड़ा भारी कर देते हैं, हिंदू मतदाता तो कई दलों में विभाजित हो जाते हैं क्यों कि उनमें असुरक्षा की भावना उत्पन्न होने का प्रश्न  ही नहीं है।

? मोकर्रम खान