संस्करण: 30 जनवरी- 2012

आतंकवाद का संघी चेहरा-

गोडसे से प्रज्ञा तक 

? शाहनवाज आलम

                राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति पर भारतीय और विदेशी लेखकों ने काफी काम किया है। लेकिन सुभाष गाताडे की 'गोडसेज चिल्ड्रेन- हिंदुत्वा टेरर इन इंडिया' इन सबसे कई मायनों में अलग है। ऐसा इसलिये कि अब तक हिंदुत्ववादी राजनीति के आलोचकों की बडी जमात भी उसे सिर्फ एक प्रतिक्रियावादी, अंधराष्ट्रवादी और ब्राह्मणवादी विचारों वाले संगठन के बतौर ही देखती रही है जो अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा में शामिल रहते हैं। लेकिन मौजूदा समय में आतंकवाद की जो परिघटना सतह पर आई है उससे इन लेखकों ने हिंदुत्ववादी संगठनों को जोड कर देखने का संयोजित प्रयास नहीं किया है। इसकी कई वजहें हैं। जिनमें सबसे अहम, इन लेखकों का साम्प्रदायिकता और हिंदुत्ववाद विरोधी होने के बावजूद,इस समझदारी पर खडे होना रहा है कि आतंकवादी घटनाओं के माधयम से अपनी राजनीतिक और सामाजिक हालात औरे उससे उपजी कुंठा की अभिव्यक्ति का विकल्प सिर्फ मुसलमानों को ही आकर्षित कर सकता है, हिंदुओं को नहीं। क्योंकि अव्वल तो हिंदु बहुसंख्क हैं जो अपने उद्देश्य को जनमत के हवाले से पा सकते हैं जिसकी सबसे बडी वाहक इस समय भाजपा है। दूसरे चूंकि वैश्विक स्तर पर आतंकवाद मुस्लिम दुनिया और पहचानों से जुडा है इसलिये भारत में होने वाली ऐसी अभिव्यक्ति के वाहक मुसलमान ही हो सकते हैं।

                इस लेहाज से सुभाष गाताडे जिनके साम्प्रदायिकता विरोधी लेखन से एक पूरी नयी पीढी ने हिंदुत्ववादी फासीवाद को समझा है,कि यह पुस्तक हिंदुत्ववादी राजनीति को समझने के पुराने सभी प्रयासों से अलग और आगे है।

                  फरोस प्रकाशन से अंग्रेजी में छपी चार सौ पन्नों की इस पुस्तक में लेखक ने न सिर्फ उन तमाम आतंकवादी वारदातों को विस्तार से प्रस्तुत किया है जिनमें भगवा संगठन शामिल रहे हैं बल्कि उन तर्कों का जो संघ परिवार अपनी संल्पितता को छुपाने के लिये देता है का भी तार्किक और तथ्यगत विश्लेशण किया है। मसलन संघ अक्सर किसी आतंकी घटना में अपने कार्यकर्ताओं का नाम आने पर यह कह कर बचने की कोशिश करता है कि उक्त कार्यकर्ता से उसका कोई सम्बंधा नहीं है या वह काफी पहले ही संघ छोड चुका है। संघ के इस पैंतरे को संघ के कार्यकर्ता गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या से लेकर, जिसे लेखक आजाद भारत की पहली आतंकी घटना बताते हैं, मालेगांव, अजमेर शरीफ और समझौता एक्सप्रेस जैसे आतंकी हमलों में देखा सकता है पर लेखक ने संघ परिवार के ही एक प्रकाशन 'परम वैभव के पथ पर'को उध्दृत कर बताया है कि संघ कैसे अपने सदस्यों यहां तक कि कई संगठनों का इसलिये सदस्यता या सम्बध्दता के दस्तावेज नहीं रखता कि इससे कभी भी असुविधा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

               इसी तरह गाताडे ने ऐतिहासिक साक्ष्यों और अपने अकाटय विश्लेषण से यह साबित किया है कि हिंदुत्ववादी संगठन जिस मालेगांव और समझौता कांड को इस्लामी आतंकवाद की हिंदुत्ववादी प्रतिक्रिया बताते हुये 'बम का जवाब बम' का सिध्दांत गढ रहे हैं वह न सिर्फ झूठ है बल्कि अपनी पुरानी आतंकी गतिविधियों पर पर्दा डालने की कोशिश भी है। गाताडे यहां सावरकर, हेडगेवार और गोलवलकर जो संघ के आदि और पूज्य पुरूष हैं के विचारों और घटनाओं को उध्दृत कर यह साबित करते हैं कि मालेगांव से लेकर समझौता कांड में जो संघ ने किया वह उनके ही सिध्दांतों का अमलीकरण है। उसका किसी जवाबी कार्यवायी या बदले के सिध्दांत से कोई लेना देना नहीं है। बल्कि यह उस राजनीति की नैसर्गिक प्रवृत्ति है जो अल्पसंख्यकों का हिटलर के तर्ज पर नस्ली सफाये की वकालत करता है। इसी तरह गाताडे ने नांदेड जहां बम बनाते समय हुये विस्फोट में बजरंग दल के दो सदस्य मारे गये थे और जहां से नकली दाढी और टोपियां बरामद हुयी थीं, का विश्लेषण करते हुये 14 मार्च 1948 को डॉ राजेंद्र प्रसाद जो बाद में राष्ट्रपति बने,द्वारा तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल को लिखे पत्र को उध्दृत किया है जिसमें डॉ प्रसाद ने संघ परिवार के सदस्यों द्वारा मुसलमानों के पोशाक धारण कर हिंदुओं पर हमले करने की जानकारी दी है कि संघ किस तरह से साम्प्रदायिक दंगे कराने में लगा है। यानी लेखक ने तथ्यों और दस्तावेजों से यह साबित किया है कि अल्पसंख्यकों का वेश बदल कर हिंसा करना संघ की पुरानी रणनीति है।

                एक और खासियत जिसके चलते यह पुस्तक आतंकवाद की राजनीति को समझने और धर्मनिरपेक्षता के सिध्दांतों में यकीन रखने वालों के लिये महत्वपूर्ण बन जाती है वह यह कि अन्य लेखकों की तरह गताडे ने सिर्फ चर्चित या बडी घटनाओं को ही अपने विश्लेषण का आधार नही बनाया है बल्कि छोटी-छोटी घटनायें जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है को उचित तवज्जो देते हुये संघ के जमीनी आतंकी नेटवर्क को समझने और उसे देश के बाहर की हिंदुत्ववादी गतिविधियों मसलन नेपाल, अमरीका, सर्बिया या इजराइल के बदनाम खुफिया संगठन मोसाद के साथ उसके सम्बंधों को उजागर कर आतंकी हिंदुत्व की परिघटना का सर से पांव तक एक्सरे प्रस्तुत किया है।

               मसलन जहां लेखक ने उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर सहारनपुर में सक्रीय पांच सदस्यीय आतंकी संगठन आर्य सेना की गतिविधियों का जिक्र किया है या केरल और कर्नाटक के कस्बों में 'लव-जेहाद'के नये संघी साजिश का विश्लेषण किया है तो वहीं यह भी बताया है कि किस तरह नेपाल को फिर से हिंदु राष्ट्र घोषित करने और राजशाही को पुर्नस्थापित करने के लिये वहां बम धमाके किये गये या कैसे मालेगांव के आरोपियों कर्नल पुरोहित इत्यादि ने मोसाद से हथियारों की डीलिंग की,भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को हिंदु सैन्य विद्रोह से पलट कर हिंदु राष्ट्र बनाने की साजिश, और इजाराइल से भारत की निर्वासित हिंदु सरकार चलाने का एजेंडा बनाया।

                पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और अनुवादक सुभाष गाताडे हिंदुत्ववादी विचारधारा के तेजी से राज्य मशीनरी के भीतर मजबूत होते जाने के खतरे को भी रेखांकित करते हैं। उन्होंने लखनऊ के वकील मो शोएब की आतंकवाद के आरोपों में बंद मुस्लिम युवकों का मुकदमा लडने पर कोर्ट परिसर में पिटाई, वकील संगठनों द्वारा ऐसे मुकदमें न लडने देने के फतवे और साधवी प्रज्ञा ठाकुर पर हिंदुत्ववादी वकीलों द्वारा कोर्ट परिसर में पुष्प वर्षा जैसी घटनाओं से न्यायपालिका के समक्ष हिंदुत्ववादी राजनीति द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों को भी रखा है। तो वहीं सेना में कर्नल पुरोहित जैसे हिंदुत्ववादियों की मौजूदगी से राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष भगवा आतंकवाद के खतरे से भी आगाह किया है। संघ परिवार की आतंकी गतिविधियों को उजागर करती यह पुस्तक संघ के उन तमाम नकाबों को उतार फेंकने में सफल हुयी है जो उसने गोडसे से लेकर योगी आदित्य नाथ और प्रज्ञा ठाकुर तक पहने हैं।

? शाहनवाज आलम