संस्करण: 30 जनवरी- 2012

संदर्भ : गुजरात लोकायुक्त नियुक्ति मुद्दे पर हाई कोर्ट का फैसला

 इस हार से भी मोदी सरकार ने नहीं लिया सबक

?      जाहिद खान

                गुजरात की मोदी सरकार को अदालत में एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है। गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में राज्यपाल द्वारा सूबे में लोकायुक्त की नियुक्ति को सही ठहराते हुए सूबाई सरकार की अपील को ठुकरा दिया है। तीन जजों की पीठ ने एक के मुकाबले दो से सरकार की याचिका को निरस्त करते हुए जहां राज्यपाल द्वारा की गई लोकायुक्त की नियुक्ति को बरकरार रखा,वहीं इसे चुनौती देने वाली सूबाई सरकार की अपील को खारिज कर दिया। अदालत के फैसले से यह साफ हो गया है कि गुजरात में बीते साल हुई लोकायुक्त की नियुक्ति पूरी तरह से वैधानिक थी। बीजेपी और मोदी सरकार ने इस मसले पर बीते दिनों संसद और गुजरात विधानसभा के अंदर जो हंगामा मचाया वह गलत था। अदालत का यह फैसला मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के पाखंड और भष्टाचार के मुद्दे पर बीजेपी के दोहरे मापदंड की न्यायिक पुष्टि है। भ्रष्टाचार पर बीजेपी हमेशा दोमुंही नीति अपनाती आई है, जो केन्द्र सरकार के लिए कुछ और बीजेपीशासित सूबों के लिए कुछ और है। लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर केन्द्र सरकार को लगातार घेरने वाली बीजेपी, खुद नहीं चाहती कि बीजेपीशासित सूबों में स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकायुक्त की नियुक्ति हो।

               गौरतलब है कि गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल ने बीते साल अगस्त में सूबे के लोकायुक्त के ओहदे पर पूर्व न्यायाधीश आर.ए. मेहता को नियुक्त किया था। मुख्यमंत्री मोदी की अगुवाई में गुजरात सरकार ने इस फैसले को असंवैधानिक और एकतरफा करार देते हुए उसे चुनौती दी और गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। याचिका की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की खंडपीठ ने खंडित फैसला दिया। न्यायमूर्ति कुरैशी ने जहां राज्यपाल के फैसले को बरकरार रखा,तो वहीं न्यायमूर्ति गोकानी ने राज्यपाल द्वारा जारी नियुक्ति संबंधी आदेश को असंवैधानिक बताते हुए इसे रद्द कर दिया। लोकायुक्त नियुक्ति मुद्दे पर आई,इस अलग-अलग राय के बाद यह मामला न्यायमूर्ति बी.एम.सहाय के सुपुर्द कर दिया गया। जहां से अब ये फैसला आया है। इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का जो रुख रहा उसकी आलोचना करते हुए अदालत ने कहा, लोकायुक्त मुद्दे पर मोदी ने जो खेल खेला, वह हमारे लोकतंत्र को तबाही की ओर ले जाने वाला है और इसने संवैधानिक विधि संकट खड़ा कर दिया है।

                दरअसल, गुजरात में पिछले लोकायुक्त का कार्यकाल 2003 में ही पूरा हो गया था, लेकिन नई नियुक्ति का फैसला राज्यपाल और मोदी सरकार के बीच आपसी रजामंदी न बन पाने के चलते टलता रहा। इस बीच यह मामला गुजरात हाई कोर्ट में भी पहुंच गया। याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मोदी सरकार को नोटिस देते हुए जबाव तलब किया कि उसने 8 साल से लोकायुक्त का पद क्यों खाली रखा है ? बहरहाल, लोकायुक्त नियुक्ति मामले में गुजरात हाई कोर्ट का कड़ा रुख कोई पहली बार नहीं था,बल्कि इससे पहले भी उसने आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा की याचिका पर सुनवाई करते हुए कमोबेश ऐसा ही रुख दिखलाया था। तब सूबे के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत में कहा था कि लोकायुक्त की नियुक्ति के बारे में सूबाई सरकार ने राज्यपाल को सिफारिश भेज दी है। जाहिर है,इसी बिना पर उस याचिका की बाबत अदालत ने आगे सुनवाई नहीं की। लेकिन अदालत में दिए गए आश्वासन के बाद मोदी सरकार अपने वादे से मुकर गई। लोकायुक्त नियुक्ति पर वह लगातार टाल मटोल करती रही। एक साल से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी गुजरात में लोकायुक्त का पद खाली पड़ा रहा। आखिरकार, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.जे.मुखोपाध्याय की सिफारिश पर राज्यपाल डॉ.कमला बेनीवाल ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर.ए.मेहता को सूबे का लोकायुक्त नियुक्त कर दिया। मोदी सरकार को यह बात नागवार गुजरी और उसने उसी दिन से यह हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि राज्यपाल ने सरकार से बिना राय-मशविरा किए, सूबे में लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी।

               जबकि, सच बात तो यह है कि गुजरात में साल 1985-86 से ही राज्यपाल, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर लोकायुक्त की नियुक्ति करते रहे हैं और इस नियुक्ति में मुख्यमंत्री की कोई भूमिका नहीं होती। सूबे में लोकायुक्त के पद पर जस्टिस मेहता की नियुक्ति किए जाने से पहले,राज्यपाल ने सूबे के लोकायुक्त अधिनियम 1986 की धारा 3 के तहत गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस. जे. मुखोपाध्याय और विधानसभा में विपक्ष के लीडर के साथ बाकायदा विचार-विमर्श किया और उसके बाद ही उनकी नियुक्ति की। यानी,गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति में कुछ भी गलत नहीं था। मोदी सरकार ने बिला वजह ही बात का बतंगड़ बनाया।

               हाई कोर्ट के फैसले के बाद अपने बचाव में संघीय ढांचे, संविधान और लोकतंत्र की दुहाई दे रही मोदी सरकार, दरअसल गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति से असहज महसूस कर रही थी। लोकायुक्त के गठन के बाद मोदी सरकार ने एक समिति गठित कर बकायदा उसे लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन सुझाने को कहा। इसके पीछे मंशा साफ थी कि लोकायुक्त की नियुक्ति में सूबाई सरकार की सलाह बाध्यकारी हो और लोकायुक्त के अधिकारों में कटौती करना। यही वजह है कि अदालत ने मोदी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा,वह लोकायुक्त कानून में बदलाव लाकर चीफ जस्टिस को ही नियुक्ति प्रक्रिया से हटाना चाहते हैं।

                 कुल मिलाकर, गुजरात में लोकायुक्त नियुक्ति के मुद्दे पर आए हाई कोर्ट के हालिया फैसले ने मोदी सरकार की उन दलीलों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है,जिसकी बिना पर वह राज्यपाल कमला बेनीवाल को लगातार कठघरे में रखे हुए थी। गुजरात में बीते 9साल से लोकायुक्त का पद खाली है। क्या इसकी कोई जबावदेही बीजेपी या मोदी सरकार की नहीं बनती ?यदि मोदी सरकार ईमानदार है, तो उसे सूबे में लोकायुक्त की नियुक्ति करने से क्यों गुरेज है ? उसने खुद आगे आकर यह पहल क्यों नहीं की ? यह पहल करना तो दूर उल्टे मोदी सरकार लोकायुक्त नियुक्ति के विरोध में अदालत चली गई। गुजरात हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना बतलाता है कि मोदी सरकार ने इस हार से भी कोई सबक नहीं लिया है।

? जाहिद खान