संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

मध्यप्रदेश में पर्यावरण से

ज्यादा राजस्व की चिंता

?  अमिताभ पाण्डेय

      क्या किसी राज्य की सरकार को पर्यावरण की कीमत पर धान कमाने-बढाने की अनुमति दी जानी चाहिये ? पर्यावरण को होनेवाले नुकसान की चिंता किये बिना क्या केवल राजस्व/आय/ पर ही धयान केन्द्रित करना चाहिये ? क्या जल, जमीन, जीव-जंतु, को बिना नुकसान पहॅुचा कर ,बिगडते पर्यावरण की फिक्र छोडकर केवल कमाई को ही अपना मुख्य लक्ष्य बना लेना चाहिये ? यदि बेहिसाब कमाई की धुन में बिगडते पर्यावरण, बढते प्रदूषण के कारण उतराखण्ड की तरह मधयप्रदेश में भी कोई बडी प्राकृतिक आपदा आ गई तो फिर इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ?

                 ये वो सारे सवाल हैं जा्रे इन दिनों मधयप्रदेश में प्रकृति, प्राकृतिक संसाधन और पर्यावरण की चिंता करने वालों के बीच चर्चा के विषय बने हुए हैं। पर्यावरण प्रेमियों की चिंता का कारण मधयप्रदेश सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय में दायर की गई अपील है। इस अपील में राष्ट्रीय हरित अभिकरण /एन जी टी/ के उस फैसले पर रोक लगाने की मांग की गई है जिसमं सभी प्रकार के खनिज उत्खनन के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति /एन ओ सी/ ली जाना अनिवार्य कर दी गई है।

               उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय के अधीन कार्यरत राष्टीय हरित अभिकरण /नेशनल ग्रीन टिब्यूनल/ ने पिछले दिनों एक निर्णय पारित किया है। इस निर्णय में सरकार को आदेश दिया गया है कि अब किसी भी प्रकार का खनिज निकालने के लिए ,खनिज उत्खनन के लिए पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित सेंट्रल एनवायरमेंट एम्पेक्ट असेसमेंट कमेटी /सिया/ से पर्यावरणीय अनुमति लेना आवश्यक है। इस आदो के बाद मधयप्रदेश में गौण खनिज रेत,गिट्टी,मुरम,बोल्डर भी बिना अनुमति के नहीं निकाले जा सकेगें। छोटी हो या बडी किसी भी प्रकार की खुदाई के लिए खदान के लिए एन ओ सी लेना अनिवार्य कर दिया गया है। इस आदेश का सीधा असर खनन करके करोडों का कारोबार करने वालों पर पडा है जो कि खुदाई पर प्रतिबंध महसूस कर रहे हैं। इस प्रतिबंध से  खनन , उत्खनन रूकने क साथ साथ,खनन माफिया की मौटी कमाई भी रूक गई है।इसके साथ ही खनन उत्खनन से मधयप्रदेश शासन को प्रापत होने वाली आय पर भी विपरीत असर पडा है।  राज्य सरकार खनिज उत्खनन से होने वाली आय को कम नहीं होने देना चाहती है।

                यही कारण है कि राष्ट्रीय हरित अभिकरण के आदेश के विरूधद राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर कर दी है। खनिज,उत्खनन के पक्ष में राज्य सरकार का कहना है कि  5 एकड तक की गौण खनिज की खदानों को पर्यावरणीय स्वीकृति /एन ओ सी/ से मुक्त रखा जाये। राज्य शासन के अनुसार मधयप्रदेश में गौण खनिज की छोटी छोटी खदानों की संख्या अधिक है। राज्य सरकार को खनिज मद में सर्वाधिक राजस्व मिलता है। शासन से जुडे सूत्रों के मुताबिक यदि गौण खनिज -छोटी खदाना के लिए भी एन ओ सी अनिवार्य कर दी जायेगी तो खदान संचालकों को खनन का काम करने में मुश्किल होगी। कई जगह तो खनन हो ही नहीं पायेगा। ऐसे में खदान संचालकों का धंधा तो बंद होगा ही, राज्य सरकार को प्रतिवर्ष खदानों से मिलने वाली आय में भारी नुकसान हो जायेगा। 

                दूसरी ओर राष्ट्रीय हरित अभिकरण पर्यावरण के मुद्दे पर नियम कानूनों में किसी प्रकार की छूट नहीं देना चाहता है। अभिकरण के लिए पर्यावरण का संरक्षण ही प्राथमिकता है जबकि राज्य सरकार को राजस्व की अधिक चिंता हो रही है।

                प्रसंगवश यह बताना जरूरी होगा कि मधयप्रदेश में कटते जंगल, अवैध उत्खनन , पावर प्लांट के साथ बढते प्रदूषण के कारण पर्यावरण को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। खदान के कारोबारियों,छुटभैये नेताओं से लेकर बहुराष्टीय कम्पनियों तक सभी इस राज्य की प्राकृतिक सम्पदा का बेहिसाब दोहन करने में लगे है। आदिवासी बहुल झाबुआ से लेकर कटनी, सिगंरौली, मण्डला, सिवनी, बालाघाट, भिण्ड, मुरैना, टीकमगढ, छतरपुर,होशगांबाद सहित अन्य जिलों में पहाडों को काटकर समतल कर दिया गया । जमीन में गहरे तक खुदाई करके खनिज निकालने के नाम पर पेड-पौधो,जीव-जंतुओं ,वनस्पतियों को नष्ट कर दिया गया। नदी की गहराई से रेत निकालने वालों ने जलीय जीव जंतुओं को बैमौत मार डाला। यह सब कुछ अब भी लगातार चल रहा है। वैध -अवैध खनन करनेवालों को रोकने की जिन्होने कोशिश की वे खनिज इन्सपेटर हों या पुलिस अधीक्षक उन्हें खनन माफिया ने मार डाला। ऐसे आतंक के माहौल में खनन का कारोबार रोकने की हिम्मत कौन कर सकता है। अवैध खनन के अनेक आरोपी अब भी खुलेआम घूम रहे है। खनन के प्रकृति को बचाने के प्रभावी उपाय कब नजर आयेगें ? सबसे बडा सवाल यह भी है ।  


? अमिताभ पाण्डेय