संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

पश्चाताप नही आत्मचिंतन करें कांग्रेस

? जे.पी.शर्मा

          हाल ही में देश के पांच राज्यो में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजो में जीत की उम्मीद लगाये बैठी कांग्रेस पार्टी को मिजोरम को छोडकर शेष राज्यों मे करारी हार का सामना करना पडा है। देश की जनता आगामी लोक सभा चुनाव के परिणामो को भी विधान सभा चुनाव के परिणामों के तराजू से तोल रही है,लेकिन ऐसा उचित नही हैं। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस आज भी देश के लगभग 8राज्यो में सत्ता में है। विधान सभा चुनावों में कांग्रेस द्वारा बिना रणनीति बनाये चुनाव लडा गया जिसके परिणाम स्वरूप कांग्रेस को चारो राज्यो में करारी हार का स्वाद चखना पडा ।

                    विधान सभा चुनाव परिणामो में  कांग्रेस की पराजय का एक कारण विगत दो वर्षो में घटित हुई घटनाये भी है। सर्वप्रथम दिल्ली विधान सभा चुनाव के परिणाम पर दृष्टि डाले तो दिल्ली की जनता के साथ ही सारे देश की जनता इस बात से अनभिज्ञ नही है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने राज्य और राष्ट्रीय राजधानी में स्थिर सरकार देने के साथ अच्छी सडकों, सेकडो फ्लाईओवर आदि के रूप में जो सौगातें जनता को दी है वे आश्चर्यजनक है। इन्ही कार्यो से यह लग रहा था कि शायद दिल्ली की जनता कांग्रेस सरकार को कभी भी अलविदा नही कहेगी। यह बात स्वयं भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार की गई थी। श्री मोदी ने दिल्ली की चुनावी सभा में अपने उद्बोधन में कहा था कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पास फीते काटने के अलावा कोई काम नही है। इससे यह स्पष्ट है कि फीता वहीं कटता है जहाँ विकास कार्य पूर्ण होते है। लेकिन इन सारी उपब्धियों पर दिल्ली गेंगरेप की एक वीभत्स एवं शर्मनाक घटना ने पानी फेर दिया। दिल्ली की जनता ने यह स्पष्ट कर दिया कि चाहे विकास भी न हो ओर एक वक्त की रोटी ही मिल जाये पर हम नारी जाति के साथ घृणितकृत्य को बर्दाश्त नही करेगे। परिणाम स्वरूप दिल्ली मेंकांग्रेस पार्टी को हार का स्वाद चखना पडा। चारो राज्यो में कांग्रेस की हार का एक महत्वपूर्ण कारण देश मेंहुए कांग्रेस विरोधी आंदोलनो को भी जाता है। इन आंदोलनो में एक मात्र कांग्रेस पार्टी को ही भ्रष्टाचार का बादशाह बताया गया एवं उसी के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया। जबकि मध्य प्रदेश के चुनावी नतीजो पर गौर करे तो यहाँ तो महिलाओं से संबन्धित अपराधों एवं भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार के कई मंत्रियों सहित माननीय मुख्यमंत्री जी की भी जमानत जप्त होना थी लेकिन ऐसा नही हुआ। मध्य प्रदेश में भाजपा तीसरी बार प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता में आई शिवराज सिंह सरकार की लोक लुभावनी नीतियों के प्रभाव के आगे भ्रष्टाचार एवं महिला अपराध का मुद्दा गौण रह गया।

                मध्य प्रदेश मे दिग्विजय सिंह के शासन काल की तुलना शिवराज सिंह की सरकार से की जाये तो पिछडे हुये मध्य प्रदेश में  विकास की फसल दिग्विजय सिंह के शासन काल में बोई गई थी जिसे भाजपा की सरकार द्वारा काटा गया। आज प्रदेश भर मेंलबालब भरे हुए तलाबो का निर्माण दिग्विजय सिंह के शासन काल में  किया गया था। सरकारी नोकारियों मेंसीधी भर्ती करके प्रदेश के ग्रामीण शिक्षित युवाआें को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार प्रदान करने वाले देश के प्रथम मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ही रहे है। उन्होने मध्य प्रदेश मेंपंचायती राज व्यवस्था लागू कर सत्ता का विक्रेन्द्रीकरण कर ग्राम स्वराज की स्थापना की। मध्य प्रदेश मे दिनांक 14.12.2013को श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में तीसरी नवगठित सरकार के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद उन्होने प्रदेश की गरीब जनता के लिए एक रूपये प्रति किलो चावल देने की घोषणा कर गरीबों को प्रभावित कर पुन: लोक सभा चुनाव के वोट फिक्स कर करने का प्रयास किया है। वास्तव में मध्य प्रदेश के लोगो की सोच आज भी इतनी नही है कि वह भी आर्थिक विकास का 20 रूपये प्रति किलो ग्राम की चावल खरीद कर खा सके। दूसरा मध्य प्रदेश में कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण यह है कि कांग्रेस द्वारा सिंधिया को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष तो बना दिया गया किन्तु किसी को भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नही किया गया। इस कारण प्रदेश की जनता ने मध्य प्रदेश मे कांग्रेस पार्टी को बिना दूल्हे की बारात माना एवं विचार किया कि अगर कांग्रेस को प्रदेश में  जनाधार मिलता है तो पता नही किस अयोग्य व्यक्ति के हाथों पार्टी प्रदेश की बागडोर सौंप देगी। इस कारण प्रदेश की जनता ने कांग्रेस पार्टी को डगमगाते भरोसे के कारण नकार दिया। परिणाम स्वरूप मध्य प्रदेश में  कांग्रेस के मुठ्ठी भर विधायक ही विधान सभा में  पहुच सके।

              इसी श्रृंखला में  अब छत्तीसगढ विधान सभा चुनाव परिणामो पर विचार किया जाये तो गत वर्ष छत्तीसगढ में नक्सलियों ने कांग्रेस के कुनबे को ही मौत के घाट उतार दिया था। इससे ऐसा लग रहा था कि सहानुभूति की लहर में  छत्तीसगढ में कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार बनेगी। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने वहां भी वही गलती की जो मधय प्रदेश में की थी। छत्तीसगढ में कांग्रेस पार्टी ने मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार घोषित नही किया। जनता के समक्ष यह दुविधा की स्थिति थी कि  कही पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को ही कांग्रेस पार्टी छत्तीसगढ का नेतृत्व न सौंप दे जिनपर कांग्रेसी कार्यकर्ताओ की हत्या में नक्सलियों की मदद करने की आशंका व्यक्त की जा रही थी। इस कारण छत्तीसगढ मे भी कांग्रेस को जीत की दहलीज से वापस लौटना पडा। अब राजस्थान विधान सभा चुनावो के परिणामों पर विचार किया जाये तो राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा अपने पांच वर्षो के कार्यकाल के अंतिम दो वर्षो में कई जन कल्याणकारी योजनायें चलाई गई लेकिन वहां सरकार के ही एक मंत्री श्री बाबूलाल नागर महिला यौन शोषण के मामले में आरोपी बने । जिसके कारण भी गहलोत सरकार पर प्रश्न चिन्ह लगाये गये। दूसरा कारण राजस्थान में  यह परंपरा भी है कि वर्तमान सरकार चाहे कितनी ही जनहितेषी हो वहां की जनता हर पांच वर्षो में अपना शासक बदल देती है। कारण जो भी रहा हो महारानी वंसुधारा की प्रचंड बहुमत से ताजपोशी हुई । अब प्रश्न उठता है कि क्या इन चारो राज्यो में  कांग्रेस की करारी हार का असर आगामी लोक सभा चुनाव पर भी पडेगा? तो इस बात से इंकार नही किया जा सकता है कि अगर कांग्रेस ने समय रहते चुस्ती दिखाते हुए सही वक्त पर अविलम्ब अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नही की तो शायद लोक सभा चुनाव मे भी कांग्रेस पार्टी को विधान सभा चुनाव से भी बद्तर स्थिति से गुजरना पडेगा। अतएव पार्टी के लिये बेहतर होगा-- ''बीति ताहि बिसार कर आगे की सुधि लेई''। आशा है कि विधानसभा चुनावों के परिणामों से कांग्रेस सबक लेगी एवं उन गलतियों को नही दोहराएगी जो उसने चार राज्यों में की है। कांग्रेस को पश्चाताप नही बल्कि आत्मचिंतन की जरूरत है।

? जे.पी.शर्मा