संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार में

मंत्रिमण्डल अयोग्य, मुख्यमंत्री योग्य

? वीरेन्द्र जैन

        क लोक कथा के अनुसार दूल्हा का एक हाथ टूटा हुआ है, सिर पर बाल नहीं हैं, सुनाई कम देता है, भेंगा है, रंग गहरा काला है पर फिर भी उसे सुन्दर बताया जा रहा है क्योंकि उसका गुणगान करने वाले बहुत वाक्पटु हैं। मध्य प्रदेश की भाजपा की सरकार के तीसरी बार चुने जाने पर ही ऐसा ही गुणगान किया जा रहा है।

               प्रदेश की सरकार को मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रि परिषद चलाती है जो लोकतांत्रिक ढंग से अपने फैसले लेती है, जिसे कार्यपालिका लागू करती है। किसी भी सरकार की उपलब्धियां उसके मंत्रिमण्डल के सामूहिक प्रयास का फल माना जाता है और उसी तरह उसके अलोकप्रिय फैसलों के लिए भी पूरी मंत्रिपरिषद जिम्मेवार होती है। किंतु पिछले वर्षों से यह देखा जा रहा है कि प्रदेश की सारी प्रचारित उपलब्धियों का श्रेय मुख्यमंत्री को दिया जाने लगा है जिसके परिणाम स्वरूप जनता के कटु अनुभवों का नुकसान तो सम्बन्धित विभाग के मंत्रियों को उठाना पड़ता है और प्रचार में खर्च किये गये अटूट धन का सारा लाभ मुख्यमंत्री की छवि चमकाने में लग जाता है। गत विधान सभा चुनावों में मंत्रिपरिषद के एक तिहाई वरिष्ठ मंत्रियों की पराजय और नये मंत्रिमण्डल में कुछ पुराने मंत्रियों को स्थान न दिये जाने से जो चित्र उभरता है वह सरकार के पिछले कार्यकाल के बारे में ऐसी कहानी कहता है जो सरकारी प्रचार से भिन्न है।  

                1-   प्रदेश के वित्ता योजना, आर्थिक और सांख्यकी तथा वाणिज्यिक कर मंत्री श्री राघव जी से एक असामाजिक अपराध के आरोप में त्यागपत्र ले लिया गया था। त्यागपत्र देने के बाद वे गायब हो गये थे और एक मकान से पुलिस ने उन्हें तलाश कर गिरफ्तार किया था। उनके निकटतम कुछ लोग जिन पर कुछ आर्थिक अनियमिताओं के आरोप भी थे, लगातार फरार रहे और चुनावों में अपनी भाजपा सरकार बन जाने के बाद ही आत्म समर्पण किया।

                2-   प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा अपना चुनाव क्षेत्र बदलने के बाद भी हार गये। उससे पहले भी वे जमीन से जुड़े एक प्रकरण में मंत्रिमण्डल से हटाये जा चुके थे और लम्बे समय तक मंत्रिमण्डल से बाहर रह कर मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की आलोचना करते रहे थे।

               3-   उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास, संस्कृति, जनसम्पर्क, धार्मिक न्यास और धर्मस्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा चुनाव हार गये। उनके चुनाव हार जाने के बाद ही करोड़ों रुपयों का व्यापम घोटाला उजागर हुआ जिसके बारे में पुलिस की खोजबीन से बचने के लिए वे अंतर्धयान हो गये। पूर्व मुख्यमंत्री उमाभारती ने सार्वजनिक बयान में कहा कि वे मुख्यमंत्री और संगठन के प्रिय व्यक्तियों में से एक हैं, मेरे भाई के समान हैं अत: उन्हें फरार न रह कर उपस्थित हो जाना चाहिए।

                4-   राजस्व व पुनर्वास मंत्री करण सिंह वर्मा, चुनाव हार गये।

                5-   किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री राम कृष्ण कुसमारिया खुद तो चुनाव हार ही गये उनके  साथ उनके ही विभाग के राज्य मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह भी चुनाव हार गये। स्मरणीय है कि संघ से जुड़े किसान संघ ने चुनावपूर्व वर्ष में हजारों किसानों के ट्रैक्टरों के साथ मुख्यमंत्री बंगला घेर लिया था और लगातार दो दिन तक घेरे रहे थे। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री स्वयं को किसान का बेटा बतलाते हैं।

                6-   आदिमजाति और अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री हरिशंकर खटीक चुनाव हार गये हैं जो सरकार के अनुसूचित जाति और जनजातियों के मंत्रालय के काम के बारे में मतदाताओं की प्रतिक्रिया का सूचक है।

                7-   पशु पालन, मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विभाग, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण, नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मंत्री अजय विश्नोई भी मतदाताओं द्वारा नकार दिये गये हैं। स्मरणीय है कि इससे पूर्व भी मंत्रिमण्डल से हटाये गये थे व उनके रिश्तेदारों के यहाँ आयकर विभाग की सर्च हो चुकी है। उनके साथ विभाग के राज्य मंत्री दशरथ सिंह भी पराजित हो गये। 

                8-   सामान्य प्रशासन, नर्मदा घाटी विकास, और विमानन के राज्यमंत्री के एल अग्रवाल चुनाव हार गये हैं।

                9-   किसान ही नहीं श्रमिकों के कल्याण के श्रम मंत्री जगन्नाथ सिंह को भी मतदाताओं ने हरा दिया है।    

               10-   लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह ने तो भविष्य की सम्भावनाएं देखते हुए पहले ही हथियार डाल दिये थे और चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया था।

               11-   परिवहन एवं जेल मंत्री रहे जगदीश देवड़ा चुनाव तो जीत गये किंतु लक्ष्मीकांत शर्मा की तरह शिवराज सिंह का दिल नहीं जीत पाये इसलिए उन्हें नये मंत्रिमण्डल में जगह नहीं मिली।

                12-   स्कूल शिक्षा मंत्री रही अर्चना चिटनीस भी नये मंत्रिमण्डल में शामिल होने की योग्यता प्रमाणित नहीं कर सकीं।

                13-   महिला एवं बाल विकास मंत्री रंजना बघेल भी लाड़ली लक्ष्मी योजना और कन्यादान योजना के व्यापक प्रचार का श्रेय मुख्यमंत्री से नहीं छीन सकीं और नये मंत्रिमण्डल में जगह नहीं बना सकीं।

                14-   पर्यटन, खेल और युवा कल्याण मंत्री तुकोजी राव पंवार जिन्हें पिछली बार महिला निर्वाचन अधिकारी के साथ असंयत व्यवहार के बाद भी मंत्री बना दिया गया था पर इस बार मंत्री के योग्य नहीं पाया गया।

                15-   गृह परिवहन और जेल के राज्यमंत्री बार बार यह शिकायत करते रहे कि पुलिस के थानेदार तक उनकी नहीं सुनते इसलिए उन्हें मंत्रिमण्डल में न लेकर अपने रिश्तेदारों की सेवाओं के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया गया।

                16-   लोक स्वास्थ और परिवार कल्याण, चिकित्सा शिक्षा, आयुष, तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास जैसे मंत्रालयों के राज्य मंत्री महेन्द्र हार्डिया अपने केबिनेट मंत्री नरोत्ताम मिश्रा का सहयोग नहीं कर सके इसलिए उन्हें मंत्रिमण्डल में स्थान नहीं दिया गया।

                17-   वन और राजस्व विभाग में राज्यमंत्री रहे जय सिंह मरावी के मूल्यांकन ने उन्हें पुन: मंत्री बनाये जाने के योग्य नहीं पाया।

                18-   नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के राज्यमंत्री मनोहर ऊँटवाल जिनके विशेष कर्तव्य अधिकारी के व्यवहार के कारण एक व्यक्ति ने जहर खा लिया था मंत्रिमण्डल में स्थान नहीं पा सके।

                19-   स्कूल शिक्षा मंत्री नानाभाऊ मोहोड़ भी अपनी केबिनेट मंत्री की तरह पुन: पद सुशोभित करने से वंचित रखे गये।    

                पूरे प्रदेश में झाड़ूमार जीत का दावा करने वाली पार्टी ने 51 में से 32 जिलों से कोई मंत्री नहीं बनाया है वहीं नये मंत्रिमण्डल के सात मंत्री ऐसे हैं जिन पर लोकायुक्त में प्रकरण लम्बित हैं। कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनावों में अच्छी उपलब्धि दिखाने का चारा डाल कर मंत्रियों के कुछ पद रिक्त रखे गये हैं। देखना होगा कि इस चारे में कितने विधायक फंसते हैं।

? वीरेन्द्र जैन