संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

स्टेच्यू आफ यूनिटी

वर्णमीडिया की प्रसन्नता के क्या मायने हैं ?

? सुभाष गाताड़े

        जिस शख्स पर पूरे मुल्क का अधिकार था उसका अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे नरेन्द्र मोदी द्वारा अपहरण किया गया है, यह वही साम्प्रदायिक संगठन है जिसके खिलाफ सरदार पटेल ताउम्र लड़ते रहे ..भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर ताजपोशी के बाद सरदार पटेल की मूर्ति के निर्माण का एकमात्र मकसद यही है कि भारत की आजादी के आन्दोलन के अग्रणी के नाम पर 2014 के चुनावों में वोट बटोरे जा सकें। इसलिए यह एक विडम्बना ही दिखती है कि संघ प्रचारक द्वारा एकता का ढकोसला उस शख्स की मूर्ति खड़ी करके किया जा रहा है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जबरदस्त विरोधी था। ( http:// www.truthofgujarat.com/facade-unity-rss-abducts-sardar-patel/ Facade of Unity - RSS Abducts Sardar Patel, Pratik Sinha October 31, 2013 |

                एनडीटीवी ने गुजरात के जामनगर इलाके के भनवड के कामर्स कालेज के एक छात्र को उध्दृत करते हुए बताया : हमें निर्देश दिया गया था कि हमें 'रन फार यूनिटी' में शामिल होना पड़ेगा। मगर जब हम लोग शामिल नहीं हो सके, तब प्रशासन की तरफ से हमारे खिलाफ नोटिस जारी किया गया और हमें कहा गया कि हमें सौ रूपया प्रति व्यक्ति जुर्माना देना पड़ेगा। हमें धमकाया गया कि हमें इम्तिहान में बैठने नहीं दिया जाएगा ! (http://www.truthofgujarat.com/rs-5-attending-modis-rally-rs-100/

               हिटलर के उदय के बाद फासीवाद को बेपर्द करती हुई महान फिल्मकार चार्ली चैपलीन द्वारा बनायी गयी फिल्म ' द ग्रेट डिक्टेटर' का वह दृश्य  कितने लोगों को याद है, जब 'डिक्टेटर' बने चार्ली चैपलीन से मिलने उनका प्रतिद्वंदी पहुंचता है और अपने आप को उंची पायदान पर साबित करने के लिए चैपलीन अपनी कुर्सी को उसकी कुर्सी से ऊंची करते जाते हैं। दर्शकों को हंसी के फव्वारे में डूबा देने वाले उस दृश्य का अन्त तब होता है कि जब अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने में मुब्तिला चैपलीन अचानक जमीन पर आ गिरते हैं।

               चैपलीन की कालजयी फिल्म की याद पिछले दिनों अचानक तरोताजा हुई जब खबर आयी कि गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री एवं भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी की पहल पर मुल्क के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल की याद में दुनिया की सबसे उंची प्रतिमा बनायी जा रही है। यह प्रस्तावित मूर्ति अमेरिका स्थित स्टैचू आफ लिबर्टी से दुगुनी है और रिओ डि जानीरो स्थित ईसा की मूर्ति से चार गुना लम्बी है। इस विशालकाय मूर्ति के निर्माण एवं आसपास के इलाके में निर्माण के काम का ठेका अमेरिका की टर्नर कन्स्ट्रक्शन को दिया गया है, जिसने दुबई में बुर्ज दुबई जैसी विशालकाय रचना को बनाया है और न्यूयॉर्क में यांकी स्टेडियम का निर्माण किया है। इस प्रोजेक्ट के लिए अनुमानत: 2500 करोड रूपए की राशि के लगने का अनुमान है, यहां तक कि टर्नर कम्पनी की कन्स्लटन्सी फी ही 61 करोड़ रूपए के आसपास होगी। अभी चन्द रोज पहले ही भाजपा ने देश के पैमाने पर सैकड़ों स्थानों से 'रन फार यूनिटी' नाम से दौड़ का आयोजन कर मोदी की इस प्रिय परियोजना को जोरदार ढंग से आगे बढ़ाया।

                अब हमें यहभी बताया जा रहा है कि इसके बाद भाजपा के कार्यकर्ता एवं संघ परिवारी संगठनों के स्वयंसेवक देश में लोगों से मिल कर इस परियोजना की अहमियत के बारे में बताएंगे और उनसे लोहे का योगदान मांगेंगे। इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि सरदार पटेल एक किसान थे, विशेष जोर उन्हीं पर दिया जाएगा और उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया जाएगा कि 25,000 टन लोहे से बन रही इस मूर्ति के निर्माण में वह भी लोहे का योगदान दें।

               वे सभी जो संघ परिवारी संगठनों की गतिविधियों से वाकीफ हैं, वह बता सकते हैं कि दो दशक पहले संघ परिवारी संगठनों ने इसी किस्म की एक व्यापक मुहिम चलायी थी और पांच सौ साल पुरानी बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मन्दिर के निर्माण के काम में योगदान देने के लिए लोगों से र्इंटें इकट्ठा की थी। आज की तारीख में ये तमाम ईंटें हिन्दुत्ववादी संगठनों के गोदामों में पड़ी हैं और राम मन्दिर निर्माण की इस मुहिम की परिणति बाबरी मस्जिद के विधवंस और उसके बाद हुए साम्प्रदायिक दंगों में हुए अरसा बीत चुका है।

              जहां तक इस 'स्टेच्यू आफ यूनिटी' की बात है तो वह उसकी वेबसाइट (www.statueofunity.com) के हिसाब से वह साधु बेट नामक स्थान पर स्थित होगी, जो सरदार सरोवर बांध से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित है। इस मूर्ति की उंचाई 182 मीटर है, जो एक तरह से दुनिया में सबसे उंची मूर्ति में शुमार होगी। इस प्रोजेक्ट की मिल्कियत गुजरात सरकार द्वारा समर्थित 'सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट' के पास होगी। इस स्मारक के पास सरदार पटेल के जीवन से जुड़े पहलुओं पर बना म्युजियम भी होगा और एक रिसर्च सेन्टर भी होगा जो पटेल के लिए अहमियत रखनेवाले मसलों पर रिसर्च को बढ़ावा देगा। गौरतलब है कि जनतंत्र का प्रहरी कहलानेवाले मीडिया ने इस समूची परियोजना की छानबीन करने की जरूरत भी महसूस नहीं की है और न इस बात की पड़ताल की है कि इसके 'सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव' किस तरह के होंगे।

              मीडिया के मौन को समझना कठिन काम नहीं है। जैसे जैसे भ्रष्टाचार के तमाम मामलों एवं बढ़ती महंगाई के चलते कांग्रेस की वैधता संकट में फंसती दिख रही है और वह कार्पोरेट सेक्टर एवं धनी तबकों के लिए जरूरी मसलों पर अपनी वजहों से आनाकानी करती दिख रही है, इस देश में सम्पन्नों एवं पूंजीशाहों के बीच से एक 'निर्णायक' नेतृत्व की मांग जोर पकड़ रही है और मोदी की कार्पोरेट परस्त छवि उनके लिए बेहद अनुकूल है। दरअसल काफी समय से कार्पोरेट सम्राटों का एक अच्छा खासा हिस्सा 'प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी' की मुहिम से खुल कर जुड़ा दिखता है। उनके लिए 2002 की वह घटनाएं जब मोदी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान अल्पसंख्यकों का कतलेआम चला था और तमाम लोग अपने घरों से विस्थापित कर दिए गए थे - जो आज भी घरों को लौट नहीं सके हैं - महज एक विवरण का हिस्सा है। न वह इस बात को याद करना चाहते हैं कि खुद मोदी की पार्टी के वरिष्ठतम नेता वाजपेयी ने इसके लिए उनकी प्रशासनिक क्षमता पर सवाल उठाया था, जब उन्होंने मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह दी थी।

               वैसे मुख्यधारा के मीडिया के मौन ने उन तमाम लोगों एवं कार्यकर्ताओं को खामोश नहीं किया है जो आम जनों की बेहतरी एवं उनके सम्मान की हिफाजत के लिए लगातार संघर्षरत रहते आए हैं। उनका कहना है कि ' न केवल मि नरेन्द्र मोदी, जिन्होंने 'स्टेच्यू आफ यूनिटी' की आधारशिला रखी और न ही उनका सेक्रेटरियएट, प्रस्तावित परियोजना को पर्यावरणीय क्लीअरेन्स मिला है या नहीं इसके बारे में अनभिज्ञ दिखते हैं या स्पष्टत: कुछ कहना नहीं चाहते हैं।' इन कार्यकर्ताओं, विचारकों ने केन्द्र सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के मुख्य सेक्रेटरी को इस सम्बन्ध में लिखा है और इसकी प्रतिलिपि गुजरात के मुख्यमंत्री एवं गुजरात के मुख्य सचिव, प्रधान सचिव तथा सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट को भी भेजी है जिसमें पर्यावरण, सामाजिक और सुरक्षा सम्बन्धी मसले उठाए हैं। उन्होंने जारी की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक 'उन्हें मुख्यमंत्री के सचिवालय से पत्र मिला है, जिसने खुद जानकारी देने के बजाय हमारे पत्र को गुजरात राज्य के अन्य दो महकमों को भेजा है।' उनके मुताबिक 'जबकि पर्यावरणीय क्लीअरेन्स देने के लिए या उसका प्रक्रियायन/प्रोसेसिंग करने के लिए जिम्मेदार विभाग खामोश है जबकि मुख्यमंत्री का सचिवालय इस मामले में गोलमोल जवाब दे रहा है।'

                मालूम हो कि इस प्रोजेक्ट के लिए देशव्यापी समर्थन जुटाने के लिए 15 दिसम्बर 2013 को आयोजित 'रन फार यूनिटी' कार्यक्रम के चन्द रोज पहले जारी इस निवेदन में उन्होंने इसमें शामिल होने के लिए इच्छुक लोगों से अपने सरोकारों एवं सवालों को सम्प्रेषित करने की कोशिश की थी और यह बताया था कि आखिर वह क्यों इस परियोजना के सामाजिक एवं पर्यावरणीय आकलन की जरूरत को, जनतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया जैसे मसलों को उठा रहे हैं। उनके मुताबिक उन तमाम लोगों को 'जनाब नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार से इससे जुड़े तमाम कानूनी एवं नैतिक प्रश्नों को उठाना चाहिए।' प्रेस विज्ञप्ति का अन्त इस प्रश्न के साथ होता है कि आखिर क्यों ''आम नागरिकों एवं छात्रों को सरकार की ऐसी परियोजना का हिस्सा बनाना चाहिए जो देश के कानून, संविधान और गरीब, आदिवासी एवं पर्यावरण के सरोकारों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करता हो।'

                यहां इस समूह द्वारा केन्द्र सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के सचिव डा वी राजगोपालन को 7 नवम्बर 2013 को भेजे गए पत्र में लिखी मुख्य बातों को उदधृत करना समीचीन होगा जिसमें उन्होंने इस परियोजना की विस्तृत पर्यावरणीय पड़ताल की मांग की थी :

                 - सरदार सरोवर बांधा के पास, शूलपनेश्वर सेंक्चुअरी से महज 3.2 किलोमीटर, पर्यावरण के हिसाब से बेहद संवेदनशील इलाके में सरदार पटेल की इस विशालकाय मूर्ति का - जो दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति होगी का - निर्माण किया जा रहा है। कानूनी तौर पर आवश्यक पर्यावरणीय क्लीअरेन्स लिए बगैर, पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव का आकलन किए बगैर या किसी भी तरह से जनता से रायमशविरा किए बगैर इस काम की शुरूआत की गयी है।

                - यह पूरी तरह गैरकानूनी है और 1986 में बने पर्यावरणीय सुरक्षा अधिनियम तथा सितम्बर 2006 में जारी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) नोटिफिकेशन का उल्लंघन करता है और नदी के किनारे इस किस्म के विशाल निर्माण को लेकर जारी अदालती आदेशों को भी चुनौती देता है। याद रहे कि 31 अक्तूबर 2013 को बड़ी धूमधाम के साथ एवं मीडिया की मौजूदगी में इसकी आधारशिला रखी गयी। इसके निर्माण के लिए टेण्डर भी जारी किए जा चुके हैं। सरदार सरोवर बांध से 12 किलोमीटर दूर बन रहे गरूडेश्वर बंधारा को लेकर निर्माण कार्य भी बिना सामाजिक या पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के, लोगों से सलाह मशविरा किए बिना और नर्मदा कन्टे्राल आथारिटी के एनवायरोनमेन्टल सबगु्रप की तरफ से पर्यावरणीय क्लीअरेन्स मिले बिना शुरू हो गया है।

               - इस परियोजना के लिए अनुमानित राशि 2,500 करोड रूपए है।

               इससे सम्बधित अहम मुद्दे इस प्रकार हैं :

                1. इस प्रोजेक्ट के लिए सितम्बर 2006 के ईआए नोटिफिकेशन के तहत पर्यावरणीय क्लीअरेन्स की जरूरत है, मगर कहीं भी उसे पाने की या उसके लिए आवेदन करने की प्रक्रिया चलायी गयी है।

                 2. शूलपनेश्वर शरणाश्रय/सेक्चुअरी की सीमा सरदार सरोवर जलाशय से स्पर्श करती है। चूंकि यह मूर्ति सरदार सरोवर बांध से मुश्किल से 3.2 किलोमीटर दूर है, वह शूलपनेश्वर शरणाश्रय से भी नजदीक है।

                3. प्रोजेक्ट के लिए नदी के पात्र में निर्माण करना पड़ेगा और प्रस्तावित जलाशय भी पर्यावरण के प्रति सम्वेदनशील इलाके के करीब है, जिसका गम्भीर प्रभाव पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी पर पड़ेगा।

                 4. इस परियोजना का नदी के नीचले हिस्से पर, उसकी जैवविविधता, लोगों और उनकी जीवनयापन पर प्रभाव पड़ेगा

                 5. सरदार सरोवर बांध के निर्माण के दिनों में ही मजबूत चट्टानों में खदान कार्य के चलते, इलाके की ढांचागत स्थिरता को लेकर पहले ही काफी सवाल उठ चुके हैं, जिन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। गुजरात सरकार से सम्बधित 'इन्स्टिटयूट आफ सेस्मालोजिकल रिसर्च' द्वारा इस सम्बन्ध में किए गए भूकम्पीय खतरा विश्लेषण पर विश्वास नहीं रखा जा सकता बशर्ते इसे लेकर अन्य जानकारों को भेजा जाए।

                 चालीस अग्रणी बुध्दिजीवियों, सांस्कृतिक कर्मियों, पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं ने केन्द्र सरकार के पर्यावरण सचिव के समक्ष निम्नलिखित मांगें पेश की हैं :

                1. गुजरात सरकार को यह आदेश दिया जाए कि वह प्रोजेक्ट की पर्यावरणीय क्लीअरेन्स हासिल करने के लिए आवेदन दे और जब तक वह हासिल नहीं होता है तब तक प्रोजेक्ट से सम्बधित काम न करे।

                 2. 'स्टेच्यू आफ यूनिटी' नामक प्रस्तावित परियोजना पर तत्काल रोक लगा दी जाए और गुजरात सरकार को यह आदेश दिया जाए कि वह इससे सम्बधित गतिविधियों को तत्काल रोक दे।

                3. 31 अक्तूबर को 'स्टेचू आफ यूनिटी' शीर्षक से प्रस्तावित परियोजना की रखी गयी आधारशिला को गैरकानूनी घोषित किया जाए।

                 कोई भी व्यक्ति इस विरोधाभास को नोट कर सकता है कि किस तरह वही मीडिया सुश्री मायावती द्वारा अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में दलित मुक्ति के योध्दाओं की मूर्तियां स्थापित करने को लेकर किस हद तक उद्वेलित दिखता था। अख़बारों के डेस्क पर विराजमान या टीवी स्टुडियो में प्रतिष्ठित तमाम बौध्दिक जन बार बार इसी बात को दोहराते रहते थे कि इन मूर्तियों पर खर्च करने के बजाय अगर वह रोड बनाने, स्कूलों एव अस्पतालों को निर्माण करने पर जोर देती तो प्रदेश का कल्याण होता। अपनी खुद की मूर्ति का अनावरण करने के लिए सुश्री मायावती का मज़ाक उड़ानेवाला वहीं मीडिया इसमें पैसे की बरबादी देख रहा था। मायावती के विरोधियों के लिए यह तमाम पार्क, वे तमाम मूर्तियां 'अनुत्पादक परिसम्पत्ति' में शुमार थे। गौरतलब है कि जनतंत्र का प्रहरी कहलानेवाला मीडिया एक व्यक्तिविशेष की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए इतने बड़े पैमाने पर हो रहे व्यय, - जिन पर अनुमानत: सुश्री मायावती की सरकार द्वारा व्यय की गयी राशि से पांच गुना पैसा लगाया जाएगा - पर्यावरण को पहुंचाया जा रहा नुकसान आदि को लेकर पूरी तरह मौन दिखता है, जबकि खुद गुजरात के मानवविकास सूचकांक सबसहारन अफ्रीका के कई मुल्कों की तरह ही औसत से कम दर्जें के हैं। वंचितों एव हाशिये पर पड़े लोगों के प्रति मीडिया के तमाम सरोकार वायवीय मालूम पड़ते हैं। एक विश्लेषक ने ठीक ही लिखा है कि उंची जातियों के प्रभुत्ववाले मीडिया के दलितों एवं बहुजनों के प्रति गहरी दुर्भावना का ही इसमें प्रतिबिम्बन है, जहां उसे यह बात मंजूर नहीं है कि दलित इतिहास की अपनी वैकल्पिक समझदारी पेश करें।

              मोदी की कार्यशैली से वाकीफ लोग बता सकते है कि भले ही तमाम कार्यकर्ताओं द्वारा आक्षेप प्रगट किए गए हों, उसके चलते पर्यावरण को होने वाले जबरदस्त नुकसान की बात सामने आयी हों, मगर मोदी इस परियोजना से पीछे नहीं हटेंगे ! वैसे अपने आप को पटेल का सच्चा वारिस घोषित करने की जनाब मोदी की हडबडाहट में कई सारे ऐसे सवाल छिपे है, जो खुद मोदी एवं संघ परिवार के लिए बेहद असुविधाजनक जान पड़ सकते हैं।

              अब जनाब मोदी भले ही स्मृतिलोप का शिकार हुए हों, मगर दुनिया सरदार वल्लभभाई पटेल को एक ऐसे शख्स के तौर पर जानती हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या हिन्दु महासभा की वास्तविकता से एवं उनकी घृणा की राजनीति से बखूबी परिचित थे। यह अकारण नहीं कि गांधी हत्या के महज चार दिन बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबन्दी लगानेवाला आदेश जारी हुआ -जब वल्लभभाई पटेल गृहमंत्री थे - जिसमें लिखा गया था :

              संघ के सदस्यों की तरफ से अवांछित यहां तक कि खतरनाक गतिविधियों को अंजाम दिया गया है। यह देखा गया है कि देश के तमाम हिस्सों में संघ के सदस्य हिंसक कार्रवाइयों में - जिनमें आगजनी, डकैती, और हत्याएं शामिल हैं - मुब्तिला रहे हैं और वे अवैध ढंग से हथियार एवं विस्फोटक भी जमा करते रहे हैं।

                27 फरवरी 1948 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे अपने ख़त में पटेल लिखते हैं :'सावरकर के अगुआईवाली हिन्दु महासभा के अतिवादी हिस्से ने ही हत्या के इस षडयंत्र को अंजाम दिया है ..जाहिर है उनकी हत्या का स्वागत संघ और हिन्दु महासभा के लोगों ने किया जो उनके चिन्तन एवं उनकी नीतियों की मुखालिफत करते थे।'' वही पटेल 18 जुलाई 1948 को हिन्दु महासभा के नेता एवं बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता एवं समर्थन से भारतीय जनसंघ की स्थापना करनेवाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखते हैं :

               ''..हमारी रिपोर्टें इस बात को पुष्ट करती हैं कि इन दो संगठनों की गतिविधियों के चलते खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चलते, मुल्क में एक ऐसा वातावरण बना जिसमें ऐसी त्रासदी (गांधीजी की हत्या) मुमकिन हो सकी। मेरे मन में इस बात के प्रति तनिक सन्देह नहीं कि इस षडयंत्रा में हिन्दु महासभा का अतिवादी हिस्सा शामिल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां सरकार एवं राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। हमारे रिपोर्ट इस बात को पुष्ट करते हैं कि पाबन्दी के बावजूद उनमें कमी नहीं आयी है। दरअसल जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है संघ के कार्यकर्ता अधिक दुस्साहसी हो रहे हैं और अधिकाधिक तौर पर तोडफोड/विद्रोही कार्रवाइयों में लगे हैं।

              अपने ऊपर मुकदमा चलाने के दौरान गांधी के हत्यारे नाथुराम गोडसे ने भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अपने रिश्तों को नकारा हो, मगर विदित है कि 1994 में फ्रंटलाइन नामक अंग्रेजी पत्रिाका को दिए साक्षात्कार में नाथुराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने स्पष्ट किया था कि वे सभी भाई नाथुराम, दत्तात्रोय, मैं और गोविन्द सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में थे। आप कह सकते हैं कि हम अपने घर में नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में बड़े हुए। वह हमारे लिए परिवार की तरह था। नाथुराम वहां बौध्दिक कार्यवाह बना था। उसने भले ही कहा हो कि उसे संघ छोड़ा था मगर हकीकत यही है कि उसने संघ कभी नहीं छोड़ा।

                अब यह मुमकिन है कि वल्लभभाई पटेल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति विचारों को लेकर नरेन्द्र मोदी सहमत हुए हों, ऐसा है तो उन्हें उसके बारे में उन्हें साफ बोलना चाहिए, मौन नहीं रहना चाहिए।

? सुभाष गाताड़े