संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

खाद्य सुरक्षा-

महिला सशक्तिकरण का अनूठा प्रयास

? डॉ. सुनील शर्मा

         भूखे भजन न होय गोपाला अर्थात भूखे पेट रहकर कोई प्रभु भक्ति में भी ध्यान नहीं लगा सकता है। भूख न तो किसी धर्म,सम्प्रदाय या जाति विशेष को लक्षित करती है न ही किसी क्षेत्र या लिंग को। भूख की आग विकास की सारी प्राथमिकताओं को खाक कर देती है और इसे शांत करता है-भोजन,अन्न।

                  केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने भूख की आग को समझा और तमाम चुनौतियों एवं विरोध के बीच देश की जनता को दिया भोजन का अधिकार। केन्द्र सरकार के इस उपहार से निश्चित है कि देश की गरीब जनता अब भूखे पेट नहीं सोयेगी। गरीब और लाचार जनता अब गरिमामय जीवन का अधिकार पाने के हकदार है। भोजन के अधिकार से नारी सशक्तिकरण के लिए भी नई राहें मिलने वाली है। क्योंकि अब तक गरीब मां भूखे पेट रहकर अपने बच्चों का उदरपोषण करने मजबूर थी लेकिन अब इस अधिकार ने मां को सशक्त करने का काम किया है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम के सृजन के क्रम में हम देखें तो 23 अक्टूबर 2010 को राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के प्रस्ताव में खाद्य सुरक्षा अध्यादेश की परिकल्पना की गई थी, और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक को बच्चों, महिलाओं व बच्चों की भुखमरी एवं भोजन के अभाव में बचाने के लिए एक क्रांतिकारी कानून के तौर पर परिकल्पित किया गया। खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत 75 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या और 50 प्रतिशत शहरी जनसंख्या के लगभग 82 करोड़ लोगों को कम मूल्य पर लक्षित शहरी जनसंख्या के लगभग 82 करोड़ लोगों को कम मूल्य पर लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के द्वारा प्रति मास प्रति व्यक्ति पांच किलोग्राम की दर से खाद्यान्न प्राप्त रने का हक होगा। साथ ही अंत्योदय अन्न योजना के अंतर्गत आने वाली गृहस्थियों को भी कम कीमत वाला खाद्यान्न प्रतिमाह प्रति परिवार 35 किलोग्राम मिलेगा। इस अधिकार में महिलाओं को सशक्त करने के लिए काफी प्रावधान किए गए है।गर्भवती स्त्रियों और स्तनपान कराने वाली माताओं को पोषाहार सहायता के साथ-साथ ही बढ़ावा दिया गया है। खाद्य सुरक्षा के तहत बालकों को पोषणीय सहायता, कुपोषण निवारण और प्रबंध जैसे मामलों में खाद्य सुरक्षा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार शामिल है। महिला सशक्तिकरण के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण पहल है-राशनकार्ड में गृहस्थी की मुखिया महिला का होना। इस प्रावधान के अनुसार प्रत्येक पात्र गृहस्थी में, वो महिला जिसकी आयु अठारह वर्ष से अधिक दो राशन कार्ड जारी करने के लिए गृहस्थी का मुखिया मानी जाएगी। यदि उस गृहस्थी में उस समय 18 वर्ष की अथवा उससे अधिक आयु की महिला नहीं है तो उस स्थिति में वरिष्ठ पुरुष राशन कार्ड जारी करने के उद्देश्य से परिवार का मुखिया माना जाएगा। बाद में जब उस गृहस्थी में कोई महिला 18 वर्ष की हो जाती है तो उसे राशन कार्ड के प्रयोजन के लिए मुखिया बना दिया जाएगा। वास्तव में महिला को परिवार का मुखिया बना देना इस अधिनियम की सबसे बड़ी उपलब्धि है जो महिला सशक्तिकरण की राह आसान बनाएगी।

               यह अधिनियम महिलाओं की परिवार में भागीदारी सुनिश्चित करता है और उन्हें कुशल प्रबंधन की ओर उन्मुख करता है। इस अधिनियम में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में उचित दर दुकानों का प्रबंधन महिलाओं को या उनके समूहों को देने में प्राथमिकता देने का अधिकार प्रदान करता है। गर्भवती महिलाओं को मुफ्त आहार और प्रसूति सुविधाओं के लिए छह महीनों की अवधि में 6000 रु. की नगद सहायता एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। साथ ही स्तनपान करानेवाली माताओं को मुफ्त आहार तथा छह महीने से लेकर छह साल की उम्र तक के बच्चों को आयु अनुसार आंगनवाड़ी के माध्यम से मुफ्त आहार की व्यवस्था की गई है। वास्तव में बच्चों की भूख मिटाने अपने तन को बेचने मजबूर माताओं को इस अधिनियम ने सशक्त किया है, उन्हें अपने सम्मान, और लज्जा को सुरक्षित रखने का हक मिला है।

               लोककल्याणकारी राज्य का दायित्व होता है कि उसके नागरिक खासकर गरीब व लाचार जनसाधारण गरिमा जीवन व्यतीत करें। अगर ऐसे में महिला सशक्तिकरण का मार्ग भी प्रशस्त हो जाए तो सोनेपर सुहागा हो जाए। खाद्य सुरक्षा का अधिकार देकर केन्द्र की यूपीए सरकार ने यह काम किया है। गृहस्थी की मुखिया अगर महिला होती है तो घर में खाद्य सुरक्षा अपने आप आ जाएगी। क्योंकि घर का बजट बनाना और उसे सुचारू रूप से लागू करना महिलाओं से अच्छा कौन कर सकता है।

                
? डॉ. सुनील शर्मा