संस्करण: 30 दिसम्बर -2013

1 जनवरी नव वर्ष पर विशेष

केवल जश्न नहीं, देश को खुशहाल

बनाने का संकल्प करें

? डॉ. गीता गुप्त

        क्कीसवीं सदी का संकट और संघर्षों से भरा तेरहवां बरस भी बीत गया। 2014 की नयी सुबह दस्तक दे रही है द्वार पर। इसका अभिनंदन करेंगे हम। एक बार फिर नये वर्ष के नये संकल्पों के सारथी बनेंगे। मगर कोई नया संकल्प करने से पहले एक बार मन के दर्पण में झांकें। पूछें अपने आप से, क्या पिछले संकल्प साकार हुए ? वर्ष 2013 राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य सभी दृष्टियों से बहुत सुखद नहीं रहा। राजनीतिक गतिविधियों ने बार-बार यही सिध्द किया कि नेताओं के लिए स्वार्थ सर्वोपरि है, देश नहीं। केवल आरोप-प्रत्यारोप, गड़े मुर्दे उखाड़ने, एक-दूसरे को नीचा दिखाने, भ्रष्टाचार में दूसरों से खुद को कमतर जताने और देशहित के प्रश्नों को हाशिए पर डाल छल-बल से सत्ता सुख भोग में समय बिता देना ही उनका राज-धर्म या राष्ट्र धर्म रह गया है। इसलिए राजनीतिक क्षितिज पर सारे महत्वपूर्ण प्रश्न अद्यपर्यन्त अनुत्तरिक हैं। कश्मीर-समस्या, असम-समस्या, चीनी घुसपैठ, पाकिस्तानी घुसपैठ बांग्लादेशियों की घुसपैठ, नक्सलवाद, आतंकवाद आदि संकट अब नासूर बन चुके हैं। कौन हल करेगा नासूर बन चुके इन संकटों को, जब राजनीति मात्र सत्ता-सुख का अवलम्ब बन चुकी है ?

                आर्थिक धारातल पर हम मजबूत होने का स्वांग करते हैं। ठीक है कि वैश्विक मंदी की मार से भी हम बच निकले। वैश्विक शक्ति-अमेरिका जैसे देश को 'शट डाउन' के दौर से गुजरना पड़ा, मगर भारत मजबूती से खड़ा रहा। यह देश की आर्थिक सशक्ततता का प्रमाण नहीं। कथित रूप से चार लाख करोड़ का काला धान यदि देश के बाहर है, हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार जड़ें जमाये हुए हैं, बड़े-बड़े उद्योगपतियों-कारोबारियों और नेताओं को  आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए जनहित की अवहेलना की जा रही है तो राष्ट्र कैसे आर्थिक दृष्टि से समृध्द होगा ? भ्रष्टाचार, अवसाद, खुशहाली, स्वास्थ्य, जीवन-स्तर आदि कई बिन्दुओं पर अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं जो आंकड़े उजागर कर रही हैं, सबमें हमारा देश बहुत पिछड़ा हुआ है। क्या यह चिन्ताजनक नहीं ?

                 देश का धार्मिक परिदृश्य निराशाजनक है। ढोंगी साधु-सन्तों ने अपने पाखण्ड और दुराचार से धार्मिक विश्वासों और आस्था को खण्ड-खण्ड कर दिया है। फिर भी कदाचारियों के प्रति लोगों की अन्धा भक्ति और अन्ध श्रध्दा से यह सवाल पैदा होता है कि आखिर यह धार्मिक प्रवंचना समाज को कहां ले जाएगी ? सामाजिक धरातल पर पहले ही विसंगतियां इतना विकराल रूप ले चुकी हैं कि परिवार और समाज का ताना-बाना बिखर रहा है। दहेज, बाल विवाह और गृह कलह से भी बढ़कर समलैंगिक संबंध, सहजीवन, महिलाओं की तस्करी, यौन शोषण जैसे कई नये संकट अब सामने हैं। आधुनिक संचार साधनों ने भी नयी मुसीबतें पैदा की हैं। फेसबुक और इण्टरनेट का दुरुपयोग सभी आयु वर्ग के लोगों को स्वार्थी, आत्मकेन्द्रित और आत्मघाती तक बना रहा है।

                सारे मानवीय मूल्य और जीवन मूल्य तिरोहित हो रहे हैं। हमारे न्यायालय अपने सांस्कृतिक मूल्यों की अवहेलना कर जिन वैश्विक परम्पराओं को भारतीय समाज में स्थापित कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करना चाहते हैं, वस्तुत: वे पतनोन्मुखी हैं। भारत की पावन भूमि पर भारत के सांस्कृतिक मूल्य और भारतीय परम्परा ही सामाजिक उन्नति और स्थिरता में सहायक हो सकते हैं-यह महत्वपूर्ण तथ्य न्याय की आसंदी पर विराजित विभूतियों के मस्तिष्क में जाने क्यों नहीं आता ? हमारी शिक्षा बौध्दिक विकास का पैमाना मात्र बनती जा रही है, जो रोटी दे सके। शिक्षा में ज्ञान, विवेक और संवेदना का पूर्णत: अभाव मनुष्य को मानवीय गुणों से वंचित कर पाशविक बना रहा है। यह पाशविकता आज संसार को संवेदनहीन, असहिष्णु और भयावह बना रही है। शिक्षा का सही पाथेय क्या है ? इस दुनिया की नियति क्या है ? मानव जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए ? ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न हम दरकिनार करते आए हैं इसलिए जीवन जटिल होता चला गया है। हम वैश्विक धरातल की बात करते हैं पर अपनी धरती को महिमामयी और निष्कलंक रखने के लिए कुछ नहीं करते। हममें स्वदेशाभिमान कहां है ? राष्ट्र प्रेम और राष्ट्र भक्ति कहां है ? निजी जीवन और चिन्तन में राष्ट्र कहां है ? यदि सचमुच हमारे जीवन में राष्ट्र का स्थान होता तो किसी भी धरातल पर ऐसी कोई विसंगति उत्पन्न नहीं होती जो देश के विकास को अवरूध्द कर दे, जो मानवता को लज्जित करे या मानव जीवन की अर्थवत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगा दे। हमने अपने इतिहास, धार्म, अधयात्म, संस्कृति और विधाता को भी भुला दिया है। जीवन की बुनियादी जरूरी बातों को हमने भुला दिया है, फिर कैसे विकास होगा ? किसका और कैसा विकास होगा ? कितना जटिल और महत्वपूर्ण प्रश्न है यह ?

                सवालों को छोड़ दें। आइए, नये वर्ष की बात करें। यह समय सचमुच शुभकामनाओं का है। शुभ और सात्विक कर्मों का है। पाशविकता से मुक्त होने और गंभीर चिंतन मनन का है। केक काटना और हल्ला मचाकर नये वर्ष का स्वागत करना भारतीय परम्परा नहीं है, पश्चिम की तर्ज पर हमने इसे आत्मसात किया है। अपना मौलिक सब कुछ गंवाते जा रहे हैं, हम इसलिए जीवन बिखर रहा है। खण्ड-खण्ड हो रहा है आदमी। स्वागत की एक सात्विक, पावन, अनूठी परम्परा है हमारी संस्कृति में। वह हमारे हृदय को विकारमुक्त करती है, प्रसन्नता के आलोक से भर देती है और कामना करती है-

                सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।

                सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दु:खभागभवेत्॥

               वर्ष 2014 का स्वागत करते समय हमें स्मरण रखना होगा कि यह जश्न का समय नहीं है। मनुष्य का जीवन और धारती का अस्तित्व संकट में है। हम किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय या देश को हो, 'स्व' से ऊपर उठकर सोचना होगा। इसी में मानव का कल्याण निहित है। मौजूदा संकट किसी धर्म, जाति या देश विशेष का संकट नहीं है। वह मानव मात्र का संकट है। जिन्होंने सब कुछ नष्ट करने की ठान ली है, उनके विरुध्द एकजुट होकर पूरी ताकत से सामना करने की घड़ी है यह। इतिहास साक्षी है कि हिंसा की बदौलत सुख-शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। जो प्रेम की अपार ऊष्मा,ऊर्जा और मिठास को भूलकर हिंसा, घृणा और वैमनस्य की गलत राह पर चल पड़े हैं उन्हें सच्चाई की राह पर लाने की जिम्मेदारी हम सबकी है। काम कठिन है परन्तु करना ही होगा। नये साल का जश्न तभी सार्थक होगा जब यह संकल्प हमारा पाथेय बने और हम पूरे देश में खुशहाली ला सकें।

? डॉ. गीता गुप्त